सत्ता का इकबाल खत्म?

लेकिन शासन के इकबाल का क्या हाल है, वह उस शाम पीएमसीएच यानि पटना मेडिकल कालेज एंड हास्पिटल में पता चला जहां घायलों का इलाज हो रहा था. जिस दिन घटना घटी, उस दिन लाशों को पोस्टमार्टम रूप में ले जाया गया. पोस्टमार्टम का एक कर्मी योगेंद्र ने लाशों को पोस्टमार्टम रूम में बंद किया और चाबी लेकर घर चलता बना. परिजन बिलखते रहे, लाश मांगते रहे लेकिन कर्मचारी तक जाने और वहां से चाबी मांगकर लाने की जहमत मेडिकल कालेज से किसी ने नहीं की. बाद में चाबी लाने की बजाय उसका ताला ही तोड़कर रास्ता निकाला गया.

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यह तो घटनावाली रात की बात है जिस दिन आवश्यक दवाओं के अभाव में भी कई घायलों ने वहां दम तोड़ा. उसके अगले दिन उसी पटना मेडिकल कालेज में जो हुआ, वह अलग ही कहानी रच गया. अचानक मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पीएमसीएच पहुंचे. मुख्यमंत्री के आने की सूचना मेडिकल कालेज के अधीक्षक को थी, कई डाक्टरों को भी थी लेनिक सीएम के जाने पर भी अधीक्षक वहां नहीं मिले. उन्हें संदेश भिजवाया गया कि मुख्यमंत्री बुला रहे हैं, वे फिर भी नहीं आये. जीतन राम मांझी ने कहा कि पीएमसीएच भगवान भरोसे चल रहा है. मुख्यमंत्री ने कहा कि वे अधीक्षक और गैरहाजिर चिकित्सकों पर कार्रवाई करेंगे. अगले दिन उन्होंने ऐसा किया भी. लेकिन विचित्र यह हुआ कि मुख्यमंत्री की कार्रवाई करते ही इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और बिहार स्वास्थ्य सेवा संघ की बैठक हो गयी कि यह गलत है. बैठक करने के बाद पदाधिकारी सीएम के पास पहुंच गये कि उन्हें हटाइये नहीं बहाल कीजिए और सीएम ने भी बिना वक्त लिये कह दिया कि लिख कर दीजिए, मुंहा-मुंही नहीं कहिए,विचार करेंगे. यह सब एक घिनौने नाटक की तरह चलता रहा.

शासन के इकबाल के खत्म हो जाने का नमूना सिर्फ घटना के दिन अधिकारियों के बयान या उनकी मनमानी और सीएम तक को ठेंगे पर रखने से ही नहीं दिखा. बल्कि उसके बाद भी अधिकारियों का जो रवैया रहा और जिस तरह सरकार लचर रवैया अपनाती रही, उससे भी यह साफ दिखा. घटना की जांच का जिम्मा मुख्यमंत्री ने राज्य के गृह सचिव अमीर सुबहानी औरपुलिस मुख्यालय के एडीजी गुप्तेश्वर पांडेय को सौंपा. निर्देश दिया गया कि सात दिनों के अंदर रिपोर्ट सौंपें. जनसुनवाई की प्रक्रिया शुरू हुई. आम आदमियों की जमात में से लोग सुनवाई में अपनी बात रख आये. लेकिन सात दिनों से अधिक का समय गुजर जाने के बाद कई अधिकारी जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाने को तैयार नहीं हुए. समय देनेको तैयार नहीं हुए. कई आज समय नहीं होने का हवाला देते रहे तो कई अपनी भारी व्यवस्तता का वास्ता देते रहे. रिपोर्ट समय पर तैयार ही नहीं हो सकी है, उसे जमा करने या पेश करने की तो बात ही दूर.

