बेघरों से बेमुरव्वत

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भारत में बेघर लोगः  देश में आश्रय विहीन लोगों की स्थिति का एक आकलन जनगणना 2011 के आंकड़ों से किया जा सकता है. वर्ष 2001 में देश में बेघर लोगों की जनसंख्या 19.43 लाख थी, जो वर्ष 2011 में कम होकर 17.72 लाख रह गई है. इस दौर में देश में खूब शहरीकरण हुआ. इस अव्यवस्थित शहरीकरण के परिणामस्वरूप शहरों में बेघर लोगों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. जहां 2001 में शहरी इलाकों में 7.78 लाख बेघर लोग थे, यह संख्या दस साल बाद बढ़कर 9.38 लाख हो गई. ग्रामीण क्षेत्रों में बेघर लोगों की संख्या में कमी आई और ये 11.6 लाख से कम होकर 8.34 लाख रह गई. आकलन बताते हैं कि जनगणना में बेघर लोगों की बहुत सीमित परिभाषा गढ़कर उनकी संख्या को सीमित कर दिया गया है और इस परिभाषा को बदला जाना वक्त की जरूरत है.

परिभाषा की विसंगतिः  नीति का ताना-बाना बनाने वाले समस्या को हल करने में उतने जुझारू और रचनात्मक नहीं होते हैं, जितना वे समस्या को छिपाने और उसकी गंभीरता को हल्का करने में होते हैं. वे सिद्धांतों और मूल्यों से ज्यादा परिभाषाओं को गढ़ते हैं और बदलाव दिखा देते हैं. बेघर की परिभाषा का ही संदर्भ लीजिए. जनगणना के मुताबिक, ‘बेघर वह है जो खुले में रहता है, सड़क के किनारे, फुटपाथ, फ्लाईओवर और सीढ़ियों के नीचे रहता है या पूजा स्थलों, मंडप, रेलवे स्टेशन आदि के खुले स्थानों में रहता है.’ इस परिभाषा के हिसाब से भारत की केवल 0.14 प्रतिशत जनसंख्या बेघर है, जबकि वास्तव में 12.5 प्रतिशत लोग बेघर हैं.

घरों की कमीः   बारहवीं पंचवर्षीय योजना के तहत शहरी आवासों के लिए गठित तकनीकी समूह के मुताबिक इस योजना (वर्ष 2012 से 2017) की शुरुआत में भारत में बुनियादी जरूरतों के साथ 1.88 करोड़ घरों की कमी थी. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में यह कमी 2.47 करोड़ थी. भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री ने तय किया है कि वर्ष 2022 तक एक भी परिवार बेघर नहीं होगा. वे जनगणना 2011 के आंकड़ों को आधार मान रहे हैं. जिसके मुताबिक 4.50 लाख परिवार बेघर हैं. यानी लक्ष्य है कि इतने घर बना दिए जाएं और लक्ष्य पूरा हो जाएगा. अगर हम समस्या को स्वीकार ही नहीं करेंगे या कम आंकेंगे, तो क्या सही किस्म का बदलाव आ पाएगा?

आश्रय घर चार तरह के होने चाहिएः पुरुषों के लिए, महिलाओं के लिए, परिवार के लिए और विशेष जरूरतों वाले लोगों के लिए

वास्तविकता का दूसरा पहलूः  भारत सरकार ने सभी परिवारों की जातीय-सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन करने के लिए विशेष जनगणना की है. इसके मुताबिक ग्रामीण भारत में 17.96 करोड़ परिवारों में से 2.24 करोड़ यानी 12.5 प्रतिशत परिवार ऐसे घरों में रहते हैं, जिनकी दीवारें घास, बांस, प्लास्टिक और पॉलीथीन से बनी हुई हैं. इन्हें बेघर क्यों नहीं माना जाता है? जो लोग किन्हीं खास परिस्थितियों की मजबूरी में पन्नी या घास से एक ढांचा बना लेते हैं, सम्मानजनक जीवन के लिए इसे पर्याप्त तो नहीं ही माना जा सकता है. यह भी उल्लेखनीय है कि जनगणना 2011 ने भी यह जांचा था कि कितने लोगों के घरों की दीवारें घास या पन्नी की हैं. जनगणना 2011 के हिसाब से 2.29 करोड़ घर घास-पन्नी की दीवारों से बने हैं. इन दो आंकड़ों में 5 लाख का अंतर है. इससे पता चलता है कि बेघर लोगों को पहचानने और उन्हें स्वीकार करने के लिए हमारी व्यवस्था अब भी तैयार नहीं है. 

इस संदर्भ में नेशनल फोरम फॉर हाउसिंग राइट्स के संयोजक इंदु प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘जो दीवारें हवा का झोंका न झेल पाएं, जो छतें बारिश की फुहारों में टपकने लगें, उनमें रहने वालों को बेघर न मानना नीतिगत विसंगति और नैतिक अपराध है. वास्तव में हमें यह स्वीकार करना होगा कि लोगों के संसाधनविहीन हो जाने से आश्रयविहीनता बढ़ रही है. उन्हें तात्कालिक तौर पर आश्रय की सेवाएं और व्यापक तौर पर सम्मानजनक आश्रय का अधिकार देना ही होगा. बेघर होने और सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी का गहरा संबंध है, इसका मतलब है कि आशय के अधिकार की नीति के साथ-साथ मौजूदा विकास की नीतियों की फिर से समीक्षा करने की जरूरत है, नहीं तो लोग बेघर होते ही रहेंगे.’

