हाथ किसके साथ?

कांग्रेस के समक्ष दूसरा विकल्प है लालू प्रसाद यादव के राजद और रामविलास पासवान की लोजपा के साथ गठबंधन. ये दोनों दल लंबे समय तक कांग्रेस के साझेदार रहे हैं और कांग्रेस के साथ उनका कोई विवाद कभी सार्वजनिक नहीं हुआ. कई बार जब सोनिया गांधी विपक्ष के निशाने पर थीं तो लालू प्रसाद यादव ने जमकर उनका बचाव भी किया. बिहार कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि राजद-लोजपा के साथ गठबंधन पार्टी के लिए लाभदायक साबित हो सकता है. लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा बहुचर्चित चारा घोटाले में आने वाला फैसला हो सकता है.

इस मामले की सीबीआई जांच में अपना नाम आने के बाद ही लालू को 1997 में बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी थी. रांची स्थित सीबीआई अदालत इस मामले में 15 जुलाई को सजा सुनाने वाली थी. लेकिन खबर लिखे जाने तक सर्वोच्च न्यायालय ने अदालत के फैसले पर रोक लगा दी है. शीर्ष अदालत के सामने अपनी अर्जी में लालू ने कहा था कि इस मामले में सीबीआई अदालत के न्यायाधीश बिहार सरकार के एक मंत्री के रिश्तेदार हैं और उन्हें आशंका है कि वे पक्षपात कर सकते हैं. अदालत ने सीबीआई से 23 जुलाई तक जवाब मांगा है. अब देखना यह है कि सीबीआई अपने जवाब में क्या कहती है.

अगर उसे फैसला सुनाने की हरी झंडी मिल गई और लालू दोषी ठहराए गए तो गठबंधन की संभावनाएं धूमिल हो जाएंगी. कम से कम दो साल की सजा हुई तो लालू वैसे ही चुनाव नहीं लड़ सकेंगे. और सजा की अवधि कम भी हुई तो भी दोषी ठहराया जाना ही उनकी पार्टी के लिए एक बड़ा झटका होगा. ऐसे में कांग्रेस राजद से गठबंधन में हिचकिचाएगी. हालांकि, झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा की अगुवाई में बनी नई सरकार में कांग्रेस और राजद साथ-साथ हैं. लेकिन वहां भी शुरुआत में काफी असमंजस की स्थिति रही. एक बार तो यह भी लगने लगा था कि राजद अलग-थलग पड़ जाएगी.

अब आता है तीसरा विकल्प यानी अकेले अपने बूते पर चुनाव लड़ना. कांग्रेस ने बिहार में 2010 का विधानसभा चुनाव अकेले लड़ा था और उसने गठबंधन के बजाय ‘सांगठनिक ढांचा दोबारा तैयार करने’ पर जोर दिया था. लेकिन उसे 243 सीटों में से महज चार पर जीत हासिल हुई. उस वक्त भी राजद और लोजपा दोनों गठबंधन के इच्छुक थे लेकिन कांग्रेस ने अकेले ही चुनाव लड़ने का फैसला किया था.

2014 के आम चुनावों में भी कांग्रेस आलाकमान केंद्र में राजद और जदयू दोनों का समर्थन पाने का इच्छुक नजर आती है. ऐसे में संभव है वह चुनाव के पहले दोनों में से किसी से गठबंधन न करे. पार्टी के अंदरूनी सूत्र ‘उत्तर प्रदेश मॉडल’ की ओर संकेत कर रहे हैं जहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी धुर विरोधी होने के बावजूद केंद्र में संप्रग सरकार को समर्थन दे रही हैं. कांग्रेस लोकसभा के दो बचे सत्रों के दौरान जदयू से बेहतर ताल्लुकात रखना चाहती है ताकि विभिन्न लंबित विधेयकों को आसानी से पारित किया जा सके.

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