ये सब तो शासन-प्रशासन पर सरकार के इकबाल के खत्म होने के संकेत थे. मुख्यमंत्री भी झल्लाये ही रहे. उन्होंने एक टीवी चैनल को इंटरव्यू में कह दिया कि ऐसे हादसे होते रहते हैं, मुख्यमंत्री क्या करेगा. मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग की गई. दूसरी ओर से मुख्यमंत्री की बातों का विस्तार उनकी पार्टी के लोगों ने शुरू किया. जदयू प्रवक्ता संजय सिंह ने कहा,  ‘क्या गुजरात और मध्यप्रदेश में ऐसे हादसे नहीं हुए हैं, नहीं होते हैं, क्या इस्तीफा दिया गया है?’ विपक्ष की राजनीति कर रही भाजपा तो लगा ऐसे मौके की तलाश में ही थी. अभी शव वहीं थे कि भाजपाइयों ने बिना वक्त लिये कैंडल मार्च कर राजनीति की शुरुआत कर दी. मांझी सरकार के एक मंत्री ने कहा कि भाजपा लाश की राजनीति कर रही है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मंडल पांडेय ने कहा, ‘मारे गये अधिकांश लोग पटना और आसपास के ही थे,सरकार की ओर से कोई मातमपुर्सी में भी नहीं गया.’ जदयू प्रवक्ता संजय सिंह ने इसी मातमी वक्त में जातीय राजनीति की शुरुआत की और कहा कि ‘भाजपा क्या बात करेगी, रणवीर सेना सुप्रीमो ब्रह्मेश्वर मुखिया जब मारे गये थे और शवयात्रा पटना पहुंची थी तो यही भाजपा के नेता सुशील मोदी शवयात्रा में शामिल लोगों पर फायरिंग करवाना चाहते थे, भूमिहार भाइयों का खेल बिगाड़ना चाहते थे.’

बात की शुरुआत कहीं से हुई, बात कहीं और चलती गयी. गांधी मैदान हादसा पीछे छूटता गया, राजनीति आगे बढ़ती गयी. लालू प्रसाद ने तो साफ-साफ कम से कम यह कहा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं, इसलिए वे नहीं जा सके लेकिन यह घटना प्रशासनिक लापरवाही की लगती है. नीतीश कुमार ने रस्मअदायगी की तरह इस पूरी घटना पर एक बयान दिया कि यह दुखद है, निंदा करते हैं और साथ ही कह दिया कि लापरवाही और चूक हुई है तो उसकी जांच हो रही है, कार्रवाई होगी. नीतीश कुमार ने यह बयान देकर अपनी चुप्पी तोड़ी तो इस घटना और इस घटना के बहाने अराजक स्थिति पर बोलने के लिए नहीं, बल्कि उन्होंने पाकिस्तान के बहाने केंद्र सरकार पर हमला करने के लिए मुंह खोला कि नरेंद्र मोदी सही तरीके से पाकिस्तान से नहीं निपट रहे. नीतीश समयानुसार बोलने और लंबे समय तक चुप्पी साधे रहने के उस्ताद नेता माने जाते हैं. इस मामले में उनका लंबा अभ्यास भी है. नीतीश ने गांधी मैदान हादसे को अपनी जगह छोड़ा और अपने दल को मजबूत करने के अभियान में लग गये और प्रकारांतर से यह बताने में भी कि जनता अगर मजबूती देगी, मेहनताना देगी तो वे मजूरी को तैयार हैं. कहां तो जीतन राम मांझी, नीतीश कुमार को घिरना था गांधी मैदान हादसे के बाद लेकिन नीतीश कुमार 20 अक्तूबर को केंद्र सरकार को घेरने, बिहार को विशेष राज्य दर्जा वगैरह दिलाने और उसके बाद अपनी यात्रा का भी एलान करने लगे.

गांधी मैदान हादसा पीछे छूटने लगा है. उसका अध्याय भी लगभग बंद होने की राह पर बढ़ चुका है. कुछ इसी तर्ज पर कि ऐसे मेले-ठेले में गरीब ही आते हैं और अकारण-असमय मर जाना उनकी नियति ही होती है. वे मरे हैं, शासन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, भले ही इकबाल खत्म हो चुका हो.

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