कोई जिद नहीं है. मैं खुद को िक्रएटिव बनाए रखने के लिए काम करता हूं, मुंबई के लिए नहीं. ‘पुरुष’ फिल्म के दौरान राजकुमार संतोषी ने एक फिल्म की कहानी मांगी थी. मैंने हां कह दिया था लेकिन फिर मुंबई नहीं गया. मुझे होटलों में रहकर स्क्रिप्ट और कहानी लिखना पसंद नहीं. मैं अपनी जमीन पर रहकर काम करना चाहता हूं. जिससे मन मिलेगा, काम करूंगा, नहीं तो कोई बात नहीं. मैंने कभी अपनी आकांक्षाएं उतनी बड़ी की ही नहीं कि मेरे मन पर मंुबई का मोहपाश भारी पड़ जाए. एक बार विक्रम चंद्र ने कहा कि आप गया में क्या कर रहे हैं, आपको मुंबई में होना चाहिए. मैंने उनसे कहा कि आप मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के लिए लिखते हैं तो आप लंदन में क्या कर रहे हैं? बात हंसी-हंसी में खत्म हो गई.

    mrityudand-web

    आपकी जानकारी में दशरथ मांझी पर और किन लोगों ने फिल्म बनाने की कोशिश की?

    हमेशा ही कोई न कोई बात करता रहा. रुबीना गुप्ता ने तो डॉक्यूमेंट्री भी बनाई. उस डॉक्यूमेंट्री के लिए मैंने एक कविता भी लिखी, ‘ बोल देने से नहीं होता है प्रेम. क्रांति महज इतन नहीं है कि बोल दो नारा. उठा लो शस्त्र. प्रेम करना सीखो. जैसे यह श्वेत पुष्प जीना सीखता है रक्त समुदाय के साथ. मेरे भीतर.’

    और भी कई लोगों ने कोशिश की. कुछ तो कहते हैं िक उन्होंने  दशरथ मांझी से जीते-जी लिखवा लिया था कि वे लिख दे कि उन पर फिल्म बनाने का अधिकार सिर्फ उनका ही होगा लेकिन केतन मेहता इसमें बाजी मार ले गए. दशरथ मांझी पर साहित्य हमेशा उपलब्ध रहा लेकिन साहित्य के क्रूर यथार्थ को लोक की रुचि के अनुसार सत्य में ढालने का काम ही तो निर्देशक का होता है, सिनेमा वही तो करता है और उस कहानी को केतन फिल्म के जरिये दर्शकों के सामने रखी.

     

    आपने कहा कि होटलों में रहकर कहानियां लिखने से वह बात नहीं आ पाती. क्या आज की फिल्मों के साथ ऐसा ही है?

    नहीं, ऐसा कैसे कह सकते हैं. एक से एक फिल्में आ रही हैं. अच्छी कहानियां लिखी जा रही हैं. अनुराग कश्यप की फिल्में हैं, राजकुमार हिरानी की फिल्में हैं और भी कई कहानियां हैं. दम लगा के हईशा, मसान… कई फिल्में आई हैं लेकिन मल्टीप्लेक्स के दौर में बड़े स्टार को ध्यान में रखकर कहानियां लिखी जाने लगीं तो फिल्मों का मामला गड़बड़ा गया. बड़े स्टार साल में कितनी फिल्में कर सकते हैं और स्टार हैं ही कितने! इसलिए स्टार के दायरे से फिल्मों को निकालना होगा. वह निकलने भी लगा लेकिन फिर वही प्रेम और शादी के इर्द-गिर्द फंसता गया. प्रेम, शादी के इतर की दुनिया भी है, जो सिनेमा का इंतजार कर रही है. सिनेमा में कुछ निर्देशक उस इतर दुनिया को तो सामने ला रहे हैं लेकिन अब भी गांव की वापसी का रास्ता नहीं दिख रहा. गांव को भी तो वापस लाना होगा.

    गांव भी तो अब पहले जैसे नहीं रहे?

    क्या बात कर रहे हैं आप? देखिए चलकर, एक से एक गांव मिलेंगे और उन गांवों में एक से एक कहानियां मिलेंगी. मध्ययुगीन क्रूरता अब भी मिलेगी.

    केतन की फिल्म की स्क्रिप्ट आपने देखी होगी. क्या वे असल दशरथ मांझी को लेकर आ रहे हैं?

    मैंने कहा न कि सहमति-असहमति कई बिंदुओं पर हो सकती है लेकिन केतन को बधाई दीजिए िक वे इसे कर रहे हैं. तीन दशक तक फिल्म इंडस्ट्री के लोग इस कहानी को अविश्वसनीय ही मानते रहे और अब केतन ने इसे पूरा किया है. बाकी कई बिंदुओं पर असहमति हो सकती है, वह अलग बात है. अब जब यह फिल्म चल रही है तो याद रखिए कि दशरथ जैसे मामूली लोगों को लेकर बायोपिक फिल्मों का दौर लौटेगा और तब कई मांझियों की कथा सेल्यूलॉयड के जरिये सामने आएगी. गांव-कस्बों में एक से बढ़कर एक नायक हुए हैं, जिनकी कहानियां दुनिया को प्रेरित कर सकती हैं. जैसे दशरथ की कहानी में खास है कि एक मजदूर ने प्रेम की ऐसी निशानी दी कि शहंशाह का प्रेम हाशिये पर चला गया, वैसी ही कई कहानियां हैं अपने देश में.

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here