अभिशप्त आदिवासी

nवित्त वर्ष 2013-14 में 5 करोड़ रुपए का इस्तेमाल स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती मनाने के लिए कर दिया गया.

nमेडिकल, डेंटल, नर्सिंग और फिजियोथेरेपी कॉलेजों और अस्पतालों के िलए चिकित्सा उपकरणों और मोटर वाहनों के लिए 72 करोड़ रुपये का इस्तेमाल कर लिया गया.

nशेयर कैपिटल कंट्रिब्यूशन के तौर पर सरदार सरोवर नर्मदा निगम लिमिटेड को 200 करोड़ रुपये दे दिए गए.

nवित्त वर्ष 2014-15 में 32.61 करोड़ रुपये जल संरक्षण से जुड़े कामों में इस्तेमाल कर लिए गए, जिनमें अन्य कामों के अलावा तालाबों की खुदाई, चेक डैम आदि का निर्माण शामिल है.

[/box]

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के विकास रावल ने 2011 की जनगणना और नेशनल सैम्पल सर्वे ऑर्गेनाइजेशन (एनएसएसओ) के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह पाया है कि ‘केवल तीन फीसदी ग्रामीण आदिवासियों के घरों में नल से पानी आता है, इस समुदाय के 5 फीसदी से भी कम लोग बिजली का इस्तेमाल करते हैं, (केवल) लगभग 16 फीसदी लोगों के घर में किसी भी तरह के शौचालय हैं, 1.7 फीसदी के घरों में बाथरुम और बंद नालियां हैं, केवल 2.6 फीसदी के पास धुंआरहित ईंधन और घर के भीतर रसोई की सुविधा है. साल 2011 की जनगणना के साथ लिए गए आंकड़ों के मुताबिक 41 फीसदी ग्रामीण आदिवासी परिवारों के पास किसी भी तरह की मूलभूत संपत्ति (जैसे साईकिल, रेडियो या टेलीविजन) नहीं है.’

एनएसएसओ के आंकड़ों का इस्तेमाल करते हुए उसी अध्ययन ने यह भी साबित किया कि ‘पीने के पानी और साफ-सफाई जैसी मूलभूत सुविधाओं के मामले में साल 1993 से 2012 के बीच मामूली विकास हुआ.’ अगर योजना आयोग की ओर से प्रकाशित विवादित अनुमानों पर भरोसा करें, तो 47 फीसदी आदिवासी परिवार गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी बसर कर रहे हैं (स्वतंत्र विश्लेषकों के मुताबिक यह आंकड़ा और अधिक है). सवाल उठता है कि इन लोगों को टीएसपी और एससीएसपी फंड से वंचित कर और उनके लिए आवंटित फंड को दमनात्मक व्यवस्थाओं को मजबूत करने व एयरक्राफ्ट, हैलीपैड और शानदार आवासीय कॉम्प्लैक्स जैसी विलासिता के लिए इस्तेमाल कर क्या राज्य स्वयं ही वित्तीय साधनों के बीच एक गृह युद्ध जैसी स्थितियां पैदा नहीं कर रहा है?

[box]

मध्य प्रदेश

वित्त वर्ष 2014-15 में मध्य प्रदेश में एससीएसपी फंड का इस तरह बेजा इस्तेमाल किया गया-

nराज्य के राजमार्गों के लिए 46.80 करोड़ रुपये लगाए गए.

nसिंहस्थ मेला (उज्जैन कुंभ मेला, जो अछूत प्रथा को बढ़ावा देने के लिए कुख्यात है) के लिए 25 करोड़ रुपये दिए गए.

nपुलिस स्टेशनों के निर्माण, स्टेट इंडस्ट्रियल प्रोटेक्शन फोर्स के गठन और ऑफिस फर्नीचर की खरीद के लिए 18.05 करोड़ रुपये इस्तेमाल किए गए.

nबड़े पुलों के निर्माण के लिए 15 करोड़ रुपये लगाए गए.

nस्टेडियम के निर्माण के िलए 4.5 करोड़ रुपए और सिंथेटिक हॉकी टर्फ के लिए 0.65 करोड़ रुपये दिए गए.

nजेलों में सुविधाएं देने के लिए 1.22 करोड़ रुपये दिए गए.

[/box]

 

योजनाओं और परियोजनाओं के स्तर पर भी होता है भेदभाव
नेशनल कोएलीशन ऑफ एससीएसपी/टीएसपी के कन्वेनर पॉल दिवाकर शिक्षा का उदाहरण देते हुए बताते हैं, ‘आरटीआई के माध्यम से हमें इस बात के सबूत मिले हैं कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को टीएसपी और एससीएसपी फंड से पैसे दिए गए हैं. यह स्पष्ट है कि इस पैसे में से अधिकांश का इस्तेमाल संस्थाओं के लिए संपत्तियां बनाने के लिए किया गया है. नाममात्र की राशि का इस्तेमाल ही फेलोशिप और स्कॉलरशिप के लिए किया गया है, जो इस अतिशय जातिवादी शिक्षा व्यवस्था में दलित और आदिवासी छात्रों के आगे बढ़ने में काफी मददगार साबित होती है.’

