सवर्ण राजनेता: सप्तमो अध्याय समाप्ते !

0
285

बिहार में कुछ जो चर्चित ब्राह्मण नेता हुए, उसमें कांग्रेस के अध्यक्ष रह चुके प्रजापति मिश्र, ललित नारायण मिश्र, विनोदानंद झा, जगन्नाथ मिश्र, विंदेश्वरी दुबे, केदार पांडेय, भागवत झा ‘आजाद’ आदि का नाम लिया जाता है. इसमें कुछ मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे. ये सभी कांग्रेसी रहे. समाजवादी नेताओं में रामानंद तिवारी एक बड़े नाम हुए लेकिन उनकी पहचान ब्राह्मण नेता की नहीं रही. बाद में उनके बेटे शिवानंद तिवारी भी राजनीति में आये और चर्चित रहे लेकिन उनकी पहचान भी ब्राहमण नेता की नहीं रही. समाजवादी राजनीति में ब्राह्मण नेताओं की उपस्थिति कभी ‘ब्राह्मण’ की नहीं रही. जेपी आंदोलन में भी ब्राह्मणों की भूमिका वैसी नहीं रही. जो खुर्राट ब्राह्मण नेता हुए, कांग्रेसी पृष्ठभूमि के रहे और वे धीरे-धीरे अपने ही कुनबे में सिमटते गये. भागवत झा ‘आजाद’ की राजनीतिक फसल उनके बेटे कीर्ति झा  ‘आजाद’ के सांसद बनने तक सिमट गयी. ललित नारायण मिश्र के परिवार से उनके बेटे विजय मिश्र जदयू से विधान परिषद के सदस्य हैं, विजय मिश्र के भी बेटे ऋषि मिश्र जदयू के कोटे से ही विधायक हैं लेकिन नीतीश कुमार की पार्टी में उनकी हैसियत भी बस एक विधान पार्षद या विधायक भर की है. इसी परिवार से ताल्लुक रखनेवाले जगन्नाथ मिश्र के परिवार की कहानी कुछ अलग है. जगन्नाथ मिश्र खुद कई बार मुख्यमंत्री रहे, बाद में जब कांग्रेसी राजनीति के दिन लद गये तो अपनी राजनीति बचाये रखने के लिए नीतीश के संगी-साथी बने, फिर अपने बेटे नीतीश मिश्र की सियासत को चमकाने में ऊर्जा लगाते रहे. नीतीश मिश्र मंत्री भी बने. अब जगन्नाथ मिश्र और उनके बेटे जीतन राम मांझी खेमे में हैं. जदयू खेमे में एक संजय झा का नाम बीच-बीच में आता रहा और कहा जाता रहा कि वे नीतीश कुमार के रणनीतिकारों में से हैं. लेकिन अब संजय झा भी हाशिये पर भेजे गये नेता से मालूल पड़ रहे हैं.

जगन्नाथ मिश्र कई बार मुख्यमंत्री रहे लेकिन दिन लदे तो नीतीश कुमार के साथ लग गए आैर अपने बेटे नीतीश मिश्र की सियासत चमकाने में ऊर्जा लगाते रहे

जदयू खेमे की बात छोड़ अगर राजद की बात करें तो वहां रघुनाथ झा ब्राह्मण नेता के तौर पर रहे लेकिन उनकी भी हैसियत कभी ऐसे ब्राहमण नेता की नहीं बन सकी, जिसकी राज्यव्यापी अपील हो. अब तो वे पूरी तरह पराभव की ओर अग्रसर हैं. भाजपा में प्रदेश अध्यक्ष मंगल पांडेय ब्राह्मण समुदाय से जरूर हैं लेकिन अपनी पार्टी में भी उनका वैसा प्रभाव नहीं, जैसा कि दूसरों का है. कहा जाता है कि वे आपसी गुटबाजी में इस्तेमाल करने के लिए बनाये गये अध्यक्ष हैं. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता अश्विनी चौबे हैं जो भागलपुर से विधायक थे. वे राज्य में मंत्री भी थे, फिलहाल ब्राह्मण बहुल संसदीय क्षेत्र बक्सर से सांसद हैं. वैसे यह भी सच है कि बिहार से वर्तमान समय में दो सांसद ब्राह्मण हैं और दोनों भाजपा के ही हैं. प्रदेश अध्यक्ष भी ब्राह्मण हैं, इसलिए भाजपा भी राजनीतिक तौर पर ब्राह्मणों को अपने खेमे का मतदाता मानकर निश्चितंता की मुद्रा में ही है.

