सीपीआई (एम) : पचास साल में ढाई कोस

हालांकि पार्टी ने ऐसे तत्वों को बाहर निकालने के लिए ‘शुद्धिकरण अभियान’ चलाया, लेकिन वह आंख में धूल झोंकने की कोशिश ही साबित हुई. असल में तीन दशकों से ज्यादा समय तक सत्ता में रही पार्टी में जिस तरह का अहंकार और निश्चिन्तता आ गई, उसने पार्टी में किसी तरह के बदलाव की संभावना खत्म कर दी. यहां तक कि सीपीआई (एम) का राज्य और केन्द्रीय नेतृत्व किसी भी तरह की आलोचना सुनने को तैयार नहीं था, विरोध की हर आवाज को दबा दिया गया. पार्टी ने उन वाम बुद्धिजीवियों और छोटी पार्टियों की आलोचनाओं और विरोध का जवाब दमन से दिया, जो उनसे सहानुभूति रखते थे. पार्टी नेतृत्व के इस रवैये ने उसे डुबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

लेकिन सीपीआई (एम) का मौजूदा संकट सिर्फ पश्चिम बंगाल-केरल में पराजय के कारण भर नहीं है. राजनीति में हार-जीत चलती रहती है. भाजपा 1984 के आम चुनावों में सिर्फ दो सीटें जीत पाई थी, लेकिन अगले डेढ़ दशक में वह गठबंधन के जरिए केंद्र की सत्ता में और तीन दशकों में अकेले दम पर दिल्ली की सरकार में पहुंच गई. सीपीआई-एम का संकट कहीं ज्यादा गहरा और बड़ा है. उसका संकट यह है कि वह इन 50 सालों में वाम राजनीति को तीन राज्यों से बाहर नहीं ले जा पाई. उलटे इन राज्यों के बाहर जैसे आंध्र प्रदेश, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में भी उसका प्रभाव लगातार सिकुड़ता और सिमटता गया है.

सीपीआई-एम की पचास साल की राजनीति की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान की बजाय हमेशा कोई कंधा खोजती रही

खासकर हिन्दी क्षेत्रों में वह जिस तरह से सांप्रदायिकता से लड़ने के नाम पर अपनी स्वतंत्र पहचान और राजनीति को त्यागकर सत्तालोलुप, भ्रष्ट, परिवारवादी-जातिवादी और अवसरवादी राजनीति करनेवाली मध्यमार्गी पार्टियों और उनके नेताओं की पिछलग्गू बन गई, उसके कारण उसका विस्तार तो दूर, जो जनाधार बचा था, वह भी उनका साथ छोड़कर मुलायम-लालू के साथ चला गया. सांप्रदायिकता से लड़ने के नाम पर सीपीआई (एम) ने जिस तरह से सामाजिक न्याय के नारे के नीचे जातियों की गोलबंदी और जोड़-गुणा की रणनीति को आगे बढ़ाया, उसकी सीमाएं और अंतर्विरोध शुरू से ही जाहिर थे, लेकिन बुरी तरह पिट जाने के बावजूद वह आज तक इस रणनीति से आगे नहीं बढ़ पाई है.

असल में, सीपीआई (एम) की पचास साल की राजनीति की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि वह राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की बजाय हमेशा कोई कंधा खोजती रही. आश्चर्य नहीं कि पार्टी एक पेंडुलम की तरह पहले कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ने के लिए गैर कांग्रेसी पार्टियों और यहां तक कि रणनीतिक रूप से भाजपा के साथ गलबहियां करने तक पहुंच गई और उसके बाद भाजपा के उभार को रोकने के नाम पर कांग्रेस के साथ ब्रेकफास्ट/डिनर करने लगी. इस रणनीति पर चलते-चलते एक दौर ऐसा आया कि सीपीआई (एम) और बाकी मध्यमार्गी पार्टियों के बीच फर्क करना मुश्किल हो गया.

यही नहीं, इस प्रक्रिया में सीपीआई (एम) एक रेडिकल बदलाव की वामपंथी-कम्युनिस्ट पार्टी के बजाय सरकारी वामपंथी पार्टी में बदलती गई, जहां उसका सबसे ज्यादा जोर पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा की सरकारों को बचाए रखने में लगने लगा. सरकार चलाने और उसे बनाए रखने के लिए वह मुद्दों को भी कुर्बान करने लगी. इसके कारण वह धीरे-धीरे अपने रेडिकल एजेंडे और मुद्दों को छोड़कर यथास्थितिवादी सरकारी पार्टी में तब्दील होती चली गई. पार्टी नेतृत्व में ऊपर से लेकर नीचे तक नौकरशाही हावी होने लगी, पार्टी जनसंघर्षों से दूर होने लगी, यहां तक कि खुद के शासित राज्यों में जनान्दोलनों के दमन पर उतर आई.

