शिक्षण नहीं प्रशिक्षण जरूरी

उमा भारती यदि चाहतीं तो सोनिया की जगह अपना उदाहरण भी दे सकती थीं. वे खुद भी पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ी होने के बावजूद तीसरी बार कैबिनेट मंत्री बनी हैं. वे अकाली दल के कोटे से मंत्री बनीं हरसिमरत बादल का नाम भी ले सकती थीं. हरसिमरत ने दसवीं के बाद एक डिप्लोमा किया है जो शायद बारहवीं के बराबर ही होगा. लेकिन आज की राजनीति में दूसरे की लकीर को छोटा करके ही अपनी लकीर को बड़ा दिखाने का रिवाज है. अजय माकन भी तो यही कर रहे थे जब वे स्मृति की कम शिक्षा का ढिंढोरा पीट रहे थे.

यहां उमा भारती के संदर्भ में यह कहना भी जरूरी है कि वे सीधे काबीना मंत्री नहीं बनीं थीं. सन 2000 में पहली बार कैबिनेट रैंक की खेलमंत्री बनने से पहले वे दो अलग-अलग विभागों में बतौर राज्यमंत्री काम कर चुकी थीं. और हरसिमरत बादल को भी पहली बार खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय जैसा अपेक्षाकृत हल्का विभाग ही मिला है.

बस यहीं से स्मृति के मामले में थोड़ा अगर-मगर की गुंजाइश निकलने लगती है. ठीक है कि मंत्री बनने के लिए क्लर्क जैसा शिक्षित होना जरूरी नहीं है और मंत्रालय का ज्यादा कामकाज तो बाबू ही संभालते हैं, लेकिन पहले थोड़ा प्रशिक्षित होने में क्या बुराई है? यानी कि शुरुआत में स्मृति को मानव संसाधन विकास मंत्रालय में ही उपमंत्री या राज्यमंत्री या किसी कम महत्वपूर्ण विभाग में स्वतंत्र प्रभार वाला राज्यमंत्री या काबीना मंत्री भी तो बनाया जा सकता था.

यहां एक बात और. उनकी पार्टी और समर्थक चाहे कुछ भी कहें लेकिन वे खुद भी शिक्षित होने को महत्वपूर्ण मानती हैं. अगर ऐसा नहीं होता तो खुद को ज्यादा पढ़ा-लिखा दिखाने के लिए चुनाव आयोग को दिए शपथपत्र में अपनी अधिकतम शैक्षणिक योग्यता बीकॉम पार्ट-1 क्यों लिखतीं. जब बी कॉम प्रथम वर्ष के होने न होने का कोई मतलब ही नहीं है तो उन्होंने शपथपत्र में सीधा-सीधा 12वीं कक्षा ही क्यों नहीं लिखवा दिया.

लेकिन लोचा एक और यह भी है कि उन्होंने चुनाव आयोग को ही 2004 में दिए एक अन्य शपथपत्र में अपनी शैक्षणिक योग्यता बी कॉम प्रथम वर्ष की जगह बीए लिखवाई थी. यह अपने राजनीति के शुरुआती नासमझ दौर में संकोचवश की गई या टाइपिंग की मामूली भूल भी हो सकती है. लेकिन जब आप इतने बड़े पद पर बैठ कर करोड़ों का भविष्य निर्धारित करने की अवस्था में हों तो राई जैसी चीजों का पहाड़ बनना भी तय ही है.

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