तूफान से त्राहि-त्राहि

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23april purnea 7

लोग अभी गांवों में इसलिए बचे हुए हैं कि बार-बार खबर मिलती है कि राहत-मुआवजा बंटेगा. वरना लोग कबके सीमांचल एक्सप्रेस पर बैठकर सपरिवार दिल्ली, पंजाब और हरियाणा चले गए होते. चले ही जाएंगे, राहत-पुनर्वास का पैसा मिले चाहे न मिले. रोज की दाल-रोटी का इंतजाम तो इन पैसों से नहीं हो पाएगा न. और फिर राहत के बंटवारे में कितनी धांधली होती है और जरूरतमंदों के पास कितनी राहत पहुंचती है, यह इस इलाके के लोगों का देखा हुआ है. फिर इस बार की आंधी-पानी ने यहां के गृहस्थों के पास भी इतनी ताकत नहीं छोड़ी कि वे मजदूरों की रोजी-रोटी का इंतजाम कर सकें. घर छोड़ना ही होगा और जाना ही होगा उस देश जहां वे बाजुओं की ताकत से इतना कमा सकें कि अपनी उजड़ी दुनिया को फिर से बसा सकें.

मौसम विभाग के रडार से बाहर है कोसी

पहले आंधी-तूफान आता तो उसे लोग आपदा समझकर झेल जाते थे. मगर अब मौसम विभाग से पूछने का सिलसिला शुरू हुआ है. इस आपदा के बाद जब लोगों ने मौसम विभाग से पूछा तो पता चला कि कोसी का इलाका जो मौसमी आपदाओं का सबसे बड़ा शिकार रहा है, वह मौसम विभाग के रडार के ही बाहर है. मौसमी बदलावों की कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती. महज इस एक उदाहरण से हिंदुस्तान के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक कोसी-सीमांचल के प्रति सरकारी रवैए का अनुमान लगाया जा सकता है. इस बार सरकार की आंखें खुली हैं और कहा जा रहा है कि बंगाल के न्यू जलपाइगुड़ी में मौसम विभाग का रडार लगेगा. वह भी 2017 तक. अब यह सवाल समझ से परे है कि एक रडार लगाने के लिए दो साल का समय क्यों लगना चाहिए.

(लेखक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं)

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