‘23 साल का वह क्रांतिकारी इतना बड़ा हो गया है कि उस पर कोई पगड़ी फिट नहीं हो सकती’

1925 में बने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तो आजादी की लड़ाई में कोई भी योगदान नहीं है. हमारा सवाल उनसे है जो भगत सिंह के करीब हैं और वैचारिक रूप से उनके निकट हैं, उनकी संघ के बजाय ज्यादा जिम्मेदारी है, उनसे ज्यादा सवाल हैं. उन्होंने इन क्रांतिकारियों के लिए क्या किया? किसी से पूछिए कि डॉ. गया प्रसाद वह क्रांतिकारी थे जिनकी जेल के भीतर सर्वाधिक पिटाई होती थी. जेल अधिकारी गुस्से में उनको मारते थे जो थोड़े मजबूत किस्म के होते थे. वे छोटे कद के, थोड़ा स्थूल शरीर के थे. ये था कि पिटाई से मरेंगे नहीं. वे काला पानी भी गए. इतने सीधे-सादे व्यक्ति डॉ. गया प्रसाद कानपुर के निकट जगदीशपुर गांव में कब मरे, किसी को नहीं पता. किसी प्रगतिशील संगठन  किसी राजनीतिक या किसी वामपंथी पार्टी ने इन लोगों के मरने पर एक शोकसभा तक नहीं की. इसलिए ये ज्यादा जिम्मेदार हैं.

जिन लोगों ने आजादी के लिए इतनी कुर्बानियां दीं, वे क्या सोचते हुए मरे होंगे? वे जिस अभाव में जिए, उनके घरवाले क्या सोचते होंगे? जयदेव कपूर या बटुकेश्वर दत्त बनकर कौन मरना चाहेगा इस देश में? भगत सिंह के आंदोलन में शामिल होने के समय वामपंथी पार्टी बन चुकी थी. बावजूद इसके भगत सिंह ने पार्टी से कोई संबंध नहीं रखा. समानांतर कार्रवाइयां चलती थीं. इन क्रांतिकारियों का मानना था कि जेल जाकर हमारा कार्य समाप्त नहीं हो गया है. बल्कि उनका कहना था कि जब हम जेल में आ गए तो हमारे हथियार दूसरे हो गए हैं. हमें जेल के भीतर भी शांत नहीं बैठना है. अनशन को गांधीवादियों का हथियार माना जाता है. गांधी सहित किसी गांधीवादी ने कभी अनशन करते हुए जान नहीं दी लेकिन अनशन करके जान देने वालों की लंबी सूची क्रांतिकारियों की है. भगत सिंह के पास अनशन का लंबा रिकॉर्ड है. भगत जब फांसी चढ़े तब उनका सबसे बड़ा सरोकार अहिंसा था. पूरे क्रांतिकारी आंदोलन पर जो आतंक का आरोप लगता था, उस घेरे से आंदोलन को निकालने का काम भगत सिंह ने किया.

भगत कभी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं बने. यह अलग बात है कि बाकी  कुछ साथी बाद में जेल में रहने के दौरान चिंतन-मनन के आधार पर वामपंथ की ओर झुके और बाहर आकर पार्टी जॉइन की. शिव वर्मा की बहुत महत्वपूर्ण कृति है ‘संस्मृतियां’. सीपीएम ने बहुत वर्षों तक उन्हें अपने शहीद साथियों पर लिखने की अनुमति नहीं दी. यह कम्युनिस्ट पार्टियों का दोष है. यह रवैया है इनका. बहुत जद्दोजहद के बाद उन्हें किताब लिखने की अनुमति मिली.

अब देखिए कि भगत सिंह की विचारधारा और उनके सपनों पर कोई बात नहीं करता. अगर शशि थरूर ने कन्हैया को भगत सिंह बता दिया, तो इससे पहले भी कितने ऐसे प्रसंग आए होंगे जब किसी को भगत सिंह कहा गया होगा. अभी पिछले अगस्त में मैंने एक लेख लिखा. 9 अगस्त ‘काकोरी दिवस’ से करीब एक महीने पहले संजय गुप्ता नाम के एक व्यक्ति का मेरे पास फोन आया कि वे इस तिथि को शाहजहांपुर में ‘काकोरी शहीद दिवस’ मनाना चाहते हैं. उन्होंने काकोरी शहीदों के लिए शासन से की जाने वाली मांगों की चर्चा की और मुझसे कार्यक्रम में शामिल होने को कहा. आयोजन से सप्ताह भर पहले उन्होंने मेरे भाई के जरिए पत्रक भेजे. उसमें रामप्रसाद बिस्मिल का जो चित्र छापा गया था उसमें उन्हें भगत सिंह वाला हैट और भगत सिंह की लंबे काॅलर वाली कमीज पहनाई गई थी. पूछने पर उस व्यक्ति ने बताया कि इसी हैट को लगाकर बिस्मिल डकैतियां डालने जाते थे और अंतिम समय बिस्मिल अपना यही हैट भगत सिंह को दे गए थे. अब कोई पूछे कि हैट लगाकर डकैती डालने वाली बात कितनी विश्वसनीय है. मैंने कहा कि यह चित्र तो मैंने पहली बार देखा है. 1925 में बिस्मिल जेल चले गए थे और तब तक भगत सिंह परिदृश्य में कहीं नहीं थे, भगत सिंह से उनकी कोई मुलाकात नहीं हुई. संजय गुप्ता के पास इस तर्क का कोई उत्तर नहीं था और न ही उन बातों का जिन्हें अपने दो-तीन पत्रकों में उन्होंने छापा था. मजेदार यह था कि उन्होंने ‘सरफरोशी की तमन्ना’ और ‘मिट गया जब मिटने वाला’ के अलावा फिल्म ‘उमराव जान’ में शहरयार की मशहूर रचना ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए’ को भी रामप्रसाद बिस्मिल की लिखी कविता बताया है. जबकि ‘सरफरोशी की तमन्ना’ शीर्षक गजल बिस्मिल अजीमाबादी की और ‘मिट गया जब मिटने वाला फिर सलाम आया तो क्या’ दिल शाहजहांपुरी की रचना है.

