गांधी और आंधी के बीच

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केजरीवाल यह मसीहाई मुद्रा तो अख्तियार करते हैं लेकिन गांधी नहीं हो पाते. यहीं से उनकी और उनकी पार्टी की पूरी राजनीति सवालों में घिरने लगती है.  स्टिंग ऑपरेशन से लेकर खिड़की एक्सटेंशन की छापामारी और इसके बाद के धरने तक उनकी पार्टी का जो रवैया रहा है वह इस मायने में डरावना है कि वे अपने सिवा सब पर सवाल खड़े कर रहे हैं- पुलिस को उन्होंने खारिज कर दिया, महिला आयोग को राजनीतिक संस्था बता डाला, मीडिया पर बिकने का आरोप डाला, कल को हो सकता है कि वे अदालत को भी निशाने पर ले आएं.

इसमें संदेह नहीं कि ये सारी व्यवस्थाएं तरह-तरह के भ्रष्टाचार और राजनीतिक कलुष की मारी हैं. केजरीवाल जहां भी उंगली रख दें वहां बदबू देती अव्यवस्था निकलेगी. लेकिन इसकी साफ-सफाई का, इसके शुद्धीकरण का रास्ता यह नहीं है कि आप के कार्यकर्ता खुद लाठी-डंडे लेकर निकल पड़ें या खुद थाना-मुंसिफ-अदालत बन जाएं. ऐसे शुद्धीकरण अभियानों ने चीन और रूस में लाखों लोगों की बलि ली, उन्हें जेलों में सड़ाया. इस अभियान का दूसरा पहलू यह है कि खुद के लिए आप की सजाएं बहुत मामूली-सी हैं- अपने पुराने चुटकुलों के लिए कुमार विश्वास माफी मांग कर छूट जाते हैं और अपने नए बयानों के लिए सोमनाथ भारती थोड़ी-सी फटकार के साथ छोड़ दिए जाते हैं.

इन तौर-तरीकों से लोकप्रियतावाद तो शायद सध जाएगा, वह गांधीवाद नहीं सधेगा जो केजरीवाल की असली राजनीतिक ताकत और विरासत बन सकता है. आप में फिलहाल अलोकप्रिय होने का साहस नहीं है, यह कश्मीर पर प्रशांत भूषण के सही रुख से पार्टी की दूरी ने बताया है, और खाप के प्रति योगेंद्र यादव की नव-अर्जित उदारता ने साबित किया है. निस्संदेह इस राजनीतिक लचीलेपन की रणनीति से अलग योगेंद्र यादव के पास एक व्यापक समाजवादी दृष्टि और विरासत है जो पार्टी के लिए भविष्य का रास्ता बन सकती है. लेकिन वह भविष्य तब आएगा जब लगातार व्यक्तिवाद की तरफ मुड़ती वर्तमान की अराजकता को छोड़ पार्टी मुद्दों से जुड़ेगी. तब भी उसके सामने दो बड़ी चुनौतियां होंगी- सामाजिक समानता, समरसता व न्याय का माहौल बनाने की और भूमंडलीकरण के अपरिहार्य और अप्रतिरोध्य लग रहे विराट तंत्र से टकराने की. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उम्मीद की जो लहर उसने पैदा की है उसे अपने संगठन और विचार के जरिए वह एक बड़ी ऊर्जा में बदले, वरना यह लहर या तो तानाशाही का रास्ता खोलेगी या फिर जिस तेजी से उठी है, उसी तेजी से लौट जाएगी. यह आम आदमी पार्टी के लिए बुरा होगा और देश के लिए भी. क्योंकि बार-बार राजनीतिक उम्मीदों का यह गर्भपात लोग नहीं झेल सकते.

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