झाड़ू लगाकर कमाए गए दो रुपये आज भी याद हैं

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चंद मिनटों में बस साफ हो गई और दो रुपये का सिक्का लिए मैं और मनोज अपने दूसरे दोस्तों के साथ खेलने निकल गए. चेहरे पर एक अलग-सी चमक छा गई और सिर गर्व से ऊपर हो गया था. भला हो भी क्यों न… आखिर यह मेरी पहली कमाई जो थी. अपनी मेहनत का पैसा जो था!

घर पहुंचा तो देखा बस में मिले सज्जन सामने कुर्सी पर बैठे चाय पी रहे हैं. मुझे देख मां ने कहा बेटा मामा को प्रणाम करो. मेरी तरफ देख वे चौंककर मां से बोले, ‘ये आपका बेटा है? थोड़ी देर पहले तो ये बस में झाड़ू लगा रहा था! एक और लड़का भी था इसके साथ.’ इसके बाद घर में जो महाभारत हुआ उसके बारे में मैं क्या लिखूं… मुझ पर क्या-क्या कहर बरपा होगा, आप समझ ही गए होंगे.

मनोज से मिलने पर पाबंदी लगा दी गई. मैं गुमसुम रहता था. मां को मेरी बढ़ती हुई बेचारगी की चिंता सताने लगी. नतीजा ये हुआ कि स्कूल के प्रधानाचार्य से बात करके यह इंतजाम कराया गया कि मेरी कम उम्र के बावजूद बिना नाम दर्ज किए कक्षा में बैठने की अनुमति मिल गई. मकसद ये था कि स्कूल में रहूंगा तो बच्चों के साथ कम से कम क, ख, ग तो सीख ही लूंगा. बंद मुट्ठी में रखी रेत की तरह वक्त बीतता गया… गांव में अच्छे स्कूल की कमी के कारण मुझे नैनीताल भेज दिया गया और मनोज की यादें दिनों-दिन धुंधली होती चली गईं.

आज इस घटना को हुए करीब दो दशक बीत गए हैं पर कभी-कभी याद आती है मनोज की, बचपन की बेपरवाही और हमारी निश्छलता की. वह मासूमियत जो तमाम सामाजिक कारकों को दरकिनार करते हुए मन को भेदभाव के अंधेरे से दूर रखती थी. मनोज आज न जाने कहां है. पर जब भी नौकरी और तनख्वाह की चर्चा होती है तब मुझे यकायक बस में मनोज के साथ झाड़ू लगाकर दो रुपये कमाने की वह घटना याद आ जाती है. आशा करता हूं मनोज भी कहीं किसी कोने में मेरे इस लेख या समझिये पत्र को पढ़ रहा होगा.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं)

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