गई जमीन अब जान के लाले

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मामले में प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल जवाब में कहा गया कि किसानों के आंदोलन के कारण पावर प्लांट का कार्य प्रारंभ नहीं हो सका. तब कोर्ट ने कहा कि भूमि का अधिग्रहण मनमाने और मशीनरी तरीके से नहीं किया जा सकता. किसानों की आपत्तियों को सुनना जरूरी है. करछना मामले में कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को यह छूट दी है कि वह चाहे तो कानून के मुताबिक नए सिरे से अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर सकती है.

किसानों की मांग है कि पांच साल तक उनकी जमीनें सरकार के पास खाली पड़ी रहीं. अगर जमीनें उनके पास होतीं तो उस पर फसल पैदा की जाती. इसलिए सरकार पांच साल में उन जमीनों पर पैदा होने वाले अनाज की कीमत किसानों को दे लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की बात पर गौर करने की बजाय उनके विरोध को कुचलने के लिए पुलिस ने दमन का सहारा लेना शुरू कर दिया. गांववाले बताते हैं कि नौ सितंबर को गांव में पुलिसिया हमला करवाने वाले डीएम कौशल राज शर्मा ने धमकी दी थी कि जिस तरह उन्होंने मुजफ्फरनगर में दंगा करवाया था, वैसे ही यहां भी करवा सकते हैं इसलिए सुधर जाओ. उनका अब कानपुर तबादला हो चुका है. संजय कुमार नए डीएम बनकर आए हैं. कनहर गोलीकांड के बाद इनको सोनभद्र में लगाया गया था. जांच टीम के सदस्याें के साथ एक अनौपचारिक बातचीत में उन्हाेंने पिछले डीएम कौशल राज को ‘दंगा स्पेशलिस्ट’ भी बताया.

कुछ स्थानीय पत्रकारों ने बताया कि जिन जमीनों को लेकर मामला फंसा है, वे सारी अधिग्रहण से पहले आला अधिकारियों की पत्नियों और सगे-संबंधियों के नाम कर दी गई थीं, इसलिए किसानों को मुआवजा वापसी का नोटिस नहीं दिया जा रहा कि बात कहीं खुल न जाए. यह आरोप सही भी लगता है क्योंकि जब कोर्ट ने किसानों की जमीन वापस करने का आदेश दे दिया है तो प्रशासन जमीन वापस क्यों नहीं कर रहा है? इस सवाल पर डीएम संजय कुमार का कहना है, ‘अखबारों में विज्ञापन दिया गया लेकिन गांववाले पैसा वापस नहीं कर रहे हैं.’ जबकि ग्रामीणों का कहना है कि कैसे करना है, क्या करना है, हमें कुछ मालूम ही नहीं है. प्रशासन ने जमीन वापस करने की प्रक्रिया के बारे में कोई सूचना नहीं दी है. प्रशासनिक अधिकारियाें का कहना है कि वे जो कर रहे हैं, वह सब ‘ऊपर’ के आदेश के मुताबिक कर रहे हैं.

पुलिस की रिपोर्ट में गांव के आधे से ज्यादा लोग अधिग्रहण से असहमत हैं और अपनी जमीन नहीं देना चाहते. दूसरी तरफ डीएम से फोन पर हुई बातचीत में उन्हाेंने कहा कि अस्सी फीसदी लोग जमीन देने के लिए सहमत हैं यानी ग्रामीणों की असहमति और कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रशासन जमीन वापस करने की प्रक्रिया शुरू करने की बजाय अधिग्रहण की कोशिश में लगा है. प्रशासन का कहना है कि हम ग्रामीणों को सहमत करने का प्रयास कर रहे हैं. किसानों के इस आंदोलन से अलग ‘पावर प्लांट बचाओ आंदोलन’ भी चल रहा है जिससे सपा से पूर्व सांसद रेवती रमण सिंह भी जुड़े हैं. हाल ही में वे पावर प्लांट का काम पूरा कराने का संकल्प भी जता चुके हैं.

उधर, 26 सितंबर को नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर आंदोलन कर रहे किसानों से मिलने जा रही थीं, तभी इलाहाबाद पुलिस ने उनको समर्थकों के साथ हिरासत में ले लिया. मेधा भूमि अधिग्रहण का विरोध करने पर बच्चों और महिलाओं की जेल में डालने का विरोध कर रही हैं. वे किसानों से मिलना चाह रही थीं लेकिन जिलाधिकारी संजय कुमार ने उन्हें वहां जाने से रोक दिया. उन्होंने कहा, ‘गांव में धारा 144 लगी हुई है और किसी सभा की इजाजत नहीं है.’ प्रशासन ने मेधा को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में ही नजरबंद कर दिया था. उन्हें बाद में छोड़ दिया गया.