इसके साथ ही उसमें वह चमक और आकर्षण भी खत्म होने लगा, जो किसी भी वामपंथी/कम्युनिस्ट पार्टी के रेडिकल बदलाव के एजेंडे में सहज रूप से होता है. हैरानी की बात नहीं है कि सीपीआई (एम) की राजनीति और वैचारिकी आज छात्रों-युवाओं को उस तरह से आकर्षित नहीं कर पा रही है, जिस तरह से कुछ दशक पहले तक करती थी. इससे ज्यादा चौंकानेवाली बात क्या हो सकती है कि तीन राज्यों से बाहर उसकी ताकत और प्रभाव का चौथा राज्य माने जानेवाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में उसके छात्र संगठन-एसएफआई में पार्टी की राजनीतिक लाइन के खिलाफ खुला विद्रोह हो गया और पार्टी को पूरी यूनिट को भंग करना पड़ा.

इस सबके बीच ज्यादा चिंता की बात यह है कि अपने स्वर्ण जयंती वर्ष में राष्ट्रीय राजनीति में राजनीतिक और वैचारिक रूप से अप्रासंगिक होने के खतरे का सामना कर रहे सीपीआई (एम) के नेतृत्व में इस खतरे को लेकर कोई बेचैनी नहीं दिख रही है और न ही उससे निपटने की रणनीति, तैयारी और उत्साह है. उल्टे लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद देश-भर में वाम कार्यकर्ताओं के बीच पैदा हुई पस्त-हिम्मत, निराशा और हताशा के बीच वाम मोर्चे खासकर सीपीआई (एम) नेतृत्व की निश्चिन्तता और जैसे कुछ हुआ ही न हो (बिजनेस एज यूजुअल) का रवैया हैरान करनेवाला है.

अफसोस की बात यह है कि धर्मनिरपेक्षता जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण विचार और मुद्दे को जिस सिनिकल तरीके से कांग्रेस और दूसरी मध्यमार्गी पार्टियों के भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अवसरवाद और निक्कमेपन को छुपाने के लिए इस्तेमाल किया गया है, उसके लिए सीपीआई (एम) कम जिम्मेदार नहीं है. इससे आज धर्मनिरपेक्षता का विचार संकट में है. कहने की जरूरत नहीं है कि धर्मनिरपेक्षता के विचार को आम लोगों के रोजी-रोटी और बेहतर जीवन के बुनियादी सवालों और बेहतर प्रशासन की जिम्मेदारी से काटकर सिर्फ भाजपा को रोकने के लिए जोड़-तोड़ का पर्याय बना देने की सिनिकल राजनीति अब अपने अंत पर पहुंच गई है.

लेकिन अगले साल अप्रैल में पार्टी कांग्रेस की तैयारी कर रही सीपीआई (एम) से जिस तरह की खबरें आ रही हैं, उससे यह आशंका बढ़ रही है कि भाजपा के जबरदस्त उभार के बाद अपनी गलतियों उर्फ ऐतिहासिक भूलों से सीखने के बजाय वह एक बार फिर चुकी और नकारी हुई कांग्रेस और दूसरी अवसरवादी मध्यमार्गी पार्टियों का गठबंधन बनाने की कोशिशें शुरू कर सकती है. यह आत्महत्या के अलावा और कुछ नहीं होगा. आम चुनावों का साफ सन्देश है कि लोग अस्मिताओं की अवसरवादी, संकीर्ण और सिनिकल राजनीति से ऊब रहे हैं, उनकी आकांक्षाएं बेहतर जीवन की मांग कर रही हैं और वे वैकल्पिक राजनीति को मौका देने के लिए तैयार हैं.

अगर सीपीआई (एम) अब भी नहीं संभली, तो हाशिए पर पहले ही पहुंच चुकी थी, अब उन्हें अप्रासंगिक होने और खत्म होने से कोई बचा नहीं सकता है

यह सीपीआई (एम) के लिए सबक है और आखिरी मौका भी. अगर वे अब भी नहीं संभले, तो हाशिए पर पहले ही पहुंच चुके थे, अब उन्हें अप्रासंगिक होने और खत्म होने से कोई बचा नहीं सकता है. कहने की जरूरत नहीं है कि भारतीय राजनीति में वामपंथ के पुनर्जीवन का कोई शार्ट-कट नहीं है. वामपंथ के लिए एकमात्र रास्ता खुद को वामपंथ की स्वतंत्र पहचान के साथ खड़ा करना ही है. वामपंथ को वामपंथ की तरह दिखना होगा.
वामपंथ की पहचान और ताकत जनान्दोलन रहे हैं और जनान्दोलनों से ही वैकल्पिक राजनीति और विकल्प बने हैं. लेकिन क्या सीपीआई (एम) इसके लिए तैयार है?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षाविद् हैं)

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