लालू प्रसाद जानते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में सवर्णों से बार-बार माफी मांगने, सवर्णों के मठों में रात-रात भर घूमकर चंदा देने, अच्छी-अच्छी बातें बोलने के बावजूद सवर्णों ने उनका साथ नहीं दिया था तो इस बार के विधानसभा चुनाव में उसकी संभावना तो और दूर-दूर तक नहीं. इसलिए वे ऐसा करेंगे और यह उन्हें फायदा भी पहुंचाएगा. हालांकि नीतीश इससे खुद की छवि को ध्यान में रखते हुए अनकंफर्ट महसूस करेंगे लेकिन उनके पास दूसरा रास्ता नहीं होगा. लालू प्रसाद अपनी ताकत जानकर ही नीतीश कुमार से साफ कर चुके हैं कि उन्हें बराबरी का सीट चाहिए. नीतीश 2010 के विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के लिए अर्जित सीट का वास्ता देकर लालू प्रसाद को कम सीटों पर सिमटाना चाहते थे लेकिन लालू प्रसाद ने पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में नीतीश की स्थिति की याद दिलाकर उन्हें बैकफुट पर जाने को मजबूर किया. लालू प्रसाद आगे की राजनीति भी जानते हैं कि अगर सीटों के बराबर बंटवारे में उन्हें नीतीश से ज्यादा सीटें मिल गईं तो फिर वे बिहार की राजनीति का मुहावरा भी बदलने की कोशिश करेंगे और नीतीश कुमार के संगी-साथी यह जानते हैं कि लालू प्रसाद के मजबूत होने के बाद भाजपा से ज्यादा मुश्किलें नीतीश कुमार के लिए ही आने वाली हैं.

    Lalu Rally-web

    लेकिन इतनी संभावनाओं के बावजूद, मजबूरी में ही मजबूती की संभावना बनने के बावजूद लालू प्रसाद के पास जो छोटी-छोटी चुनौतियां हैं, उससे ही पहले पार पाना होगा. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘चुनौतियां और संभावनाएं तो राजनीति में आती-जाती रहती हैं लेकिन यह सच है कि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का समर्थक समूह अथवा वोट बैंक ऐतिहासिक बिखराव की ओर है. न तो यह गोलबंदी एक दिन में हुई थी, न बिखराव की स्थिति एक दिन में आई है. एक लंबी प्रक्रिया के बाद बिखराव की स्थिति बनी है और ऐसे में लालू प्रसाद को सिर्फ अपने बिखराव पर ही पूरी ऊर्जा लगानी होगी. वे नया कुछ हासिल  नहीं कर पाएंगे लेकिन वे बिखराव को जितना ज्यादा रोक पाएंगे, उतना ही सफल होंगे.’

    नीतीश-लालू दोनों के साथ लंबी राजनीतिक पारी खेल चुके बिहार के चर्चित नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘लालू प्रसाद की भूमिका सामाजिक न्याय की राजनीति में नीतीश कुमार की तुलना में सदा ही ज्यादा रही है. लालू प्रसाद इस बार नीतीश के लिए खेवनहार बन सकते हैं, उसकी संभावना कम है. ज्यादातर चुनौतियां लालू प्रसाद के लिए हैं. उनके लिए चुनौती अपनी जाति की राजनीति में भी है.’

