इस दाल में कुछ काला है

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सरकार को इस मामले पर आगे बढ़ने से पहले आगाह करते हुए जेडीयू के महासचिव केसी त्यागी ने स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखा है. उनका मानना है कि इससे समाज में दालों के उपभोग को लेकर गरीब और अमीर के बीच की खाई बढ़ेगी जिसका नतीजा वर्ग विभेद के रूप में सामने आएगा. केसी त्यागी ने अपने पत्र में लिखा है, ‘खेसारी दाल से प्रतिबंध हटाने के निर्णय पर पुनर्विचार जरूरी है. मुझे आशंका है कि इस दाल के सेवन से लोगों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ सकता है, जिसका परिणाम लकवे के रूप में भी सामने आ सकता है. इससे समाज में दालों के उपभोग को लेकर वर्ग विभेद भी तेज हो जाएगा. अमीर लोग तो खेसारी की दाल की बजाय अरहर या तुअर दाल का सेवन करेंगे, वहीं गरीबों की थाली में विषैली खेसारी दाल ही परोसी जाएगी. पहले से बीमार और कुपोषित भारत जैसे देश के लिए खेसारी दाल से प्रतिबंध हटाना बिल्कुल सही नहीं है.’

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केसी त्यागी ने आरोप लगाया, ‘खेसारी दाल को मंजूरी देने के लिए जो तर्क सरकार पेश कर रही है वे सही नहीं हैं. शोध संस्थान खेसारी से प्रतिबंध हटाने के पीछे गरीबों को प्रोटीन मुहैया कराने का तर्क दे रहे हैं. इस तरह की सिफारिश के पीछे उपभोक्ता मंत्रालय और शोध संस्थानों के निहित स्वार्थ काम कर रहे हैं.’ प्रतिबंध हटाने की मंजूरी का मामला अब स्वास्थ्य मंत्रालय के पास है इसीलिए केसी त्यागी और बाकी लोग इस फैसले को रोकने के लिए स्वास्थ्य मंत्री से मांग कर रहे हैं.

 

‘तहलका’ से बातचीत में केसी त्यागी ने कहा, ‘सरकार को देश में मौजूद विभिन्न एजेंसियों से इन नई किस्मों की जांच करानी चाहिए. सरकार सिर्फ गरीबों की जान से खिलवाड़ कर रही है. ये सरकार अमीरों के हितों को ध्यान में रखकर ही अपनी योजनाएं बनाने में व्यस्त है. इस मामले को आने वाले बजट सत्र में उठाएंगे. लेकिन अगर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) नई किस्मों को मंजूरी देता है तो हमें कोई समस्या नहीं है लेकिन इनका कड़ाई से परीक्षण किए जाने की जरूरत है.’ केसी त्यागी ने इस मामले में उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान पर भी मिलीभगत का आरोप लगाया है.

खेसारी दाल में खतरनाक केमिकल मौजूद होने की पुष्टि करते हुए कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं, ‘कुछ अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि खाने का तेल खेसारी दाल में मौजूद खतरनाक केमिकल ओडीएपी को 72 से 100 प्रतिशत तक खत्म कर देता है. इससे स्पष्ट है कि दाल में वह केमिकल मौजूद है. इसीलिए इसे खत्म करने की जरूरत पड़ती है. ऐसे में इस बात को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि आम आदमी इन उपायों को अपनाकर इस दाल को सुरक्षित बनाए. आईसीएमआर ने किस आधार पर प्रतिबंध हटाने का फैसला लिया है यह जानना बेहद जरूरी है क्योंकि लोग पूरी तरह संतुष्ट होने के लिए विस्तृत जानकारी चाहेंगे ही. इसी तरह एफएसएसएआई को भी इस दाल की नई किस्मों को सार्वजनिक तौर पर कड़े परीक्षण से गुजारना चाहिए ताकि किसी निश्चित परिणाम तक पहुंचा जा सके.’

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पिछले साल देश में अरहर की दाल लोगों की थाली से गायब हो गई थी. दालों की बढ़ती कीमतों ने भाजपा सरकार के सामने मुश्किल चुनौती पेश की थी. सरकार पर आरोप लगा था कि मोदी सरकार दालों की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने में असफल रही है. इसी बीच अब खेसारी दाल को मंजूरी देने की बात चल पड़ी है. देवेंद्र शर्मा कहते हैं, ‘देश में दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए विषैली खेसारी दाल के उत्पादन को मंजूरी देने को न्यायोचित नहीं ठहाराया जा सकता. अगर इसके उत्पादन को मंजूरी मिल भी जाती है तब भी इससे दालों के भंडारण पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. इसीलिए इस तरह का खतरनाक फैसला नहीं करना चाहिए. इसके विपरीत भारत सरकार को चाहिए कि देश में ही दालों के घरेलू उत्पादन में बढ़ोत्तरी की दिशा में कदम बढ़ाया जाए. सरकार सिर्फ देश की भोली-भाली जनता को उल्लू बनाने का काम कर रही है. आम आदमी को इसके दुष्परिणामों के बारे में कोई जानकारी नहीं है इसीलिए वह कभी सवाल नहीं उठाता.’

नागपुर में रहने वाले माइक्रोबायोलॉजिस्ट और पोषण विशेषज्ञ शांतिलाल कोठारी खेसारी दाल पर लगे प्रतिबंध हटाने के लिए संघर्षरत हैं. पिछले 30 साल से कोठारी इस प्रतिबंध के खिलाफ आवाज बुलंद किए हुए हैं. कोठारी का कहना है, ‘अगर किसानों को खेसारी दाल का उत्पादन करने दिया जाए तो बहुत हद तक हमारे देश में किसानों को आत्महत्या करने से रोका जा सकता है.’

प्रतिबंध को हटाने की मांग को लेकर कोठारी 2008 में भूख हड़ताल पर बैठ गए थे जिसके बाद महाराष्ट्र सरकार ने इसके उत्पादन, उपभोग और बिक्री से प्रतिबंध हटा लिया था. लेकिन कोठारी यहीं नहीं रुके. उन्होंने पूरे देश से यह प्रतिबंध हटाने के लिए अभियान चलाया. पिछले साल दिसंबर में सरकार ने कोठारी को प्रतिबंध हटाने के बारे में सूचना दी. यह सूचना प्राप्त होने के बाद कोठारी ने नागपुर के कुही क्षेत्र में 15 जनवरी को किसानों की एक बैठक बुलाई. इस बैठक में करीब 15 हजार किसानों ने हिस्सा लिया था.

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देवेंद्र शर्मा आगे कहते हैं, ‘ये दावा किया जा रहा है कि इससे महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या में कमी आई है. यह बिल्कुल झूठ है. राज्य में आज भी किसान आत्महत्या कर रहे हैं. इस दाल को सरकार क्यों बाजार में लाना चाहती है, समझ से परे है. इसके बजाय सरकार को चाहिए कि कनाडा में पशुओं के चारे में इस्तेमाल होने वाली पीली मटर का आयात कर अरहर के विकल्प के रूप में बाजार में उतारे.’

खेसारी दाल का मामला फिलहाल एफएसएसएआई के पास पहुंच गया है. वहां के वैज्ञानिक अब इन तीन नई किस्मों का कड़ाई से परीक्षण करेंगे जिसके बाद इस प्रतिबंध को हटाने पर फैसला लिया जाएगा. अगर यह प्रतिबंध हटा भी लिया जाए तब भी यह कितना कारगर होगा इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता.