हरियाणा: मोदी की भाजपा बनाम अन्य

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लेकिन ऐसा नहीं है कि प्रदेश में भाजपा के हिस्से में सब हरा ही हरा है. प्रदेश में पार्टी की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वह दूसरे दलों से आए नेताओं के दम पर सिंघम बनने की कोशिश कर रही है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा की ऐसी स्थिति थी कि उसके पास चुनाव लड़ने लायक नेता तक नहीं थे. ऐसे में उसे दूसरे दल से आए नेताओं को टिकट देना पड़ा. जिन आठ सीटों पर उसने चुनाव लड़ा उसमें से पांच पर या तो उसने दूसरे दल से आए व्यक्ति को टिकट दिया या किसी नए व्यक्ति को. पार्टी टिकट पर चुनाव लड़ने वाले ये वे लोग थे जो चुनावी रणभेरी बजने के बाद पार्टी में शामिल हुए थे. हरियाणा में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को यही करना पड़ेगा.

जमीन पर चुनाव-प्रचार में भी भाजपा के अपने नेताओं से ज्यादा दूसरे दल से आए नेता ही दिखाई दे रहे हैं. उदाहरण के लिए कांग्रेस से भाजपा में आए राव इंद्रजीत और बीरेंद्र सिंह का नाम लिया जा सकता है. बीरेंद्र सिंह हाल ही में भाजपा में शामिल हुए हैं. वे पिछले 2-3 सालों से अपनी पार्टी के मुख्यमंत्री हुड्डा से नाराज चल रहे थे. बीरेंद्र का कहना था कि हुड्डा प्रदेश के विकास में भेदभाव कर रहे हैं और इस कारण से जनता की कांग्रेस से नाराजगी लगातार बढ़ती जा रही है. ऐसे में हुड्डा को हटाकर किसी और को मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए. अपनी बात मनवाने के लिए बीरेंद्र ने साम, दाम, दंड, भेद समेत सारी रणनीति आजमा ली, लेकिन हाईकमान की आंखों में हुड्डा के प्रति प्रेम बरकरार रहा. सारे उपाय खर्च करने के बाद वे अंततः कांग्रेस से अपने 45 साल पुराने संबंधों को सलाम करते हुए भाजपा में अपना भाग्य आजमाने चले आए.

हरियाणा में भाजपा की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वह दूसरे दलों से आए नेताओं के दम पर सिंघम बनने की कोशिश कर रही है

कमल जैन कहते हैं, ‘पार्टियों में दूसरे दलों के नेताओं का आना-जाना लगा रहता है लेकिन इसका एक अनुपात होता है. चंद माह पहले दूसरे दलों से आए लोगों के हाथ में कमान नहीं दी जाती. लेकिन यहां  स्थिति यह है कि दशकों तक कांग्रेस की राजनीति करते रहे नेता, राज्य में भाजपा का चेहरा बने घूम रहे हैं. जनता इसे कैसे लेती है यह तो चुनाव परिणाम ही बताएंगे.’

भाजपा का दूसरे दलों के नेताओं पर आश्रित होने का मामला प्रदेश में उसके कमजोर संगठन से भी जुड़ा हुआ है. उसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि पिछले पांच सालों भाजपा ने प्रदेश में कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन, आंदोलन नहीं किया. आलम यह रहा कि कुछ समय पहले तक लोग कहा करते थे कि हुड्डा का रास्ता साफ है, उनके सामने कोई चुनौती नहीं है क्योंकि चौटाला पिता-पुत्र जेल में हैं, हजकां की राजनीतिक हैसियत है नहीं और भाजपा की राजनीतिक ताकत पर चर्चा टाइम पास करने का साधन थी. पार्टी की यही संगठनात्मक कमजोरी उसके जीत के दावों पर प्रश्न खड़ा कर देती है.