मेधा को नजरबंद किए जाने को लेकर पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई कि मेधा पाटकर की नजरबंदी गैरकानूनी थी. याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश सरकार से जवाबी हलफनामा तलब करके पूछा है कि मेधा और उनके समर्थकों को क्यों गिरफ्तार किया गया? पीयूसीएल की इस याचिका में कचरी गांव में धारा 144 लगाने को लेकर भी चुनौती दी गई है. गौरतलब है कि पुलिस ने 144 लागू करने का जो आदेश जारी किया है, उसमें कहा गया है कि प्रशासन को यह ‘आभास’ है कि क्षेत्र में अशांति की ‘संभावना’ है. सवाल यह भी है कि क्या ‘आभास’ और ‘संभावना’ के आधार पर किसी क्षेत्र में इतने लंबे समय तक धारा 144 लागू की जा सकती है?

गांव के एक घर में दो ग्रेनेड फेंके गए. घर के अंदर की दीवारें काली पड़ गई हैं. गांव वाले कह रहे हैं कि यह ग्रेनेड पुलिस ने फेंका है जबकि पुलिस का कहना है कि बम घर के अंदर से फेंका गया. बहरहाल, ये बम आर्टिलरी (आयुध कारखाने) के बने हैं, जिन पर सितंबर 2010 एक्सपाइरी डेट है
गांव के एक घर में दो ग्रेनेड फेंके गए. घर के अंदर की दीवारें काली पड़ गई हैं. गांव वाले कह रहे हैं कि यह ग्रेनेड पुलिस ने फेंका है जबकि पुलिस का कहना है कि बम घर के अंदर से फेंका गया. बहरहाल, ये बम आर्टिलरी (आयुध कारखाने) के बने हैं, जिन पर सितंबर 2010 एक्सपाइरी डेट है

अब इस आंदोलन में कई किसान संगठन शामिल हो गए हैं.  ‘कृषि भूमि बचाओ मोर्चा’ और ‘जन संघर्ष समन्वय समिति’ ने 27 अक्टूबर को बनारस में किसान-मजदूर संगठनों का एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया. इस सम्मेलन में तय किया गया कि पांच नवंबर को प्रदेश के सभी जिला मुख्यालयों पर सामूहिक धरना दिया जाएगा और 16 नवंबर को लखनऊ में धरना प्रदर्शन होगा.

उधर, जेल में बंद ग्रामीणों ने जमानत लेने से इनकार कर दिया है. उनका कहना है, ‘हमने कोई अपराध नहीं किया है. हमारी जमीन पर हमारा अधिकार है. सरकार जब तक चाहे, हमें जेल में रखे, पर हम जमानत नहीं लेंगे.’ गांव के एक बुजुर्ग ने एक लोकगीत गाकर अपनी भावनाएं कुछ इस तरह जाहिर कीं, ‘जब सर पर कफन को बांध लिया तब पांव हटाना न चाहिए…’ पर सवाल यह है कि जब सरकार ही इन गरीब ग्रामीणों को पांव पीछे हटाने पर मजबूर कर दे तो ये न्याय की अपेक्षा किससे करें?

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प्रशासन का सभी आरोपों से इंकार 

इलाहाबाद के जिलाधिकारी संजय कुमार ने इन आरोपों के मद्देनजर कहा, ‘ये सारे आरोप गलत हैं. हम जनता के दुश्मन नहीं हैं. हम जनता की सेवा के लिए हैं, अन्याय क्यों करेंगे? सबको साथ लेकर काम करना है.’ भारी संख्या में पुलिस बल तैनात करने या लाठी चार्ज करने की जरूरत क्या थी, इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘कुछ लोगों ने जनता को भड़काने की कोशिश की. रणनीति के तहत पुलिस पर हमला किया गया, जिसके बचाव में पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी.’

महिलाओं और बच्चों को भी जेल में डालने के बारे में उनका कहना है, ‘जिन लोगों ने माहौल खराब करने की कोशिश की, उन पर कार्रवाई की गई. कुछ और नाम भी प्रकाश में आए हैं, जिनके बारे में जांच की जा रही है.’ कोर्ट के आदेश के बावजूद जमीन वापसी की प्रक्रिया नहीं शुरू करने के सवाल पर उन्होंने कहा, ‘हमने प्रक्रिया शुरू की थी, अखबारों में विज्ञापन दिए थे, गांव में भी अधिकारियों को भेजा गया, लेकिन गांववालों ने कोई रुचि नहीं दिखाई. कोई अपनी जमीन वापस लेने नहीं आया.’ हालांकि, वे यह भी कह रहे हैं कि 80 फीसदी लोग जमीन देने के लिए सहमत हैं. बाकी को सहमत करने का प्रयास किया जा रहा है.

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