‘मौत’ के स्वास्थ्य शिविर

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छत्तीसगढ़ में सरकारी शिविरों में लगातार हो रही लापरवाही पर जन स्वास्थ्य अभियान की कार्यकर्ता सुलोचना नंदी कहती हैं, ‘इन घटनाओं की पुनरावृत्ति का पहला कारण तो शुद्ध रूप से राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही ही है. दूसरा कारण सरकारी तंत्र की सोच है कि गरीब आदमी की जिंदगी की कोई अहमियत नहीं होती. छत्तीसगढ़ में पिछले 7-8 सालों में लगातार ऐसे निर्णय लिए गए हैं, जिनसे स्वास्थ्य विभाग की दिशा ही गलत हो गई है. सुलोचना इन घटनाओं पर एक अन्य कोण भी देखती हैं. उनके मुताबिक राज्य सरकार में बैठे कुछ लोग निजी स्वार्थ के कारण खुद ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को घटिया बनाकर उन्हें बदनाम करना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि यहां कि आबादी पूरी तरह से निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर हो जाए. नंदी अपनी बात आगे बढ़ाती हैं, ‘ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ की सही पोस्टिंग तक नहीं हो पा रही है. मैं मानती हूं कि प्रदेश में चिकित्सकों की कमी है, लेकिन मौजूदा स्टाफ को यदि सही और जरूरत के हिसाब से पदस्थ किया जाए तो भी काम चल सकता है. आप देखिए रायपुर, बिलासपुर जिला मुख्यालयों में तो 40-40 चिकित्सक मिल जाएंगे जबकि इन्हीं जिलों के ब्लॉक में डॉक्टर ढूंढे से भी नहीं मिलते.’ सुलोचना सवाल उठाती हैं, ‘आप बताइए जब सरकार पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) को सुधार सकती है तो क्या स्वास्थ्य महकमे को, स्वास्थ्य सुविधाओं को नहीं सुधार सकती?’

सरकार ने इस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग के संचालक डॉ कमलप्रीत सिंह को पद से हटा दिया है वहीं परिवार कल्याण कार्यक्रम के राज्य समन्वयक डॉ. केसी ओराम, बिलासपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एससी भांगे, तखतपुर के खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. प्रमोद तिवारी और एक सरकारी सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को निलंबित किया गया है. डॉ गुप्ता को एफआईआर दर्ज कर पुलिस हिरासत में लिया जा चुका है.

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टारगेट की मार

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य अमले द्वारा टारगेट पूरा करने का खामियाजा किस तरह आम इंसान भुगतते रहे हैं, उसकी एक बानगी इस घटना से भी मिल सकती है. 27 नंवबर 2013 को छत्तीसगढ़ के सुदूर दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मंदिर के बाहर बैठकर भीख मांगनेवाले दो भिखारियों की यहां जबरिया नसबंदी कर दी गई थी. इसे लेकर काफी हो-हल्ला भी मचा था, लेकिन बाद में मामला रफा-दफा कर दिया गया. तब खून और त्वचा की जांच के बहाने प्रहलाद भतरा और रामू नामक दो भिखारियों की नीतीश नाम के एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने नसबंदी करवा दी थी. इन दोनों मजदूरों को नसबंदी के बाद प्रोत्साहन राशि के रूप में 1100-1100 रुपए भी दिए गए थे. टारगेट पूरा करने की होड़ का ही नतीजा था कि बीते 10 नवंबर, पेंड्रा (बिलासपुर) में लगे नसबंदी शिविर में संरक्षित बैगा जनजाति की दो महिलाओं की भी नसबंदी कर दी गई. इन में से एक चैती बाई की मौत हो चुकी है. इस जनजाति के लोगों की कम होती संख्या के चलते इनकी नसबंदी करने पर रोक लगाई गई है. इस जनजाति के लोग राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहलाते हैं क्योंकि इन्हें सरंक्षित करने के साथ ही राष्ट्रपति ने इन्हें गोद लिया हुआ है.

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