‘मौत’ के स्वास्थ्य शिविर

नसबंदी के बाद तबीयत खराब होने वाली महिलाओं का बिलासपुर के अस्पताल में इलाज चल रहा है. फोटो: विनय शर्मा
नसबंदी के बाद तबीयत खराब होने वाली महिलाओं का बिलासपुर के अस्पताल में इलाज चल रहा है. फोटो: विनय शर्मा

छत्तीसगढ़ के सरकारी स्वास्थ्य शिविरों में इलाज के दौरान मौत या लोगों के स्वास्थ्य को स्थाई नुकसान पहुंचने के मामलों की फेहरिस्त को देखते हुए लगता नहीं है कि पेंडारी का नसबंदी कांड इस तरह का आखिरी मामला होगा. 10 नवंबर, 2014 बिलासपुर के तखतपुर के ग्राम पेंडारी में आयोजित नसबंदी शिविर में ऑपरेशन के बाद दो दिन के भीतर 13 महिलाओं (रिपोर्ट लिखे जाने तक) की मौत हो चुकी है. जान गंवाने वाली सभी महिलाओं की उम्र 32 साल से कम है. इंफेक्शन के कारण करीब एक दर्जन महिलाओं की किडनी ने भी काम करना बंद कर दिया है. इन्हें डायलिसिस पर रखा गया है. इनके अलावा तकरीबन पचास महिलाओं की हालत गंभीर बनी हुई है. यहां यह बताना जरूरी है कि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल खुद बिलासपुर से विधायक हैं. अग्रवाल पिछली सरकार में भी सूबे के स्वास्थ्य मंत्री थे. उपरोक्त सारे कांड उन्हीं के कार्यकाल के हैं.

केंद्रीय परिवार नियोजन कार्यक्रम के तहत हर साल अक्टूबर से फरवरी के बीच महिला एवं पुरुष नसबंदी शिविरों का आयोजन किया जाता है. इसी कड़ी में तखतपुर के ग्राम पेंडारी में आयोजित नसबंदी शिविर का आयोजन शनिवार को किया गया था. स्वास्थ्य विभाग ने सरकारी शिविर को एक निजी अस्पताल (नेमीचंद जैन अस्पताल) में आयोजित किया था. यहां पर लेप्रोस्कोपी से महिलाओं की नसबंदी की जानी थी. शिविर में नवीन जिला अस्पताल के सर्जन डॉ. आरके गुप्ता की ड्यूटी लगी थी. इसके अलावा शेष स्टाफ बीएमओ तखतपुर ने उपलब्ध कराया था. यहां पर नौ नंवबर यानी शनिवार को सुबह 11 बजे के बाद महिलाओं की नसबंदी शुरू हुई. स्थानीय पत्रकारों और लोगों का कहना है कि सर्जन ने टारगेट पूरा करने के लिए बिना विश्राम किए छह घंटे के भीतर ही 83 महिलाओं की नसबंदी की थी. टारगेट पूरा करने की बात इसलिए भी सही मानी जा रही है क्योंकि डॉ आरके गुप्ता को इसी 26 जनवरी को 50 हजार ऑपरेशन का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए पुरस्कृत किया गया था.  प्राथमिक जांच में यह बात भी सामने आई है कि नसबंदी शिविर में अधिकांश महिलाओं को बहला फुसलाकर लाया गया था. परिवार नियोजन कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए मितानिन (स्वास्थ्य कार्यकर्ता) की सहायता ली जाती है. इन मितानिनों को नसबंदी कैम्प तक लाने के लिए हर एक महिला पर प्रोत्साहन राशि के रूप में 150 रुपए मिलते हंै. ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए कई मितानिन महिलाओं को बहलाकर कैम्प तक लाई थीं. छत्तीसगढ़ में काम कर रहे ऑक्सफैम इंडिया के कार्यक्रम अधिकारी विजेंद्र अजनबी कहते हैं, ‘ कुछ सालों पहले भोपाल में स्वास्थ्य अधिकार पर एक कार्यशाला हुई थी. वहां यह बात उठी थी कि एनएचआरए (राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण नियामक) के स्पष्ट दिशा निर्देश हैं कि जहां भी सरकारी स्वास्थ्य शिविर लग रहे हैं, वहां ऑपरेशन थियेटर मौजूद हो. उसके सारे जरूरी उपकरण मौजूद हों. अगर ऑपरेशन थियेटर मौजूद नहीं हों तो कैम्प न लगाया जाए. लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में आप देखेंगे कि यहां किसी भी दिशा निर्देश का पालन नहीं किया जा रहा है. आधे अधूरे ऑपरेशन थियेटर के सहारे सैकड़ों ऑपरेशन किए जा रहे हैं. उपकरणों को कीटाणुरहित बनाने के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं होता है. हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि जब सरकार भ्रष्ट होती है तो लाचार भी होती है. राज्य सरकार यदि अपने अमले को नहीं सुधार पा रही तो वो भी संदेह के दायर में तो आएगी ही.’

