जजों की नियुक्तिः बदलाव जरूरी हैं

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इस कॉलेजियम के व्यवहार के लिए सुप्रीम कोर्ट ने काफी विस्तृत व्यवस्था दी थी और यह तमाम जानकारों के मुताबिक पिछली ‘अव्यवस्था’ से बेहतर थी. लेकिन यह भी सच है कि यह संविधान में जजों की नियुक्ति से जुड़े प्रावधानों से ठीक से मेल नहीं खाती. संविधान ने जजों की नियुक्ति में सरकार की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना था जबकि कॉलेजियम की वर्तमान व्यवस्था में सरकार की भूमिका उतनी ही है जितनी अपने नाम पर लिए गए केंद्र सरकार के निर्णयों में राष्ट्रपति की होती है. संविधान के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में भी सरकार की एक मुख्य भूमिका होनी थी, लेकिन नेहरू जी के समय में ही कार्यपालिका ने अपनी इस भूमिका को एक स्वस्थ परंपरा – वरिष्ठता के आधार पर चयन – के हवाले कर दिया था (यह भी अजीब ही है कि बाद में जिसने इस परिपाटी को तोड़ा वह उनकी बेटी ही थी). कॉलेजियम तंत्र देश चलाने की लोकतांत्रिक व्यवस्था के तकाजों पर भी पूरी तरह खरा नहीं उतरते दिखता और इसमें पारदर्शिता का भी पूरी तरह अभाव है.

इस व्यवस्था को तब भी सही कहा जा सकता था जब यह अपने आप में आदर्श न सही, लेकिन बेहद उत्कृष्ट तरीके से काम करती. लेकिन जस्टिस काटजू के हालिया बयानों ने और पिछले कुछ समय के हमारे अनुभवों ने हमें इसके बारे में अलग ही सोच बनाने पर मजबूर कर दिया है.

हो सकता है यह व्यवस्था पिछले चलन से बेहतर हो, लेकिन 20 साल बाद इस व्यवस्था से बेहतर बनाने की सोचने और फिर उसे बनाने में बुराई क्या है?

लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि इसमें न्यायपालिका के सदस्यों की प्रमुख भूमिका हो और सरकार की भूमिका तो हो लेकिन ऐसी नहीं कि वह इस व्यवस्था को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कैसे भी प्रभावित करने की स्थिति में आ जाए.

चूंकि कोई भी तंत्र आदर्श तो हो नहीं सकता इसलिए इसके बाद भी गलतियां होने की गुंजाइश तो बनी ही रहेगी. ऐसी हालत में हमें गलतियों में सुधारवाली व्यवस्था का निर्माण भी करना होगा. यानी जजों के खिलाफ शिकायतों की जांच और उन पर उचित कार्रवाई की व्यवस्था बनाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना नियुक्तियों के लिए अभी से बेहतर तंत्र बनाना. वर्ना अभी की हमारी व्यवस्था ऐसी है जिसमें जजों की जांच और उन पर कार्रवाई की डगर सात समुंदर पार जाने से थोड़ी ही कम मुश्किल होगी. या शायद उतनी ही.

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