ब्राहमण समाज से ताल्लुक रखनेवाले बीएन तिवारी उर्फ भाईजी भोजपुरिया कहते हैं कि ब्राह्मणों की अगर आज राजनीतिक पूछ घटी है तो उसके लिए खुद ब्राह्मण नेता ही जिम्मेवार हैं. कभी किसी ब्राह्मण नेता ने भूमिहारों, राजपूतों या दूसरी जातियों की तरह गोलबंद करने की कोशिश नहीं की, जिसके चलते ब्राह्मण हमेशा बिखरे रहे और कभी इस खेमे में तो कभी उस खेमे में जाते रहे और आज वे इस स्थिति में पहुंच गए हैं.

स्वतंत्र पत्रकार अमित कहते हैं कि 90-95 तक ब्राहमणों का वर्चस्व रहा लेकिन उसके बाद वे उपयोग किये जाते रहे और उसके बाद तो उन्हें कठपुतली की तरह नचाया जाता रहा और वे नाचते भी रहे. भाजपा में भी यदि मंगल पांडेय अगर प्रदेश अध्यक्ष बने हैं तो ऐसा उनकी कोई राज्य स्तरीय अपील के कारण संभव नहीं हुआ. अपना मकसद साधने के लिए उन्हें मोहरे की तरह इस्तेमाल में लाया गया. अमित कहते हैं कि बिहार में ब्राह्मण राजनीति की नियति बस इतनी ही  है कि सभी नेताओं को अपने-अपने क्षेत्र में समेटकर रखा जाता रहा है और एक-दूसरे को आपस में ही लड़ाकर कभी किसी को तो कभी किसी को आगे किया जाता रहा है. अमित कहते हैं कि आप खुद ही देख लीजिए कि बक्सर में लालमुनी चौबे भाजपा के बड़े नेता थे. वे लगातार ब्राह्मण बहुल बक्सर से चुनाव लड़ते रहे, जीतते रहे. वे बहुत पहले ही विधायक दल के नेता भी बने थे. लेकिन एक बार कम वोट से लोकसभा चुनाव क्या हारे तो उन्हें दरकिनार करने के लिए ब्राह्मण नेता अश्विनी चौबे को वहां ले जाया गया और उनकी राजनीति खत्म की गई. अमित कहते हैं कि ब्राह्मणों का इस्तेमाल सभी दल इसी तरह करते रहे हैं. लालू प्रसाद ने भी राधानंदन झा को अपने साथ बनाये रखा और उन्हें चाणक्य और पता नहीं क्या-क्या कहा गया लेकिन राधानंदन को एक समय के बाद उपेक्षित किया गया.

जदयू के एक वरिष्ठ और नीतीश कुमार के करीबी नेता कहते हैं कि नीतीश के मंत्रिमंडल में अभी कोई ब्राह्मण नहीं है तो अचरज की क्या बात. इससे पहले भी नीतीश कुमार ऐसा करते रहे हैं. 2009 में भी लोकसभा चुनाव में उन्होंने एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया था. ऐसा क्यों? नीतीश कुमार क्यों सवर्णों में भूमिहारों के प्रति और लालू प्रसाद यादव राजपूतों के प्रति दीवाने दिखते हैं जबकि नीतीश के मतदाताओं में ब्राह्माणों ने भी उनका उतना साथ दिया है जितना भूमिहार मतदाताओं ने. इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है. जदयू के वरिष्ठ नेता रहे और लालू-नीतीश दोनों के साथ रह चुके वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी ने इस संवाददाता से बाचतीत में कहा कि इसमें अचरज की कोई बात नहीं है. लोकतंत्र में सियासत के समीकरण तो बदलते रहते हैं.

बिहार की सियासत का जातीय समीकरण यह कहता है कि सवर्णों में ब्राह्मणों की आबादी करीब चार प्रतिशत है. ब्राह्मणों से थोड़ी कम आबादी भूमिहारों की है. लगभग तीन प्रतिशत राजपूत हैं और एक प्रतिशत के करीब कायस्थ. फिर ब्राह्मण समुदाय के बीच आज एक ऐसा बड़ा नेता नहीं है जो राजनीति में उनकी इस दुर्गति का जवाब दे! जवाब फिर वही मिलता है-बिहार में इस समय समाजवादियों की राजनीति का युग है. जेपी आंदोलन से निकले नेताओं का युग है. जेपी आंदोलन के दौरान ब्राह्मणों के वर्चस्व को खत्म करने का व्यापक अभियान चलाया गया, जिसका असर मानों अब हो रहा है. अब इतिश्री रेवाखंडे हो चुका है तो संभव है कि एक बार फिर से बिहार में नये किस्म से राजनीति की शुरुआत हो तो शायद ब्राह्मणों की भूमिका बढ़े लेकिन फिलहाल यह भी दिल बहलानेवाले एक खयाल की तरह ही लग रही है…

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here