अगर योजना आयोग की ओर से प्रकाशित विवादित अनुमानों पर भरोसा करें, तो 47 फीसदी आदिवासी परिवार गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी बसर कर रहे हैं

सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस एकाउंटिबिलिटी, दिल्ली में फैकल्टी के तौर पर काम कर रहे सुब्रत दास कहते हैं, ‘इन फंड को दूसरे कामों में इस्तेमाल किए जाने को कड़ाई से रोकने के अलावा अहम यह भी है कि इसमें सीधे हस्तक्षेप करके अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सीधे नीतिगत लाभ सुनिश्चित किए जाएं.’

फोटोः ववजय पांडेय
फोटोः ववजय पांडेय

अपनी इस बात को आगे बढ़ाते हुए दास राष्ट्रीय ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम का उदाहरण देते हैं. वह कहते हैं, ‘इस योजना के दिशा-निर्देश ग्रामीण क्षेत्रों में पाइप के जरिए जल आपूर्ति के लिए हैं. हालांकि देश के कुछ हिस्सों में अनुसूचित जनजाति समुदाय पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं, जहां पाइप के जरिए जल आपूर्ति नहीं की जा सकती. ऐसे स्थानों के लिए स्प्रिंग बॉक्स जैसी चीज सबसे

उपयुक्त हो सकती है, जहां हमेशा बने रहनेवाले स्प्रिंग होते हैं. लेकिन इस योजना के दिशा-निर्देश इस तरह की परेशानी और चुनौती को उठाने के लिए तैयार नहीं दिखते.’

इसी तरह इस बात का उल्लेख किया जाता है कि एससीएपी और टीएसपी फंड के इस्तेमाल के मामले में मानव संसाधन विकास मंत्रालय भी संवेदनहीन है. केंद्र सरकार के कार्यक्रम सर्व शिक्षा अभियान के विस्तृत अध्ययन के दौरान जयश्री मंगूभाई ने अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों के सामने पेश आनेवाले तीन तरह के भेदभावों का उल्लेख किया है- शिक्षकों द्वारा, साथी समूहों द्वारा और ‘व्यवस्था’ द्वारा. ‘बैठने की अलग व्यवस्था, अनुसूचित जाति के छात्रों को डांटने के दौरान अनावश्यक कड़ाई, अनुसूचित जाति के छात्रों को समय न देना, उन पर ध्यान न देना, स्कूल के सार्वजनिक कार्यक्रमों से अनुसूचित जाति के छात्रों को बाहर रखना, अनुसूचित जाति के छात्रों की पढ़ाई की क्षमता के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां देना, स्कूल की खेल गतिविधियों में अनूसूचित जाति के छात्रों को शामिल न करना, पाठ्यक्रम और किताबों में जातिगत विशिष्टताओं को शामिल करना, अनुसूचित जाति के छात्रों के लिए लाभकारी योजनाओं को पूरी तरह लागू न करना, शिक्षकों के प्रशिक्षण के दौरान उनके संवेदीकरण का अभाव’ जैसी चीजें इसमें शामिल होती हैं.

[box]

छत्तीसगढ़

nवित्त वर्ष 2014-15 के दौरान एससीएसपी से 3.03 करोड़ रुपये पुलिस विभाग को इस्तेमाल के लिए दे दिए गए, जबकि टीएसपी से 2 करोड़ रुपये स्पेशल पुलिस के काम के लिए लगा दिए गए.

आंध्र प्रदेश

nवित्त वर्ष 2010-11 में एससीएसपी से 62.4 करोड़ रुपये क्वार्टर रिंग रोड परियोजना के लिए एचएमडीए को बतौर कर्ज दिए गए.

nवित्त वर्ष 2011-12 में एससीएसपी से 9.7 करोड़ रुपये हुसैनसागर झील और कैचमेंट एरिया इम्प्रूवमेंट प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल किए गए.

nइसके अलावा 3.4 करोड़ रुपये सरकार के प्रचार कार्यों में खर्च किए गए.

ओडीसा

nवित्त वर्ष 2014-15 में एससीएसपी से 172 करोड़ रुपये िसंचाई और सड़कों के सुधार से जुड़ी परियोजनाओं के लिए लगाए गए.

nएससीएसपी से 73 करोड़ रुपये बाढ़ प्रबंधन कार्यक्रम में लगा दिए गए.

nटीएसपी से 12.8 करोड़ रुपये न्यायालय भवन और 12.41 करोड़ रुपये पुलिस कल्याण के लिए भवन बनाने में लगाए गए.

