किराए का कंधा

एनएस भट्ट के मुताबिक, उनके यहां हर रोज चार से पांच ऐसे फोन आ ही आते हैं जो अपने किसी प्रिय की मौत से दुखी होते हैं और अंतिम संस्कार के लिए उनकी मदद लेना चाहते हैं. एनएस भट्ट का मानना है कि आनेवाले समय में इस क्षेत्र में और काम बढ़ेगा. वो कहते हैं, ‘हर कोई शहरों में ही रहना चाह रहा है. यहां 24 घंटे, काम का ही होता है. मतलब इंसान अभी जितना व्यस्त है वो आगे उससे भी ज्यादा व्यस्त होगा. ऐसे में उन्हें हमारी पहले से ज्यादा जरूरत पड़ेगी.’

‘समाज एक ही समय में भौतिकवादी और धार्मिक दोनों होना चाहता है. वो शराब पीता है. पब जाता है लेकिन जैसे ही उसके परिवार में मृत्यु जैसी कोई घटना होती है वैसे ही वो धार्मिक हो जाता है’

पंजाब के एक गांव से कुछ साल पहले दिल्ली आकर एक  फ्यूनरल और एंबुलेंस सर्विस चलानेवाले एनएस भट्ट शहरी समाज के बदलाव की जो व्याख्या हमारे सामने रखते हैं वो डरानेवाली है. यहां एक प्रश्न उठता है कि क्या वाकई शहर में रहनेवाले इतने अकेले और व्यस्त हो गए हैं कि उन्हें अपने बेहद निजी क्षणों तक में किसी न किसी सर्विस प्रोवाइडर की मदद लेनी पड़ रही है? क्या शहरी जीवन में समाज और सामाजिकता की पूरी अवधारणा चरमरा गई है? हम ये सवाल हिन्दी के जाने-माने कथाकार और शहरी सामाज पर गहरी पकड़ रखनेवाले शिवमूर्ति के सामने रखते हैं. इलाहाबाद में रहनेवाले शिवमूर्ति कहते हैं, ‘यह कोई आश्चर्यजनक बदलाव नहीं है. ये तो उन्हीं हजार बदलावों में से एक है जिससे मानव समाज गुजरते-गुजरते यहां तक पहुंचा है.’ वे आगे कहते हैं, ‘शुरू में जब शादियां होती थीं तो गांव-जवार की महिलाएं और पुरुष मिलकर ही सारा काम करा देते थे. खासकर खाना तो लोग खुद ही बनाते थे लेकिन आज तो हर जगह हलवाई का चलन है. क्या गांव, क्या शहर? फर्ज कीजिए कि आज गांव में एक लड़की की शादी होनी है और उसका बाप कहता है कि मैं हलवाई न रखूंगा. सारे समाज को मिलकर बारातियों के लिए खाना बनाना चाहिए. तो क्या होगा? लड़की के परिवार के ही लोग कहेंगे कि ये क्या बकवास है. ऐसा तो किसी भी सूरत में नहीं हो पाएगा.’ वे आगे कहते हैं, ‘जिस तरह से शादी-ब्याह के लिए हलवाई आने लगे उसी तरह से अब अंतिम संस्कार करवानेवाले लोग भी आ रहे हैं. जो काम हम खुद नहीं कर सकेंगे उसे कोई न कोई तो करेगा.’

बकौल शिवमूर्ति शहरी समाज एक ही समय में भौतिकवादी और धार्मिक दोनों होना चाहता है. वो शराब पीता है. पब जाता है लेकिन जैसे ही उसके परिवार में ऐसी कोई घटना होती है वैसे ही वो धार्मिक हो जाता है. वो यहां भौतिकवादी बिल्कुल नहीं दिखना चाहता. शिवमूर्ती आगे कहते हैं, ‘जैसे-जैसे समाज बदलेगा वैसे-वैसे पहले से बनी-बनाई कई व्यवस्थाएं बदलेंगी. इसमें कोई बात नहीं है. बदलाव एक सतत प्रक्रिया है.’

शिवमूर्ति जिसे बदलाव की एक सतत प्रक्रिया मानते हैं उसे सीएसडीएस के सीनियर रिसर्च स्कॉलर और स्तंभकार चंदन श्रीवास्तव, इंसानी जीवन में बाजार द्वारा की जा रही घुसपैठ के तौर पर देखते है. उनके मुताबिक यह बदलाव की सतत प्रक्रिया बिल्कुल नहीं है. यह उस दिनचर्या की वजह से है जहां हर एक घंटे का हिसाब सैकड़े, हजार और लाख रुपये में लगाया जाता है. चंदन कहते हैं, ‘किसी की अंतिम यात्रा में जाने के लिए आपको कम से कम पूरे दिन का समय चाहिए. इतना समय निकालना हमारे लिए  मुश्किल हो गया है. हमें लगता है कि इतने समय में तो हम कुछ सौ कमा सकते हैं. कुछ हजार बना सकते हैं और ये बात हमारे दिमाग में पिछले कई सालों में बिठाई गई है.’ चंदन आगे कहते हैं, ‘बाजार ने इंसानी जीवन के सबसे कोमल और मधुर पलों पर भी अपनी छाप छोड़ी है. चाहे वो रक्षाबंधन पर इंटरनेट से राखी भेजने का मसला हो, वेबकैम से घर की दिवाली और करवाचौथ मनाने की बात हो या फिर मरने पर इस तरह की किसी एजेंसी से अंतिम संस्कार करवाने का मामला हो.’ चंदन जिसे इंसानी जीवन में बाजार की घुसपैठ मानते हैं उसे कुछ लोग वरदान की तरह भी देख रहे हैं.

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46 वर्षीय रमा का मानना है कि अगर हम शहर में रह रहे हैं तो यहां की व्यस्त जीवनचर्या को कैसे नकार सकते हैं. शहरों में ज्यादातर लोग अकेले हैं. जो साथ हैं उनकी भी अपनी-अपनी व्यस्तथाएं हैं. ऐसे में अगर इस तरह की सेवाएं हैं तो ये बहुत ही अच्छी बात है. कुछ पैसे देकर हम वे सारे कर्मकांड तो कर पा रहे हैं जिन्हें करना जरूरी है.

रमा अपनी छोटी बहन सिया मित्रा के साथ पिछले दस साल से दुबई में रह रही हैं. इस साल फरवरी में जब इनके पिता की मृत्यु हुई तो दोनों बहनों ने ऐसी ही एक एजेंसी की मदद से पिता का अंतिम संस्कार दिल्ली में किया. रमा कहती हैं, ‘शुक्र है दिल्ली में इस तरह की एजेंसियां तो हैं जिसकी मदद से हम अपनी सुविधा के हिसाब से पिता के अंतिम संस्कार की विधियां पूरी कर सके. इस शहर में तो हमारा एक भी रिश्तेदार नहीं है. हमारा तो सबकुछ दुबई में ही है. पापा की जिद थी कि वे दिल्ली में रहेंगे. एक-दो हफ्ते में बाकी काम भी हो जाएगा तो हम वापस दुबई चले जाएंगे.’

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