    बेशक आज लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव जैसे तीन प्रमुख यादव नेता एक साथ, एक छोर पर हैं और यह परिघटना वर्षों बाद हुई है लेकिन बिहार में शरद यादव और मुलायम सिंह यादव की ज्यादा चलती नहीं है. बिहार में कई दूसरे ताकतवर यादव नेता आज लालू प्रसाद से दूसरे छोर पर हैं. नंदकिशोर यादव पहले से ही भाजपा में हैं और प्रमुख नेता रहे हैं. अब लालू के अहम संगी साथी और उनकी बेटी मिसा भारती को हराकर संसद पहुंचे रामकृपाल यादव भी भाजपा के साथ हैं. भोजपुर के इलाके में एक छोटे दायरे में ही पकड़ रखने वाले ददन पहलवान दूसरी ओर हैं. लालू प्रसाद के चर्चित साले साधु यादव भी अपनी पार्टी बनाकर अलग ताल ठोंक रहे हैं. इन सबके बाद पप्पू यादव भी अब लालू प्रसाद के साथ नहीं हैं, जिनकी कोसी इलाके में पकड़ मानी जाती है और भाजपा की आंधी में भी लोकसभा चुनाव में अगर कोसी के इलाके में भाजपा का प्रभाव नहीं जम सका था तो उसमें पप्पू यादव की ही भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई थी. पप्पू यादव कहते हैं, ‘व्यक्तिगत तौर पर लालू प्रसाद मेरे लिए आदरणीय हैं लेकिन वे जिस तरह की राजनीति करना चाहते हैं, हम उसके विरोध में खडे़ हुए हैं.’ लालू प्रसाद कहते थे, ‘रानी के पेट से नहीं मेहतरानी के पेट से भी राजा जनमेगा’, तो फिर क्यों वे अपने ही परिवार के बाहर नहीं सोच पा रहे. पहले राबड़ी देवी को लाए. बाद में बेटी को लाना चाहा. अब बेटों को आगे करना चाह रहे हैं. वे क्यों यादवों को अपनी जागिर समझ रहे हैं. पप्पू कहते हैं, ‘जिस नीतीश कुमार की वजह से यादव जंगलराजी जाति बने, उसी नीतीश कुमार के साथ मिलकर लालू प्रसाद कौन-सी राजनीति करना चाहते हैं, यह साफ नहीं है.’ हालांकि पप्पू यादव अपनी राजनीतिक भाषा बोल रहे हैं. वे लालू प्रसाद से अलग हुए हैं तो विरोध में बोलेंगे ही, लेकिन उन्होंने एक मसला उठाकर लालू को परेशानी में डाल दिया था. पप्पू ने कहा था कि अगर विरासत परिवार को ही सौंपनी है तो मिसा को क्यों नहीं? बेटों को क्यों? यह लालू प्रसाद के सामने एक ऐसा सवाल था, जिसका जवाब देना उनके लिए आसान नहीं था. हालांकि लालू प्रसाद ने पप्पू को जवाब दिया और कहा कि उनके बेटे ही उनकी विरासत को संभालेंगे.

    लालू प्रसाद ने भले ही यह कह दिया हो कि उनके बेटे ही उनकी विरासत को संभालेंगे लेकिन सूत्र बताते हैं कि इसे लेकर परिवार में भी कोई कम कलह नहीं है. उनकी बेटी मिसा भारती, जो पिछले लोकसभा चुनाव में जोरशोर से दानापुर से मैदान में उतरी थी और जिनकी जीत सुनिश्चित कराने के लिए लालू प्रसाद यादव ने दानापुर क्षेत्र के दबंग और जेल में बंद रितलाल यादव तक से समझौते किये थे, वह मिसा चुनाव नहीं जीत सकी थीं. मिसा भले चुनाव नहीं जीत सकी थी लेकिन लोगों ने यह माना था कि लालू की उत्तराधिकारी उनके परिवार में वही हो सकती हैं, क्योंकि वह क्षेत्र में जिस अंदाज में प्रचार कर रही थीं, उससे उनमें बहुत संभावना दिखी थी. लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद मिसा दरकिनार कर दी गई हैं. राबड़ी देवी पोस्टरों पर चमक रही हैं लेकिन वह चुनाव नहीं लड़ेंगी, ऐसा ऐलान हो चुका है. लालू प्रसाद के दोनों बेटे चुनाव मैदान में उतरेंगे, इसका एेलान भी हो चुका है लेकिन उनके उतरने पर क्या होने वाला है, इसके संकेत भी मिल चुके हैं.

    बहरहाल, महुआ विधानसभा क्षेत्र में जैसे ही लालू प्रसाद के बेटे ने अपने को वहां का प्रत्याशी घोषित किया, सबके सामने ही राजद कार्यकर्ता आपस में सिरफुटव्वल और गालीगलौज कर दिखा चुके हैं कि लालू अपने परिवार को इतनी आसानी से अब थोप नहीं सकते. महुआ में लालू प्रसाद के सामने ही कार्यकर्ताओं की लड़ाई होती रही और वह कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं रह गए थे. बस तमाशबीन भर बने हुए थे. लालू प्रसाद के लोग जानते हैं कि मिसा को एक झटके में दरकिनार कर, दोनों बेटों को दो सीटों से लड़वाकर लालू प्रसाद अपने परिवार की राजनीति को अगर शांत भी कर लेते हैं तो टिकट बंटवारे के समय ऐसे कई ‘महुआकांड’ उन्हें झेलने पड़ सकते हैं और राजद में होने वाली बगावत का असर उनकी पूरी रणनीति पर पड़ेगा. पप्पू यादव का समर्थन कर भाजपा इसलिए ही आगे बढ़ा रही है कि लालू प्रसाद के जो बगावती होंगे, उन्हें वे अपनी पार्टी में लेकर मजबूती से चुनाव में उतार देंं, ताकि वोटों का बंटवारा हो और लालू प्रसाद का कुनबा बिखर सके. भाजपा के लिए नीतीश नहीं लालू ही चुनौती हैं, इसलिए भाजपा नीतीश से ज्यादा लालू पर ही वाक प्रहार कर रही है और पूरे चुनाव में करती भी रहेगी.

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here