दिल बदलते दल

सपा पर मुसलिम तुष्टिकरण का जो आरोप लगा था उससे निपटने की कोशिश मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपने स्तर पर भी कर रहे हैं. मुख्यमंत्री ने उस बनारस के घाटों के पुनरोद्धार और सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों की योजना की घोषणा की है. गौरतलब है कि बनारस उनके धुर विरोधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निर्वाचन क्षेत्र है. इतना ही नहीं, बनारस नगर से सपा का कोई विधायक भी नहीं है. जाहिर है बनारस जैसे धार्मिक नगर से शुरू किए गए किसी कार्यक्रम का अपना राजनीतिक संदेश होता है. वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू कहते हैं, ‘आजम खान को लेकर पार्टी के रुख में आया बदलाव महत्वपूर्ण है. बाकी घटनाओं के बारे में अभी पूरे विश्वास से कुछ कह पाना मुश्किल है.’

डीएमके नेता एमके स्टालिन द्वारा ट्विटर पर दी गई  बधाई
डीएमके नेता एमके स्टालिन द्वारा ट्विटर पर दी गई  बधाई

बदलाव की सुगबुगाहट सपा के विधायकों और नेताओं में व्यक्तिगत स्तर पर भी देखने को मिल रही है. अयोध्या से विधायक तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडे का उदाहरण प्रासंगिक है. लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद पवन पांडे ने अपने क्षेत्र में विकास की गतिविधियों और शिलान्यास की झड़ी लगा दी है. ध्यान देने पर हम पाते हैं कि इनमें से ज्यादातर काम काज हिंदू धार्मिक महत्व से जुड़े हैं न कि सामान्य विकास से. अयोध्या में हर साल लगने वाले सावन मेला, राम विवाह मेला और रामायण मेला को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पांच सौ की क्षमता वाले सत्संग भवन की नींव रखी है. इसके अलावा एक करोड़ की लागत से पांच सुलभ शौचालयों का काम भी चल रहा है. सबसे महत्वपूर्ण काम उन्होंने अयोध्या के नया घाट पर 65 लाख रुपये की लागत से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वार की आधारशिला रखने का किया है. पांडे के इस अतिशय धार्मिक रुझान पर उनकी पार्टी क्या सोचती है? इस बारे मंे पवन पांडे बताते हैं, ‘पार्टी ने मुझे कभी भी नहीं रोका. बल्कि स्वयं मुख्यमंत्रीजी ने हर तरह से मुझे समर्थन और प्रोत्साहन दिया है. मुख्यमंत्रीजी ने अयोध्या में पांच हजार की क्षमता वाले एक ऑडिटोरियम का निर्माण करवाने का आश्वासन भी दिया है.’

बदलाव की बयार उत्तर से लेकर सुदूर दक्षिण तक की राजनीतिक पार्टियों में चल रही है. तमिलनाडु में डीएमके ने 29 अगस्त को एक ऐसा काम किया जिससे देखते ही देखते द्रविड़ राजनीति में भूचाल आ गया. डीएमके के उत्तराधिकारी स्टालिन ने अपने फेसबुक और ट्विटर एकाउंट पर तमिलनाडु की जनता को विनायक चतुर्थी की शुभकामनाएं दी. पेरियार की ब्राह्मणवाद विरोधी विचारधार पर चलने वाली डीएमके ने पहली बार किसी हिंदू धार्मिक त्यौहार की बधाई दी थी. अब तक आम तौर पर पार्टी के मुखिया एम करुणानिधि सनातन धर्म की परंपराओं का विरोध करते ही पाए जाते थे. शुरुआत में स्टालिन के स्टेटस को उनके समर्थकों का जबर्दस्त समर्थन मिला. देखते ही देखते फेसबुक पर 2700 से ज्यादा लाइक आ गए,  200 से ज्यादा कमेंट आ गए और करीब इतने ही लोगों ने इसे शेयर भी कर दिया. इसके बाद विरोध के सुर उभरने शुरू हुए.