 प्राथमिक जांच में यह बात भी सामने आई है कि नसबंदी शिविर में अधिकांश महिलाओं को बहला फुसलाकर लाया गया था. 

इस घटना की प्रथम दृष्टया जांच में लेप्रोस्कोप से संक्रमण होने की बात कही जा रही थी लेकिन बाद में खबरें आईं कि नैमीचंद जैन अस्पताल के जिस ऑपरेशन थियेटर में दवाएं और उपकरण रखे थे उसकी सील तोड़कर कुछ दवाएं और दस्तावेज जलाए गए थे.  इस खबर ने कई बड़े संदेहों को जन्म दे दिया.  इस बारे में बिलासपुर के कलेक्टर सिद्धार्थ कोमल परदेशी का कहना है, ‘ नेमीचंद अस्पताल का ऑपरेशन थियेटर सोमवार की रात को ही सील कर दिया गया था और मुझे इंजेक्शन और दवाएं जलाने की कोई जानकारी नहीं है.’ हालांकि सरकार ने दवाओें के फर्जी होने की इस संभावना के मद्देनजर ऑपरेशन के दौरान इस्तेमाल की गई छह विभिन्न औषधियों की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है. औषधि निरीक्षक बिलासपुर द्वारा इन दवाइयों के नमूने लिए गए हैं. इन नमूनों को जांच और विश्लेषण के लिए कोलकाता स्थित केन्द्रीय औषधि परीक्षण प्रयोगशाला को भेजा जा रहा है.

बिलासपुर के पेंडारी में अभी मौतों का सिलसिला थमा भी नहीं था कि इसी जिले के पेंड्रा और बस्तर के जगदलपुर  में भी नसबंदी शिविर में ऑपरेशन करवाने वाली महिलाओं की हालत गंभीर होने की खबरें मिल रही हैं. पेंड्रा की 16 महिलाओं को बिलासपुर रेफर किया गया है. वहीं जगदलपुर के महारानी अस्पताल में सात महिलाओं को अत्यधिक ब्लीडिंग की वजह से केजुअल्टी वार्ड में भर्ती कराया गया है. बस्तर के सीएमओ देंवेद्र नाग ने इस बात की पुष्टि की है कि नसबंदी शिविर में ब्लीडिंग की शिकायत आई है. इन दोनों जगहों पर भी महिलाओं की बिगड़ती हालत के बाद दवाइओं और इंजेक्शन फर्जी होने की बात पर संदेह बढ़ रहा है.

इस घटना ने राज्य में राजनीतिक हलचल अचानक बढ़ा दी है. कांग्रेस नेता भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव कार्यकर्ताओं के हुजूम के साथ मुख्यमंत्री रमन सिंह और स्वास्थ्य मंत्री को घटना का दोषी मानते हुए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग कर रहे हैं. कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल  कहते हैं, ‘ ऐसा लग रहा है जैसे सरकारी अमला सबूतों को मिटाने में लगा हुआ है. ऑपरेशन के बाद हुई मौत की नैतिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की बनती है. इसलिए मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को तत्काल इस्तीफा दे देना चाहिए.’ उधर महिलाओं की मौत का आंकड़ा बढ़ते ही मुख्यमंत्री रमन सिंह स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल को लेकर बिलासपुर पहुंच गए थे. मुख्यमंत्री का इस घटना पर अभी तक रस्मी बयान ही आया है, ‘दोषी पाए गए किसी अधिकारी कर्मचारी को बख्शा नहीं जाएगा.’ पूरे मामले में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल चुप्पी साधे हुए हैं.

