झारखंड को लगा हिंसा का रोग

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बड़ा सवाल यह कि एक ही तरह की घटनाएं एक साथ चार जगहों पर कैसे हुईं? और इसके बाद भी एक बार मामला शांत हो जाते ही पुलिस प्रशासन इतना भी मुस्तैद क्यों नहीं रह सका कि दो दिन बाद फिर से आधी रात को अशांति की कोशिशें तेज हो गईं? बकरीद वाली घटना के ठीक तीन दिनों बाद रात करीब बारह बजे डोरंडा के उसी इलाके में, जहां पहले घटना घटी थी, फिर उत्पात हुआ. रात बारह बजे के करीब आठ-दस लोग मोटरसाइकिल से वहां पहुंचे और कई राउंड गोलियां चलीं, घरों को जलाया गया. आधी रात को एक जमात के लोगों ने घर छोड़कर दूसरे के घरों में शरण ली, पास में पुलिस बल मौजूद थे लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया गया.

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दोबारा घटी इस घटना से रांची में फिर से डर का माहौल है. रांची के सामाजिक कार्यकर्ता हुसैन कच्छी कहते हैं, ‘यह बाहरी तत्वों की खुराफात है, जो माहौल को बिगाड़ना चाहते हैं.’ इसी तरह की बात रांची के संस्कृतिकर्मी दिनेश सिंह भी कहते हैं. बकौल दिनेश, ‘यह साफ लग रहा है कि कुछ लोग हैं, जो रांची और झारखंड को अशांत करना चाहते हैं. लेकिन सवाल यह है कि वे क्यों ऐसा करना चाहते हैं. उनका मकसद क्या है?’

उपद्रव की शुरुआत राजधानी रांची के डोरंडा से होते हुए दूसरे शहरों में पहुंचती रही और वहां भी उपद्रव होता रहा. रांची से सटे लोहरदगा जिले के कुड़ू के एक गांव लावागाई में शनिवार को ऐसी ही घटना घटी, वहां भी बवाल हुआ और फिर अगले दिन रविवार को लोहरदगा बंद का आह्वान किया गया. पलामू के सतबरवा इलाके में एक ठाकुरबाड़ी और फिर चतरा के प्रतापपुर जैसे कुख्यात व चर्चित नक्सली इलाके के एक गांव हुमागंज के देवी मंदिर से भी ऐसी ही खबर आई. इन इलाके में भी बंद हुए. बंद शांतिपूर्ण ही रहे लेकिन उपद्रव की ये घटना जंगल की आग की तरह राज्यभर में फैलती रही.

पुलिस प्रवक्ता एडीजी एसएन प्रधान कहते हैं, ‘हम अभी इस विषय पर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं. जांच चल रही है. कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया है. जब तक कुछ ठोस सामने नहीं आता, कुछ कहा नहीं जा सकता.’ मुख्यमंत्री रघुबर दास का भी बयान आया, ‘यह कुछ मनचलों और शरारती तत्वों का काम है.’ इस पूरे मामले में असल सवाल पीछे छूट रहे हैं कि आखिर यह घटना क्यों घटी? और इतनी सख्ती और मुस्तैदी के बावजूद इसका दायरा बढ़ता क्यों रहा? रांची में तो धारा 144 लगाकर ही काम चल गया लेकिन जमशेदपुर में कर्फ्यू लगाना पड़ा.

घटना को किसने अंजाम दिया, यह पता नहीं चल पा रहा. कुछेक लोग दबी जबान में कह रहे हैं कि रघुबर दास को बदनाम करने और उन्हें पदच्युत करने के लिए उनके लोग भी ऐसा खेल कर सकते हैं. वहीं कुछ लोगों का कहना है कि रांची की इस घटना का असर बिहार चुनाव पर पड़ेगा, हिंदुओं की गोलबंदी होगी, इसलिए यह सोची समझी साजिश भी हो सकती है. हालांकि ऐसा कहने के पीछे कोई आधार अभी तक सामने नहीं आ सका है. पटना और रांची के बीच गहरा रिश्ता है. रोजाना हजारों लोगों का आना-जाना होता है. सिर्फ रांची ही नहीं, झारखंड के चार प्रमुख शहर रांची, जमशेदपुर, धनबाद और बोकारो से बिहार का गहरा रिश्ता है. रांची में घटना घटने के बाद चतरा और पलामू में भी इसकी लपटें पहुंची थीं.

पुलिस प्रवक्ता एसएन प्रधान कहते हैं, ‘अब तक कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं, जिस आधार पर इसे राजनीतिक घटना कहा जा सके.’ प्रधान की बात सही है. संभव है इसका कोई सीधा कनेक्शन बिहार चुनाव से न हो लेकिन ये सच है कि इस घटना की आग न सही, आंच तो पटना तक पहुंचेगी.

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