भाजपा के सामने एक बड़ी चुनौती मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर भी है. प्रदेश में पार्टी ने किसी को सीएम पद के लिए औपचारिक या अनौपचारिक तौर पर प्रोजेक्ट नहीं किया है. पार्टी का कहना है कि वह प्रदेश में मोदी को सामने रखकर ही चुनाव लड़ेगी. लेकिन इससे दो तरह की दिक्कतें आ रही हैं. पहली यह कि सत्तारुढ कांग्रेस इसके माध्यम से भाजपा पर यह कहते हुए हमला कर रही है कि क्या अब मोदी हरियाणा में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार भी हैं जो पार्टी उनके नाम पर चुनाव लड़ रही है. सीएम उम्मीदवार घोषित न होने के कारण जनता में भी एक भ्रम की स्थिति बनी हुई है. स्थानीय पत्रकार हितेष रघुवंशी कहते हैं, ‘सीएम कैंडीडेट सामने न आने की स्थिति में भाजपा समर्थक भी भ्रम की स्थिति में हैं. जनता को भी समझ नहीं रहा कि मन बनाए तो किसके लिए बनाएं.’

एक तरफ जनता भ्रम की स्थिति में है तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर ‘मैं सीएम’ नामक विषाणु तेजी से फैला है. हाल में उसके दो सांसदों अश्विनी चोपड़ा और राव इंद्रजीत सिंह के समर्थकों के बीच खूब जूतम-पैजार हुई. सूत्रों के मुताबिक इसकी वजह यह थी कि करनाल के सांसद चोपड़ा अपने अखबार के माध्यम से गुड़गांव से पार्टी सांसद राव इंद्रजीत पर लगातार हमलावर थे. राव साहब को लगा कि ऐन चुनाव के वक्त चोपड़ा उनके मुख्यमंत्री बनने के अरमानों को चौपट करने में लगे हैं.

फिर बीरेंद्र सिंह भी हैं. हुड्डा को हटाने का उनका असफल महाभियान उनकी जगह सीएम बनने की लालसा से ही शुरू हुआ था. कुछ समय पहले ही एक सभा में उन्होंने कहा, ‘कौन ऐसा आदमी होगा जो उस राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहेगा जहां उसने जन्म लिया है. मैं भी सीएम बनना चाहता हूं.’ सूत्र बताते हैं कि जब बीरेंद्र कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ आए हैं तो वे इससे कम पर राजी भी नहीं होंगे. बीरेंद्र सिंह और राव इंद्रजीत के बीच हरियाणा भाजपा में अपना वर्चस्व स्थापित करने की लड़ाई अलग चल रही है. प्रदेश के भाजपा नेताओं के आए दिन फेसबुक पेज बन रहे हैं. जहां उन्हें हरियाणा के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजक्ट किया जा रहा है. मुख्यमंत्री बनने को बेताब लोगों की लिस्ट में प्रदेशाध्यक्ष रामबिलास शर्मा, कैप्टन अभिमन्यु, प्रदेश संगठन मंत्री मनोहर लाल खट्टर, केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर, अंबाला से भाजपा विधायक अनिल विज, रोहतक लोकसभा सीट से चुनाव लड़ चुके ओमप्रकाश धनखड़ का नाम भी शामिल है. इन सभी के समर्थक जनता से अपने नेता को सीएम बनाने की अपील करते देखे जा सकते हैं.

अभी इन नेताओं के बीच सूत न कपास जुलाहों में लट्ठम लट्ठा वाला मामला चल ही रहा था कि तेजी से यह खबर फैली कि पार्टी सुषमा स्वराज को प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर सकती है. सुषमा का नाम सामने आने के बाद भाजपा के कई स्थानीय नेताओं ने सुषमा को बधाई तक दे डाली. नेताओं ने सुषमा के पक्ष में बयान देना जारी कर दिया. मामला बिगड़ता देख केंद्रीय भाजपा ने सुषमा के नाम को अफवाह बताकर किसी तरह मामले को शांत किया.

इन तमाम चुनौतियों और सीमाओं के बाद भी भाजपा आशान्वित है. वह अन्य दलों को हताश करने की सीमा तक आत्मविश्वास का प्रदर्शन कर रही है. अब यह चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि उसके इस आत्मविश्वास में दम कितना था और अति कितनी.

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