गुंडागर्दी का समाजवाद!

इन सबसे अनजान गोंडा के ही एक युवक आकाश अग्रवाल ने अपने फेसबुक अकाउंट पर स्थानीय अखबार में आई एक खबर साझा की, जिसमें लिखा था कि कैसे पुलिस वालों ने मंत्री पंडित सिंह की गाड़ी के शीशे से काली फिल्म उतारी. उस अखबार के पास जाने से आसान उन्हें आकाश को धमकाना लगा. उन्होंने आकाश के पिता की दुकान बंद करवाने के लिए पुलिस को भेजा, आकाश को फोन कर के गाली-गलौज की और धमकाया. यहां तक कि पुलिस आकाश के पिता को मंत्री ‘जी’ के पास लेकर गई जहां उन्हें कथित रूप से धमकाया गया कि उन्हें फर्जी आरोप में जेल भेजा जा सकता है और वो ‘मर के ही वहां से वापस आ पाएंगे’.

अगर राज्य में फैली अराजकता की स्थिति अब भी साफ न हुई हो तो राज्य के खनन मंत्री गायत्री प्रजापति के मुद्दे पर नजर डालिए. हाल ही में हुई एक घटना में लखनऊ में एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल की पूरी टीम (ओबी वैन के ड्राइवर और इंजीनियर सहित) के साथ बेरहमी से, उनके चैनल के दफ्तर के ही सामने मारपीट की गई. क्यों? क्योंकि चैनल ने प्रजापति के काले-कारनामों की खबर दिखाने की जुर्रत की. लखनऊ की मीडिया के लगातार दबाव के बाद लखनऊ के गौतमपल्ली थाने में मामला तो दर्ज किया गया पर अब तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है.

प्रजापति पहले ही कथित तौर पर अपने कार्यालय का दुरुपयोग करके सैकड़ों करोड़ की संपत्ति जमा करने के मामले में लोकायुक्त की जांच के घेरे में हैं. लोकायुक्त जस्टिस (रिटा.) एनके मेहरोत्रा ने पिछले साल दिसंबर में प्रजापति के खिलाफ जांच तब शुरू की, जब ओम शंकर द्विवेदी नाम के एक व्यक्ति ने प्रजापति और उनके रिश्तेदारों द्वारा गलत तरीकों से राज्य में हासिल की गई संपत्ति के बारे में 1,727 पृष्ठों की शिकायत याचिका दर्ज करवाई. उन पर अनिवार्य पर्यावरणीय मंजूरियों के बिना अपने सगे-संबंधियों को खनन लाइसेंस जारी करने का भी आरोप है. जैसे ही लोकायुक्त ने मंत्री के खिलाफ जांच और पूछताछ शुरू की, कथित रूप से उनके साथियों की खोली गई ये फर्जी कंपनियां बंद होने लगीं. शिकायत में उन पांच कंपनियों के भी नाम थे जिनमें प्रजापति की पत्नी और बेटा निदेशक थे.

दिलचस्प बात ये है कि आज लगभग 900 करोड़ की संपत्ति के मालिक प्रजापति 2002 में बीपीएल कार्ड होल्डर थे. 2012 में उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर का प्रमाण पत्र मिला है. इसी साल उन्होंने 1.13 करोड़ की पूंजी की घोषणा भी की थी. वर्तमान में वे लक्जरी गाड़ियों के एक बेड़े के मालिक हैं.

उत्तर प्रदेश के एक और मंत्री जो गलत कारणों से ही चर्चाओं में हैं, वो हैं कैलाश चौरसिया. कैलाश मिर्जापुर से विधायक और राज्य सरकार में बेसिक शिक्षा और बाल विकास मंत्री हैं. चौरसिया पर एक असिस्टेंट रोड ट्रांसपोर्ट ऑफिसर (एआरटीओ) चुन्नीलाल को पीटने का आरोप है. चुन्नीलाल ने चौरसिया की अनुचित मांग को न मानने पर ये सजा पाई.

चुन्नीलाल ने मीडिया को बताया, ‘एक दोपहर मंत्री जी ने मुझे अपने दफ्तर बुलाया और मेरे दफ्तर के एक क्लर्क को जॉइनिंग संबंधी कागज देने से मना किया. मैंने उन्हें बताया कि इस मामले में हाईकोर्ट का आदेश है और ऐसा करना बहुत जरूरी है वरना हम पर कोर्ट की अवमानना को लेकर कार्रवाई हो सकती है.’

उन्होंने आगे बताया कि इतना सुनते ही मंत्री उत्तेजित हो गए और उन्हेंे मारने- पीटने और गाली देने लगे. एआरटीओ ने कटरा पुलिस थाने में इसकी रिपोर्ट दर्ज करवानी चाही पर अब तक कोई रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है. पुलिस का कहना है कि उन्हें इस बारे में कोई शिकायत नहीं मिली है. चौरसिया को इस साल मार्च में, मिर्जापुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 1995 में हुए एक डाकिए को धमकाने और दुर्व्यवहार के मामले में दोषी पाया था. हालांकि मई में जिला अदालत ने उन्हें इस मामले से बरी कर दिया.

समाजवादी पार्टी की ‘प्रतिष्ठा’ को और बढ़ाने वाला नाम राज्यसभा सांसद चंद्रपाल सिंह यादव का है. पिछले दिनों उनकी एक सरकारी अधिकारी को धमकाने वाली ऑडियो क्लिपिंग सामने आई है. मामला तहसीलदार गुलाब सिंह के अवैध खनन में लिप्त एक ट्रैक्टर को जब्त करने से शुरू हुआ. चंद्रपाल ने उन्हें फोन कर के दबाव बनाया कि ट्रैक्टर छोड़ दिया जाए पर जब गुलाब सिंह ने ऐसा करने से मना कर दिया तब चंद्रपाल ने उन्हें खतरनाक नतीजों का डर दिखाकर धमकाना शुरू कर दिया. ऑडियो रिकॉर्डिंग में गुलाब सिंह कहते हैं, ‘सर, मुझे माफ कीजिए पर ये लोग सरकार की साख खराब कर रहे हैं, ये हमारे लिए शर्म की बात है कि दिन के उजाले में ये सब हो रहा है.’ जिस पर सांसद जवाब देते हैं, ‘तो क्या तुम सरकार की साख बढ़ा रहे हो?’ बात आगे बढ़ती है तो सांसद कहते हैं, ‘हां, बहुत अच्छे! तुम आला दर्जे के चोर हो. अगर अभी पैसा मिल जाता तो तुम तुरंत ट्रैक्टर छोड़ देते.’ जब इस पर भी तहसीलदार नहीं माने तब सांसद ने अपना तुरूप का पत्ता फेंका, ‘मुझे तुम्हें जिंदगी भर का सबक सिखाने में बस 24 घंटे लगेंगे. मैं कह रहा हूं, इसका नतीजा बहुत बुरा होगा.’

शायद इस अधिकारी को खुद को भाग्यशाली मानना चाहिए कि इस तकरार के बाद भी सिर्फ उनका तबादला हुआ. उन्हें झांसी से कानपुर देहात भेज दिया गया. ये देश का कड़वा सच है कि एक ईमानदार अफसर के कमजोर पड़ते ही एक भ्रष्ट नेता को इस तरह के कारनामे करने के लिए प्रोत्साहन मिल जाता है.

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