09 अगस्त 1991 : सुप्रीम कोर्ट ने बीडी शर्मा बनाम भारत सरकार मामले में आदेश दिया कि सरकार द्वारा छह महीने के अंदर विस्थापित लोगों का अनिवार्य रूप से पुनर्वास किया जाए.

    18 जून 1992 : विश्व बैंक के एक स्वतंत्र समीक्षा संस्था ‘मॉरिस कमेटी’ की रिपोर्ट जारी. रिपोर्ट में बैंक को सरदार सरोवर परियोजना से अलग होने की अनुशंसा की गई.

    26 जून 1992 : 16 देशों की 42 संस्थाओं द्वारा समर्थित नर्मदा इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स पैनल ने अपनी रिपार्ट जारी की.

    20 जुलाई 1994 : पांच सदस्यों वाली एक स्वतंत्र समिति ने अपनी रिपोर्ट भारत सरकार को दी. इसी साल कानूनी विवादों के चलते बांध बनाने का काम रोक दिया गया.

    1999 : सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बांध का काम फिर से शुरू हुआ.

    07 जनवरी 2002 : मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पुनर्वास और पुनर्सुधार के लिए पीड़ितों को नकद राशि देने की योजना की शुरुआत हुई.

    14 अप्रैल 2003 : सुप्रीम कोर्ट ने बांध की ऊंचाई 95 मीटर से 100 मीटर बढ़ाने का आदेश दिया.

    16 जून 2005 : मध्य प्रदेश सरकार ने विशेष पुनर्वास अनुदान में बदलाव कर उसे विशेष पुनर्वास पैकेज में बदल दिया, जिसमें रकम के बदले जमीन देने की बात की गई. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पुनर्वास और विस्थापन की व्यवस्थाएं पर्याप्त नहीं थीं.

    2006 : बांध के काम को और बढ़ाने के लिए आवेदन दिया गया, जिस पर नर्मदा बचाओ आंदोलन ने भूख हड़ताल की पर काम जारी रहा. साथ ही पुनर्वास और विस्थापन परियोजना असफल हो गई.

    23 फरवरी 2009 : मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जस्टिस झा कमीशन को निर्देश दिया कि सरदार सरोवर बांध परियोजना पुनर्वास और पुनर्सुधार में हो रहे घपले की जांच करे.

    24 जून 2010 : सरदार सरोवर बांध की समीक्षा करने वाले जस्टिस शाह आयोग की रिपोर्ट भोपाल में जारी. इसमें पूर्ण पुनर्वास और पर्यावरण सुरक्षा की सिफारिश की गई.

    12 दिसंबर 2014 : नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 17 मीटर बढ़ाने के विरोध में सुप्रीम कोर्ट में अपील.

    (स्रोत : नर्मदा: 30 ईयर्स ऑफ रेजिलेंस)

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    जीवनशाला : संघर्ष और निर्माण साथ-साथ

    नर्मदा बचाओ आंदोलन और इससे जुड़े लोगों ने परियोजना के विरोध के साथ कई रचनात्मक काम भी किए हैं, जिसमें बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल की स्थिति में सुधार जैसे काम शामिल हैं. आंदोलन द्वारा संचालित ‘नर्मदा नवनिर्माण अभियान’ ट्रस्ट दूरदराज के डूब क्षेत्रों में जीवनशाला चलाता है. आंदोलन के दौरान पता चला कि इन इलाकों में स्कूल नहीं हैं और अगर हैं भी तो ठीक से चलते नहीं. आंदोलन से जुड़ीं परवीन जहांगीर बताती हैं, ‘शुरू में सरकार पर इन इलाकों में स्कूल खोलने के लिए दबाव बनाया गया. लगातार आवेदन दिए गए लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही. तब आंदोलनकारियों और समुदाय ने खुद पहल करते हुए जीवनशाला स्कूल खोला. 1991 में पहली जीवनशाला शुरू हुई जो कि महाराष्ट्र के चिमलखेड़ी और नीमगांव में थी. यहां वर्तमान में नौ जीवनशालाएं चल रही हैं, जिसमें 7 महाराष्ट्र और 2 मध्य प्रदेश में हैं. यहां कुल 910 बच्चे पढ़ते हैं. महाराष्ट्र की जीवनशालाओं में 780 और मध्य प्रदेश में 130 बच्चे हैं. वर्तमान में कुल 40 शिक्षक हैं. इसके अलावा हर जीवनशाला में एक मौसी (खाना बनाने के लिए) और एक कमाथी (सहायक) होते हैं. ये शालाएं आवासीय होती हैं. यहां 6 वर्ष से ऊपर के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा दी जाती है. मध्य प्रदेश की जीवनशालाओं में पहली से 5वीं तक शिक्षा दी जाती है, वहीं महाराष्ट्र में पहले यह चौथी तक था, अब उसे 5वीं कक्षा तक किया गया है. 2012-13 से महाराष्ट्र की जीवनशालाओं को राज्य सरकार से मान्यता भी मिल गई है.’ परवीन बताती हैं, ‘सभी जीवनशालाओं को सर्व शिक्षा अभियान के तहत किताबों के अलावा कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती है और इसके लिए भी बहुत संघर्ष करना पड़ता है.’

    jeevan shala WEB

    जीवनशालाएं महात्मा गांधी की बुनियादी तालीम की सोच पर आधारित हैं, जिसमें जीवन कौशल और पढ़ाई साथ-साथ होती है. यहां सामुदायिक जीवन निर्वाह, आत्मनिर्भरता, सहयोग, आदिवासी संस्कृति, पर्यावरण व प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण जैसे नैतिक मूल्यों की शिक्षा दी जाती है. पढ़ाई की शुरुआत मातृभाषा में होती है फिर दूसरी भाषाएं सिखाई जाती हैं. किताबों का अनुवाद भी स्थानीय बोलियों में किया गया है. इन किताबों में अन्य बातों के अलावा स्थानीय समाज-संस्कृति के बारे में भी जानकारी दी गई है. परवीन बताती हैं, ‘यहां से दो लड़के एथलीट भी बने हैं जिन्होंने राज्य और राष्ट्रीय स्तर कई पदक जीते हैं. इसी तरह से महाराष्ट्र में खेलों को बढ़ावा देने वाली क्रिया प्रबोधनी परीक्षा में जीवनशाला के बच्चे भी बैठे थे. नंदूरबार जिले से इस परीक्षा में केवल दो बच्चों का चयन हुआ, ये दोनों ही बच्चे जीवनशाला से हैं.’

    जीवनशालाएं लोगों द्वारा दिए गए व्यक्तिगत चंदे और समुदाय के सहयोग से चलती हैं. समुदाय जो भी उगाता है, उसमें से थोड़ा हिस्सा बच्चों को देता है. समुदाय को जीवनशाला से जोड़ा भी गया है. समुदाय से लोगों को देख-रेख कमेटी में चुना जाता है जो कि निगरानी का काम करते हैं. जीवनशालाओं के अलावा महाराष्ट्र के धड़गांव में एक छात्रवास भी चलाया जा रहा है, जहां वर्तमान में 23 बच्चे रहकर 5वीं के बाद दूसरे स्कूलों में आगे की पढ़ाई कर रहे हैं. परवीन जहांगीर बताती हैं, ‘जीवनशाला से हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि दूरदराज के आदिवासी बच्चों को भी शिक्षा का अधिकार मिले.’

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    [ilink url=”http://tehelkahindi.com/medha-patkars-take-on-narmada-bachao-andolan/” style=”tick”]मेधा पाटकर का साक्षात्कार [/ilink]

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