उत्तर प्रदेश Archives | Page 2 of 4 | Tehelka Hindi — Tehelka Hindi
एक सरकार मंत्री हजार!

उत्तर प्रदेश में राज्य कैबिनेट का हिस्सा न होने के बाद भी समाजवादी पार्टी के 200 से ज्यादा नेताओं को मंत्री का दर्जा और ऐशोआराम हासिल है. लेकिन हाल की एक कानूनी पहल के बाद ऐसी समानांतर कैबिनेटों के दिन लद सकते हैं.  

मोदी का सवाल और उत्तर प्रदेश

नरेंद्र मोदी का असर उत्तर प्रदेश भाजपा में उत्साह फूंकता दिख रहा है, पर वोट खींचने के लिहाज से क्या यह असर राम मंदिर मुद्दे की बराबरी कर सकता है?  

घर की लड़ाई सड़क पर आई

पहले से ही मुश्किलों से जूझ रही कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में उसके पुराने धुरंधर ही मुश्किलें खड़ी करते जा रहे हैं.  

क्या 2014 में मुलायम सिंह प्रधानमंत्री बन सकते हैं?

मुलायम सिंह यादव भारत के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं. जितना लंबा समय उन्होंने भारतीय राजनीति को दिया है उसके मद्देनजर इसमें कोई बुराई भी नहीं है. उनका लंबा-चौड़ा राजनीतिक अतीत है, तीन-तीन बार वे देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, लोकसभा में उनके पास 22 सांसद  

सीमा, सुरक्षा और सियासत

भारत-नेपाल के विशेष संबंध का फायदा अगर आतंकवाद को मिल रहा है तो सुरक्षा एजेंसियां भी इसका लाभ उठाने में पीछे नहीं रही हैं. लेकिन वोटों की राजनीति उनकी इस कवायद की हवा निकालने पर तुली है  

परंपरा का पुन: प्रयोग

सूखे से पस्त बुंदेलखंड जैसे इलाकों को वित्तीय पैकेज की नहीं बल्कि परंपरा से उपजे उस प्रयोग की जरूरत है जो देवास का कायाकल्प करके महोबा पहुंच चुका है. रिपोर्ट और फोटो:राहुल कोटियाल  

लड़की है एक नाम रजिया है

16 वर्ष की उम्र में संयुक्त राष्ट्र संघ का पहला मलाला सम्मान पाने वाली रजिया सुल्ताना अपनी प्रेरणा खुद हैं. प्रदीप सती की रिपोर्ट.  

दागियों से दोस्ती

बातें वे भले ही दागियों से परहेज की करें, लेकिन लोकसभा चुनाव में नफे के लिए उत्तर प्रदेश में तमाम राजनीतिक पार्टियां दागी व आपराधिक छवि के लोगों को गले लगा रही हैं. जयप्रकाश त्रिपाठी की रिपोर्ट.  

जातिवाद का विषविद्यालय!

बीएचयू में दलित उत्पीड़न से जुड़ा एक विवाद अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया को सवालों के घेरे में खड़ा कर रहा है. अतुल चौरसिया की रिपोर्ट.  

वादे हैं वादों का क्या

चुनाव आते ही गांधी परिवार के निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली और अमेठी के लिए योजनाओं के एलान की झड़ी लग जाती है. यह अलग बात है कि चुनाव जाते ही ज्यादातर योजनाएं ठंडे बस्ते में चली जाती हैं. जय प्रकाश त्रिपाठी की रिपोर्ट.