जनता टॉकीज

IMG_9157gggggबहरहाल, 6 से 9 वाला शो साढ़े आठ से कुछ पहले खत्म हुआ. 9 बजे तक के खाली समय में हरिंदर पुराने गाने दिखाते हैं. अगर आम मध्यमवर्गीय लोग फिल्म देखने जाते हैं तो सबसे पीछे की सीट चुनते हैं लेकिन यहां स्थिति अलग है. जो पहले आता है वह सबसे आगे की बेंच पर बैठने की कोशिश करता है ताकि स्क्रीन और बड़ी नजर आए.

यहां आने वाले दर्शक भी अनूठे हैं. हॉल में करीब 25-30 लोग मौजूद हैं. इसमें आरा, बिहार के रहने वाले विजय भी हैं. 38 साल के विजय बेलदारी का काम करके महीने में 9 हजार रुपये तक कमा लेते हैं और ममूरा में ही किराये पर चार लोगों के साथ कमरा साझा करते हैं. कुल मिलाकर 500 रुपये कमरे का किराया पड़ता है. खाने का खर्च निकालकर बाकी बचे पैसे घर भेज देते हैं. आज 9 से 12 के शो में फिल्म ‘नो एंट्री’ देखने पहुंचे हैं. विजय बताते हैं, ‘कमरे पर टीवी नहीं है. दूसरा यहां कई लोगों के साथ बड़े पर्दे पर फिल्म देखने में मजा आता है. फिर 15 रुपये में आजकल मिलता ही क्या है! यही देखकर खुश हो लेते हैं. आपकी तरह महंगी जगहों पर तो जा नहीं सकते.’

अगली बेंच पर मुलाकात होती है उत्तर प्रदेश के कासगंज के सतवीर से. पूरे दिन की थकान और तनाव सतवीर के चेहरे पर साफ-साफ दिखाई देते हैं. 25 साल के सतवीर पिछले साल दीवाली के ही वक्त बेलदारी का काम करने नोएडा आए थे. सतवीर की माली हालत बेहद खराब है. मुश्किल से बात करने को तैयार हुए सतवीर कहते हैं, ‘घर में 6 भाई हैं और कुल 4 बीघा जमीन है. ऐसे में बेलदारी नहीं करेंगे तो और क्या करेंगे! जैसे-तैसे खाना-पीना चल रहा है बस.’ वह रहते कहां हैं, यह पूछने पर मायूसी के साथ बताते हैं, ‘रहने का कोई ठिकाना नहीं है. कभी पार्क में सो जाते हैं तो कभी फुटपाथ पर.’ किसी के साथ कमरा साझा करने की सलाह पर वे कोई जवाब नहीं देते.

‘साहब कमरे पर टीवी नहीं है. यहां कई लोगों के साथ बड़े पर्दे पर फिल्म देखने में मजा आता है. फिर 15 रुपये में आजकल मिलता ही क्या है! यही देखकर खुश हो लेते हैं

वहीं पास में बैठे हैं मुनिंदर. मुनिंदर 25 साल के हैं और सेक्टर 62 के एक अपार्टमेंट में जमादार का काम करते हैं. साढ़े सात हजार रुपये कमाने वाले मुनिंदर ममूरा में ही किराये के कमरे में अपने भाई के साथ रहते हैं. मुनिंदर काफी खुशमिजाज हैं, वे कहते हैं, ‘हमारा यही मनोरंजन है. इसी में खुश हैं हम. ज्यादा पैसा आपकी शांति छीन लेता है. और फिर घर में अकेले पड़े रहने से अच्छा है कि अपने भाई-बंधुओं के बीच थोड़ा टाइमपास कर लें. वरना कल से तो गाड़ी उसी पटरी पर दौड़नी है. लोगों के साथ सिनेमा देखने में मजा आता है. यहां लोग हंसते हैं सीटी, ताली बजाते हैं. इसी में मन हल्का हो जाता है. रविवार की छुट्टी के दिन तो यहां खड़े होने की भी जगह नहीं होती. गर्मियों में तो लोग यहां सिर्फ सोने के लिए आते हैं क्योंकि कूलर चलने से यहां बहुत ठंडा रहता है.’

Third Picfffffइसके बाद बात हुई कोने में चुपचाप बैठे रामबाबू से. रामबाबू बिहार के मधुबनी के रहने वाले हैं और नोएडा में रिक्शा चलाते हैं. परेशान और थके हुए रामबाबू से जब उनकी उम्र के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ‘हमारी उम्र पूछकर आप क्या करोगे.’ काफी पूछने पर बोले, ‘मैं चालीस साल का हूं. बीवी खत्म हो गई, बच्चे थे ही नहीं. 10 साल पहले नोएडा आए थे तबसे बिहार वापस ही नहीं गए. आज तबियत खराब थी तो रिक्शा भी नहीं चला पाए.’ रहते कहां हैं? ‘यहीं पास की झुग्गियों में.’ रात के साढ़े ग्यारह बजे आखिरी शो खत्म होता है. सभी दर्शकों की पृष्ठभूमि लगभग विजय, सतवीर, मुनिंदर और रामबाबू जैसी ही है. कम उम्र के होने के बावजूद वे बेहद उम्रदराज नजर आते हैं. नींद के आगोश में डूबे दर्शक एक-एक कर बाहर निकलते हैं और अपने-अपने ठिकानों की ओर चल पड़ते हैं. सुबह से शाम तक की जी-तोड़ मेहनत के बाद अगले दिन इनमें से तमाम लोग फिर सत्यम पैलेस का रुख करेंगे.

एक आम आदमी के पास बेशक मनोरंजन के अनेक साधन हो सकते हैं लेकिन शहरों में छोटे-मोटे काम करने वाले इन लोगों के पास सीमित विकल्प हैं. इनमें भी इन्हें दस बार सोचना पड़ता है क्योंकि जेब हमेशा इसकी इजाजत बड़ी मुश्किल से देती है. फिर भी इन्हें कोई शिकायत नहीं, जहां दो पल चैन मिल जाए, ये वहीं खुश हैं. लेकिन दुख की बात है कि इनके मनोरंजन का इकलौता साधन भी बंद होने की कगार पर है. ममूरा से लगभग 10 किमी दूर सिनेमा पार्लर के गढ़ कहे जाने वाले भंगेल कस्बे के सभी सिनेमा पार्लर बंद हो चुके हैं. आस-पास के लोगों ने बताया कि उन्हें बंद हुए 2 साल हो गए. वहां अब या तो गोदाम हैं या फिर बाजार बन चुके हैं. बढ़ते खर्चों और दर्शकों की घटती संख्या के कारण शहर में मौजूद इक्का-दुक्का सिनेमा पार्लर भी आने वाले समय में नदारद हो जाएंगे. फिर ऐसे लोग अपने मनोरंजन का साधन कहां तलाशेंगे?

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