27 फरवरी 2012 को सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक निर्देश में कहा था कि हमें लगता है कि आश्रय घरों के संचालन और व्यवस्था की निगरानी के लिए राज्यों को ऐसे नियम और नियामक व्यवस्था बनानी चाहिए, जिनका स्वरूप वैधानिक हो. हालांकि इस मामले में सरकारें कछुआ चाल चल रही हैं. उन्हें लगता है कि बेघर लोग इंतजार कर सकते हैं, अभी सरकारों के पास दूसरे जरूरी काम हैं. इन स्थितियों में जो मरते हैं, वे बेघर से लावारिस लाश की श्रेणी में तब्दील हो जाते हैं. इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता.

 आश्रय घरों की स्थितिः   मौजूदा मानकों के आधार पर देश के सभी राज्यों में 2,402 आश्रय घर बनाए जाने की जरूरत है. हालांकि 27 नवंबर 2015 तक 1,340 आश्रय घर ऐसे थे जिनके बनाए जाने पर स्वीकृति मिली थी या जिनका निर्माण शुरू हो चुका था.

सर्वोच्च न्यायालय में 27 नवंबर 2015 को केंद्रीय आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय द्वारा दाखिल हलफनामों से पता चलता है कि महाराष्ट्र में 409, उत्तर प्रदेश में 250, मध्य प्रदेश में 122, राजस्थान में 118 और दिल्ली में कुल 141 आश्रय घरों की स्थापना की जरूरत है.

अव्यवस्थित शहरीकरण से बेघर लोगों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. जहां 2001 में शहरों में 7.78 लाख बेघर थे, यह संख्या दस साल बाद बढ़कर 9.38 लाख हो गई

 किसकी जिम्मेदारी?   यहां उल्लेख करना जरूरी है कि अब यह जिम्मेदारी राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के पास है कि वह बेघर लोगों के हकों की सुरक्षा करे. शहरी बेघर लोगों के लिए बनी योजना के मुताबिक केवल आश्रय घरों को बेघर लोगों के हकों की सुरक्षा के केंद्र के रूप में स्थापित किया जाना है. दिशा निर्देश कहते हैं कि बेघर लोगों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन, राशन, पोषण आहार, परिचय पत्र, आर्थिक समावेश, शिक्षा, सस्ते आवास सरीखे अधिकारों से जोड़ा जाएगा. इनके संचालन के लिए जरूरी बजट में से 75 प्रतिशत केंद्र सरकार और 25 प्रतिशत राज्य सरकार को वहन करना है. जहां आश्रय घर (क्षमता- 50 लोग) चल रहे हैं, उनके संचालन के लिए भारत सरकार 6 लाख रुपये प्रति आश्रय घर सालाना उपलब्ध करवाएगी.

Homeless by Shailendra (7)web

कुछ महत्वपूर्ण बातें जिन्हें समझने की जरूरत है

देशभर के बेघरों के संदर्भ में हमें ये बात समझनी चाहिए कि ये लोग भी इंसान हैं और बाकी समाज की तरह इनकी भी बुनियादी जरूरतें समझने की जरूरत है. विकास के इस दौर में, जबकि जमीन को सबसे कीमती संपत्ति माना जाता है, बेघरों का भी उसमें बराबरी का हक है. बेघर लोगों का समूह कोई एकरूप समूह नहीं है. उनमें अकेले पुरुष भी हैं, छोटे बच्चों के साथ एकल महिलाएं भी हैं, विकलांगता से प्रभावित विशेष जरूरतों वाले व्यक्ति और बुजुर्ग भी हैं. इन सबकी जरूरत के मुताबिक आश्रय घरों की सम्मानजनक व्यवस्था बनानी होगी. इस समूह की जरूरतों को पहचानते हुए, उन्हें पूरा करना भी राज्य की जिम्मेदारी है. उन्हें सस्ता राशन, सामाजिक सुरक्षा और रोजगार का हक मिले. उन्हें स्वास्थ्य और शिक्षा का अधिकार भी है. इन पहलुओं पर सजगता से पहल करके इनकी स्थिति को बदला जा सकता है. बदलते परिवेश में घर छोड़ने, सही मार्गदर्शन न मिलने, घरों में आजीविका के साधन न होने या शिक्षा में अच्छा प्रदर्शन न कर पाने के कारण किशोर उम्र के बच्चे (10 से 17-18 साल की उम्र) भी आश्रय विहीन हो जाते हैं. बहरहाल ऐसे बच्चों को संरक्षण देने के लिए किशोर न्याय अधिनियम में बाल संरक्षण की व्यवस्थाएं हैं, किंतु उनका अपना ढांचा इतना लचर और गुणवत्ताविहीन है कि ये बच्चे पूरी तरह से असंरक्षित हो जा रहे हैं. इनका कई स्तरों पर शोषण होता है. वे भयभीत भी होते हैं. अक्सर वे आपराधिक समूहों से जुड़ जाते हैं. स्वाभाविक है कि यदि सही संरक्षण नहीं मिलेगा, तो ऐसा होना लाजिमी ही है.

बहरहाल ये भी समझने की जरूरत है कि बेघरों की समस्या को केवल आश्रय घर या रैन बसेरे की इमारत तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए. यह एक बहुआयामी और बहु-विषय केंद्रित प्रतिबद्धता की मांग करता है. इतना ही नहीं नीतियां बनाने से जरूरी उन्हें उचित ढंग से लागू करवाना है वरना बेघर लोगों की जिंदगियां कभी भी पटरी पर नहीं लौट सकेगी.