तकरीबन चालीस साल की अपनी गायिकी में बेगम अख़्तर ने जिस चीज को गा दिया वो अमर हो गई. बहज़ाद लखनवी कहा करते थे कि वो हश्र तक सिर्फ इसी वजह से याद रखे जाएंगे क्योंकि बेगम अख़्तर ने उनको गा दिया. बेगम अख़्तर ने बहज़ाद की कई ग़ज़लें गाईं जिनमें ‘दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे…’ सबसे कामयाब हुई. सिर्फ बहज़ाद ही नहीं उस दौर के तमामतर शाइरों की ख़्वाहिश ये थी कि बेगम अख़्तर उनका कलाम गा दें. 1970 में जब शकील बदायूंनी बीमार पड़े और मृत्युशैय्या पर उन्होंने अपनी आिख़री ग़ज़ल ‘मेरे हमनफ़स मेरे हमनवा’ कही, तो उनकी भी आख़िरी ख्वाहिश यही थी कि बेगम अख़्तर उनकी इस ग़ज़ल के साथ इंसाफ़ कर दें. बेगम अख़्तर ने शकील की आख़िरी ख्वाहिश का एहतराम करते हुए इस ग़ज़ल को यूं गाया कि ये ग़ज़ल हमेशा के लिए बेगम अख़्तर की पहचान बन गई. बेगम ने शकील की कई ग़ज़लें गाईं, जिनमें ‘ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया, ज़िंदगी का दर्द लेकर इंक़लाब आया तो क्या…’ वगैरह बहुत कामयाब हुईं. कैफी से उनके रिश्ते की बात पहले हो चुकी है. फ़ैज़ एवं मजरूह के कलाम को भी उन्होंने गाकर मकबूलियत दी. कुछ तो दुनिया की इनायात के साथ सुदर्शन फाकिर को भी बेगम अख़्तर ने जाविदां कर दिया. अपने समकालीनों के अलावा बेगम ने पुराने शाइरों को भी शिद्दत से गाया. मीर, ग़ालिब, ज़ौक और मोमिन को पहली बार आवाम के बीच उनकी गायिकी ही ले गई. ‘वो जो हममें तुममें क़रार था’, ‘उल्टी हो गईं सब तदबीरें’ और ‘ज़िक्र उस परीवश’ की कशिश कौन भूल सकता है. ग़ज़लों के अलावा ‘कैसी धूम मचाई’, ‘कोयलिया मत कर पुकार’, ‘हमरी अटरिया पे आओ संवरिया’, ‘ज़रा धीरे से बोलो कोई सुन लेगा’, ‘चला हो परदेसी नैना लगाए’ जैसे असंख्य ठुमरी-दादरे भी बेगम अख़्तर की तरन्नुम पर इतराते हैं. इसके अलावा मज़हबी कलाम भी उन्होंने बहुत गाया. अवध के मोहर्रम से उनका रूहानी रिश्ता था.

गायन के क्षेत्र में जैसा सम्मान बेगम अख़्तर ने कमाया वैसा लता मंगेशकर के अलावा मुल्क की किसी गायिका के हिस्से मे नहीं आया. बेगम अख़्तर ख़ुद लता मंगेशकर और उनके बाद की तमाम गायिकाओं की प्रेरणा रहीं हैं. दोनों से एक रूहानी रिश्ता रखनेवाले मिश्र बताते हैं- ‘बेगम अख़्तर और लता मंगेशकर के बीच जो संबंध है, उसके संयोजक मदन मोहन साहब हैं. लता मंगेशकर ने उनके लिए बहुत सी कालजयी ग़ज़लें गाईं हैं. मदन मोहन जब भी किसी नई ग़ज़ल की धुन तैयार करते थे, तो सबसे पहले उसे बेगम अख़्तर को सुनाते थे और बेगम उसमें ज़रूरी तरमीम करतीं थीं. इसके बाद लताजी इन धुनों को जैसे गाती थीं, मदन मोहन उसे भी बेगम को सुनाते थे और बेगम लता की गायिकी से जुड़े सुझाव भी मदन मोहन को देती थीं. कई दफ़ा तो उन्होंने मदन मोहन से ये तक कहा कि तुम लता की आवाज़ को ठीक तरह इस्तेमाल नहीं कर पाए. इस तरह लता मंगेशकर, मदन मोहन और बेगम अख़्तर तीनों का एक दूसरे से ग़ज़ल का रिश्ता था’. मिश्र कहते हैं कि लता मंगेशकर ने उन्हें बताया कि अपना एक गाना मुझे ख़ास पसंद नहीं है, लेकिन बेगम अख़्तर को ये बहुत पसंद था. गाना था ‘मेरा गांव मेरा देश’ (1971) फिल्म का- ‘मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए…’. लता मंगेशकर को हैरत होती है, संजीदा गायनवाली बेगम साहिबा को ये गाना कैसे पसंद आया?

अपनी आवाज़ और शख़्सियत से अपने मुरीदों को हैरत में डालना बेगम अख़्तर का सबसे पसंदीदा शग़ल था. महान फ़िल्म संगीतकार नौशाद बेगम अख़्तर के बारे में कहते थे- ‘उनकी आवाज़ सुननेवाले को चुंबक की तरह खींचती है’. इस चुंबक की ताकत सदियों तक बरकरार रहेगी. इस ताकत को अगर दो मिसरों में बयान करना हो, तो मोमिन के इस शेर से बेहतर कुछ नहीं-

उस ग़ैरत-ए-नाहीद की हर तान है दीपक

शोला सा लपक जाए है आवाज़ तो देखो!

(लेखक शोधार्थी एवं किस्सागो हैं)

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