उन्होंने यह झूठ भी गढ़ा कि लखनऊ जेल से अदालत जाते समय बसंत पंचमी के दिन बिस्मिल और दूसरे क्रांतिकारी साथी उनके कहने से गले में पीले रूमाल और सिर पर पीली टोपी पहन कर गए थे और उसी दिन के लिए बिस्मिल ने अपने साथियों के कहने पर ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ की रचना की. यह पीले रूमाल की बात उस बात की नकल में गढ़ी गई है कि लेनिन दिवस पर भगत सिंह जेल में लाल रूमाल बांधकर गए थे. अपने पत्रक में उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को सशस्त्र क्रांति का सैनिक बताया और यह भी लिखा कि रामप्रसाद बिस्मिल के डेथ वारंट में स्पष्ट लिखा गया था- टू बी हैंग्ड टिल डेथ, क्योंकि अंग्रेज यह बात भली-भांति जानते थे कि रामप्रसाद बिस्मिल जेल में प्रतिदिन योगाभ्यास करते हैं अतः एक झटके में उनके प्राण निकलने वाले नहीं. इसके पीछे पूरा संघ परिवार है. उस पर्चे में इतना झूठ छापा गया. हमने उनसे पूछा कि क्या अशफाक के बारे में यही नहीं लिखा गया था. उसी केस के रोशन सिंह के बारे में नहीं लिखा गया था? राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के बारे में नहीं लिखा गया था? या इससे पहले और वारंट में यही नहीं लिखा गया? अपने इसी कुतर्क के आधार पर उन्होंने शाहजहांपुर में एक ‘राम प्रसाद बिस्मिल योग-आयुर्वेद संस्थान’ खोलने की मांग प्रस्तुत करने के साथ ही 50 हजार गायों की एक गौशाला बनाए जाने का भी प्रस्ताव किया.

तो मैं कहना चाहता हूं कि यह षड्यंत्र कोई नया नहीं है. अब पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा है. वर्ष 1997 में प्रवीण प्रकाशन, नई दिल्ली से काकोरी कांड के शहीद राम प्रसाद बिस्मिल की रचनाओं का संचयन ‘सरफरोशी की तमन्ना’ शीर्षक से पांच खंडों में प्रकाशित हुआ. इसका संकलन, शोध एवं संपादन मदनलाल वर्मा ‘क्रान्त’ ने किया था और प्रस्तावना ‘आशीर्वचन’ के रूप में प्रो. राजेन्द्र सिंह उर्फ रज्जू भइया, सरसंघचालक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने लिखी. जबकि उन दिनों मन्मथनाथ गुप्त, विष्णु शरण दुबलिश, रामकृष्ण खत्री, प्रेमकिशन खन्ना और शिव वर्मा सरीखे बिस्मिल के क्रांतिकारी साथी जीवित थे पर इनमें से किसी को भी संपादक ने अपनी पुस्तक की भूमिका लिखने के योग्य न समझा. संपादक ने यह भी लिखा कि हमें बिस्मिल की कुछ रचनाएं अधूरी मिलीं, जो पूरी कर दीं. पता नहीं उसे यह अधिकार किसने दे दिया. अब यह नहीं समझ में आ रहा है कि उन रचनाओं में कितना बिस्मिल का है और कितना इन्होंने पूरा कर दिया है.

इसी किताब का रहस्य यह है कि संपादक लिखते हैं, ‘आज बिस्मिल की कौम से वाकिफ लोगों की एक अच्छी-खासी जमात हमारे मुल्क में खड़ी है. यह दीगर बात है कि अभी उस जमात का जमाना नहीं आया. शायद आने वाले कल में उन्हें कोई पहचानने वाला हो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोगों में बिस्मिल की रूह की झलक आपको मिल सकती है.’

संपादक महोदय एक जगह और लिखते हैं जो और हैरत में डालने वाला है, ‘मेरा जन्म बिस्मिल की मृत्यु के ठीक बीस वर्ष बाद 20 दिसंबर 47 को शाहजहांपुर में हुआ, तो क्या उनकी (बिस्मिल की) आत्मा पूरे बीस वर्ष तक भटकती रही. इसका उत्तर कोई त्रिकालदर्शी ही दे सकता है. बहरहाल मेरी पीठ पर अभी भी नीला निशान है. लोग कहते हैं कि यह निशान तो उसी बच्चे का होता है जिसका पुनर्जन्म हुआ हो.’ अर्थात स्पष्ट है कि इस पुस्तक के संपादक के रूप में बिस्मिल का पुनर्जन्म हुआ है और ऐसी स्थिति में शहादत से पहले बिस्मिल की अधूरी रही रचनाओं को पूर्ण करने का दायित्व उन्हें स्वतः ही हासिल हो जाता है. पूरी पुस्तक अवैज्ञानिक तर्कों से भरी है जिसमें वे कभी गणेश शंकर विद्यार्थी को वकील लिखते हैं तो कहीं किसी दूसरे की रचना को रामप्रसाद बिस्मिल की बताकर उसका उल्लेख करने से नहीं हिचकते. इन हरकतों से, क्रांतिकारियों के बारे में ऐसा गप्प फैलाने से ऐतिहासिक दस्तावेजों की असली पहचान खो जाएगी.

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)