MKदरअसल पेरियार की जिस विचारधारा पर डीएमके की राजनीति टिकी है उसमें हिंदू धर्म के तमाम प्रतीकों और स्थापित परंपराओं का विरोध निहित है. इस बात को लेकर स्टालिन की आलोचना शुरू हो गई कि क्या डीएमके अपनी पुरानी विचारधारा से पीछे हट रही है. क्या इसके पीछे तमिलनाडु में भाजपा को मिली सफलता की भी कोई भूमिका है और क्या इसे करुणानिधि का समर्थन भी प्राप्त है. गौरतलब है कि लोकसभा चुनावों में तमिलनाडु की 39 सीटों में से 37 सीटें जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने जीती हैं जबकि दो सीटें भाजपा और उसके सहयोगी दल पीएमके के खाते में आई हैं. दक्षिण के सूबे में भाजपा को मिली यह सफलता इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि पार्टी की अब तक वहां नाममात्र की भी उपस्थिति नहीं रही है और सूबे की दूसरी महत्वपूर्ण पार्टी डीएमके का सूपड़ा ही साफ हो गया. नतीजा यह हुआ कि शाम होते-होते डीएमके पिछले पांव पर आ गई. पार्टी की तरफ से जारी सफाईनामे में कहा गया कि वह पोस्ट गलतीवश प्रकाशित हुआ है. पार्टी पेरियार की सोच पर कायम है. दोनों पोस्ट डिलीट कर दिए गए. पार्टी समर्थक टेलीविजन नेटवर्क कलाइनार टीवी पर शाम को ही इससे संबंधित कार्यक्रम प्रसारित कर विनायक चतुर्थी की निरर्थकता पर प्रकाश डाला गया.

तो राजनीतिक दलों के रुख में आए इस बदलाव को क्या माना जाय? यह समय की मांग है या राजनीतिक दलों का अवसरवाद है. राम बहादुर राय के शब्दों में, ‘संसदीय राजनीति में वोटरों का रुझान महत्व रखता है. तथ्य इतना भर है कि 2014 में आए नतीजे न तो यह हिंदुत्व को वोट हंै न ही भाजपा को. जिस तरह से नरेंद्र मोदी को निशाना बनाया जा रहा था उनके समर्थकों ने उसी तरह से उसका प्रतिकार भर किया है. मैं इसे राजनीतिक दलों का अवसरवाद नहीं कहूंगा. यह स्थापित सच है कि जो शासक दल होता है वह देश की राजनीतिक संस्कृति को निर्धारित करता है, उसे परिभाषित करता है और उसे पुनर्निर्धारित करता है.’

तो क्या यह सिर्फ मोदी समर्थकों और विरोधियों के बीच का मसला है. जानकारों की राय इस विषय में अलग-अलग है. प्रो. तुलसीराम के शब्दों में, ‘भाजपा की जीत के साथ सांप्रदायिकता व्यवस्था का हिस्सा बन गई है. इससे धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण तेज हुआ है. पहले लोग धर्मनिरपेक्ष विचारधारा को हर फोरम पर मजबूती से रखते थे. इसकी वजह से कम्युनल ताकतें पिछले पांव पर रहती थीं. अस्सी के दशक तक स्थिति यह थी कि जनसंघ और भाजपा यही बयान देते थे कि हमारा हिंदुत्व से कोई लेना-देना नहीं है. पिछले दो दशकों में आरएसएस और भाजपा ने अपनी स्थिति मजबूत की है और दूसरी पार्टियों ने अपना रुख तेजी से बदला है. इन राजनीतिक पार्टियों के लचर रवैये के कारण ही नरेंद्र मोदी आज इस रूप में हमारे सामने उभरे हैं वरना अगर धर्मनिरपेक्ष पार्टियां अपने रुख पर मजबूती से कायम रहती तो 2002-03 में ही नरेंद्र मोदी का राजनीतिक अस्तित्व समाप्त हो जाता.’

बदली हवा के हिसाब से खुद ढालने में राजनेताओं का कोई सानी नहीं होता. यह बात साफ है कि इस समय राजनीतिक दलों के रुख में आ रहे बदलाव के पीछे कुछ हद तक भाजपा की प्रचंड जीत की भूमिका है. पर बहती हवा के साथ बह जाने का नाम लोकतंत्र नहीं है. वैचारिक विभिन्नता लोकतंत्र की ऑक्सीजन है. जल्द ही राजनीतिक दलों को नकल से होने वाले नुकसान का अहसास हो जाएगा. अपने आप नहीं होगा तो लोकतंत्र में खुद भी इतनी ताकत होती है कि वह गलतियों को सुधारने के लिए विवश कर दे.

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1 COMMENT

  1. it is really shame for us if we talk about hindu religious or celebrate their festival then you are fastist and non secular but if u talk about other religious then sure u confirme as a secullar.if any party CELEBRATE IFTAAR PARTY then it is good for democracy what a joke?Democracy mean for evevryone not for special person or ALPSHANKHAYAK.

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