दिल्ली

nवित्त वर्ष 2006-07 में शीला दीक्षित के नेतृत्ववाली दिल्ली सरकार ने मैला ढोने वालों के कल्याण और विकास के लिए आवंटित 9.12 लाख रुपये का इस्तेमाल दीवाली की मिठाइयां और उपहार खरीदने में किया.

nवित्त वर्ष 2007-08 में भी दिल्ली सरकार ने मैला ढोने वालों के लिए आवंटित 7.85 लाख रुपये का इस्तेमाल दीवाली की मिठाइयां और उपहार खरीदने में किया.

[/box]

एक शोधकर्ता और कार्यकर्ता संजय भारती कहते हैं, ‘जब इस तरह के भेदभाव का माहौल हो, तो यह कल्पना करना ही बेवकूफी है कि आम योजनाओं से अनुसूचित जाति/ जनजाति के छात्रों को बाकी छात्रों के बराबर फायदा होगा.’

पॉल दिवाकर कहते हैं, ‘सभी राजनीतिक दलों के नेता दिवास्वप्न देखते हैं कि भारत एक मजबूत आर्थिक शक्ति बनेगा. लेकिन दलितों और आदिवासियों के साथ हो रहे व्यवस्थागत भेदभाव के साथ आर्थिक शक्ति कैसे बना जा सकता है?’

दिवाकर कहते हैं, ‘हमने अधिकांश केंद्रीय बजटों और राज्य बजटों का विश्लेषण किया है. फंड से वंचित किए जाने, फंड का उपयोग न करने और फंड का दूसरी जगह इस्तेमाल करने जैसे गंभीर मसलों के अलावा आम स्थिति यह है कि लगभग 70 फीसदी आवंटित राशि सर्वाइवल योजनाओं में जाता है, विकास योजनाओं के लिए नहीं, जो आर्थिक क्षेत्र के तहत आता है. यह बात स्पष्ट रूप से जाहिर करती है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों का आर्थिक विकास सरकारों की प्राथमिकता नहीं हैं. अगर सरकारें सर्वाइवल योजनाओं के साथ स्वामी-सेवक के संबंध जारी नहीं रखना चाहतीं, तो उन्हें लंबी अवधि की संपूर्ण विकास परियोजनाओं की पहल करनी चाहिए. इसीलिए हम एससीएसपी/टीएसपी के लिए विधेयक लाए जाने की मांग कर रहे हैं ताकि नियमों के उल्लंघन को फौजदारी अपराध माना जाए. फिलहाल इससे निपटने के लिए सर्फ दिशा-निर्देश हैं.’

दलितों और आदिवासियों के साथ हो रहे व्यवस्थागत भेदभाव के रहते भारत भला मजबूत आर्थिक शक्ति कैसे बन सकता है

क्या भारत सरकार दलितों और आदिवासियों की इस विकराल समस्या के समाधान के लिए कोई कड़ा कानून लाएगी? इस मसले पर काम करनेवालों और सार्वजनिक दस्तावेजों के मुताबिक, आंतरिक बहस और सक्रिय समूहों के दबाव के बाद यूपीए सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में इस बारे में एक विधेयक लाने और पारित कराने का प्रयास किया था.

इस विधेयक का मसौदा बनाने और उसे आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाने वाले पीएस कृष्णन कहते हैं, ‘सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय की ओर से बनाए गए विधेयक में कई कमियां थीं. लेकिन यह एक सकारात्मक कदम था. फिर भी यह विधेयक आगे नहीं बढ़ पाया, क्योंकि यूपीए सरकार से जुड़े दो अहम लोगों- प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया- ने जोरदार तरीके से इसका विरोध किया था.’

रोचक बात यह है कि 27 जून 2005 को राष्ट्रीय विकास परिषद की 51वीं बैठक में बोलते हुए मनमोहन सिंह ने कहा था, ‘1970 के दशक के मध्य में स्पेशल कंपोनेंट प्लान और ट्राइबल सब-प्लान की शुरुआत की गई थी. ट्राइबल सब-प्लान और स्पेशल कंपोनेंट प्लान दरअसल वार्षिक योजनाओं और पंचवर्षीय योजनाओं के अभिन्न हिस्से होने चाहिए. इसमें यह प्रावधान होने चाहिए कि इन फंड को दूसरी योजनाओं के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और ये फंड लैप्स नहीं हो सकते. इसके अलावा इनके साथ एक स्पष्ट लक्ष्य यह होना चाहिए कि 10 वर्षों की अवधि के दौरान अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक विकास के अंतर को मिटा दिया जाए.’

लेकिन यूपीए सरकार को जो दो कार्यकाल मिले, उसमें आदिवासियों और दलितों के लिए आवंटित फंड को दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल किया गया, जिससे साफ होता है कि सिंह का यह भाषण महज शब्दों का आडंबर था. हालांकि सिंह और कांग्रेस अब सत्ता में नहीं हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलती दिख रही है.

भारत में लंबे समय से दमित दलित और वंचित आदिवासी इन सबके बीच मानो यह सवाल पूछ रहे हों कि हमारे लिए तय सारे पैसे आखिर कहां गए?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here