छत्तीसगढ़ में सरकारी शिविरों में लगातार हो रही लापरवाही पर जन स्वास्थ्य अभियान की कार्यकर्ता सुलोचना नंदी कहती हैं, ‘इन घटनाओं की पुनरावृत्ति का पहला कारण तो शुद्ध रूप से राज्य सरकार और स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही ही है. दूसरा कारण सरकारी तंत्र की सोच है कि गरीब आदमी की जिंदगी की कोई अहमियत नहीं होती. छत्तीसगढ़ में पिछले 7-8 सालों में लगातार ऐसे निर्णय लिए गए हैं, जिनसे स्वास्थ्य विभाग की दिशा ही गलत हो गई है. सुलोचना इन घटनाओं पर एक अन्य कोण भी देखती हैं. उनके मुताबिक राज्य सरकार में बैठे कुछ लोग निजी स्वार्थ के कारण खुद ही सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को घटिया बनाकर उन्हें बदनाम करना चाहते हैं. वे चाहते हैं कि यहां कि आबादी पूरी तरह से निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर हो जाए. नंदी अपनी बात आगे बढ़ाती हैं, ‘ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी चिकित्सकों और पैरामेडिकल स्टाफ की सही पोस्टिंग तक नहीं हो पा रही है. मैं मानती हूं कि प्रदेश में चिकित्सकों की कमी है, लेकिन मौजूदा स्टाफ को यदि सही और जरूरत के हिसाब से पदस्थ किया जाए तो भी काम चल सकता है. आप देखिए रायपुर, बिलासपुर जिला मुख्यालयों में तो 40-40 चिकित्सक मिल जाएंगे जबकि इन्हीं जिलों के ब्लॉक में डॉक्टर ढूंढे से भी नहीं मिलते.’ सुलोचना सवाल उठाती हैं, ‘आप बताइए जब सरकार पीडीएस (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) को सुधार सकती है तो क्या स्वास्थ्य महकमे को, स्वास्थ्य सुविधाओं को नहीं सुधार सकती?’

सरकार ने इस घटना के बाद स्वास्थ्य विभाग के संचालक डॉ कमलप्रीत सिंह को पद से हटा दिया है वहीं परिवार कल्याण कार्यक्रम के राज्य समन्वयक डॉ. केसी ओराम, बिलासपुर के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. एससी भांगे, तखतपुर के खंड चिकित्सा अधिकारी डॉ. प्रमोद तिवारी और एक सरकारी सर्जन डॉ. आरके गुप्ता को निलंबित किया गया है. डॉ गुप्ता को एफआईआर दर्ज कर पुलिस हिरासत में लिया जा चुका है.

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टारगेट की मार

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य अमले द्वारा टारगेट पूरा करने का खामियाजा किस तरह आम इंसान भुगतते रहे हैं, उसकी एक बानगी इस घटना से भी मिल सकती है. 27 नंवबर 2013 को छत्तीसगढ़ के सुदूर दंतेवाड़ा में दंतेश्वरी मंदिर के बाहर बैठकर भीख मांगनेवाले दो भिखारियों की यहां जबरिया नसबंदी कर दी गई थी. इसे लेकर काफी हो-हल्ला भी मचा था, लेकिन बाद में मामला रफा-दफा कर दिया गया. तब खून और त्वचा की जांच के बहाने प्रहलाद भतरा और रामू नामक दो भिखारियों की नीतीश नाम के एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने नसबंदी करवा दी थी. इन दोनों मजदूरों को नसबंदी के बाद प्रोत्साहन राशि के रूप में 1100-1100 रुपए भी दिए गए थे. टारगेट पूरा करने की होड़ का ही नतीजा था कि बीते 10 नवंबर, पेंड्रा (बिलासपुर) में लगे नसबंदी शिविर में संरक्षित बैगा जनजाति की दो महिलाओं की भी नसबंदी कर दी गई. इन में से एक चैती बाई की मौत हो चुकी है. इस जनजाति के लोगों की कम होती संख्या के चलते इनकी नसबंदी करने पर रोक लगाई गई है. इस जनजाति के लोग राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र कहलाते हैं क्योंकि इन्हें सरंक्षित करने के साथ ही राष्ट्रपति ने इन्हें गोद लिया हुआ है.

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