बिहार: छह महीने छप्पन मुसीबतें

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जाहिर है नीतीश के नेतृत्व में चुनाव में जाने का एलानकर लालू यादव अपना बचा-खुचा आधार भाजपा के पाले में नहीं जाने देंगे. ऐसे में नीतीश कुमार के लिए लालू प्रसाद को साधना और उन्हें अपने साथ लाना बड़ी चुनौती है. नीतीश कुमार को इसमें ऊर्जा लगाने के साथ ही छह माह में ही खुद को साबित कर दिखाना होगा कि वे बिहार को फिर से पटरी पर ला रहे हैं. इसके लिए उन्होंने सुशासन को एक बार फिर से अहम मसला बनाया है. लेकिन अब बिहार की लड़ाई सिर्फ गवर्नेंस, सुशासन या विकास के एजेंडे पर नहीं लड़ी जाएगी. यह बात नीतीश कुमार भी जानते हैं कि मांझी प्रकरण के बाद बिहार की राजनीति में जाति एक बार फिर से मुखर होकर सामने आई है और अगले चुनाव में यह बड़ा खेल खेलेगी. भाजपा बार-बार मांझी को हटाये जाने पर महादलित-महादलित का राग छेड़कर इसे और बल देने की कोशिश की है.

नीतीश भले ही गवर्नेंस के मसले पर चुनावी वैतरिणी पार करने की कोशिश करें लेकिन भाजपा जाति को ही केंद्र में रखकर अपनी चाल चलेगी. क्योंकि भाजपा को मालूम है कि नीतीश जाति के बुने चक्रव्यूह में खुद भी फंस सकते हैं. इस फ्रंट पर लड़ने में नीतीश के सामने बड़ी चुनौती होगी. उनके सामने सिर्फ भाजपा की दुश्मनी नहीं होगी, बल्कि एक-एककर कई दुश्मन होंगे. भाजपा सवर्णों और वैश्यों को अपना कोर वोट बैंक मानकर चल रही है. पासवान जाति के लोग रामविलास पासवान के साथ माने ही जाते हैं. उपेंद्र कुशवाहा ने राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी बनाकर कुशवाहा वोटों को नीतीश से अलग कर दिया है. यह सब तो पहले के घाव थे, ताजा चोट मांझी ने दी है. मांझी भाजपा के सहयोग से महादलितों की पार्टी बनाकर खेल खराब कर सकते हैं.

 

मांझी प्रकरण के बाद बिहार की राजनीति में जाति एक बार फिर से मुखर होकर सामने आई है और अगले चुनाव में यह बड़ा खेल खेलेगी

मांझी के साथ ही पप्पू यादव की राजनीति भी कुलांचे भर रही है. जाति विशेष की बजाय जाति समूह से राजनीति करनेवाले नीतीश कुमार के लिए महादलित और अतिपिछड़ा ही ऐसा समूह रहा है, जिसके जरिये वे इतनी बड़ी जीत हासिल करते रहे हैं. इस बार मांझी प्रकरण के बहाने इस समूह के टूट जाने का खतरा बहुत बड़ा है. ले-देकर नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ा विकल्प छह माह में काम करके खुद को साबित करने का ही बचता है. नीतीश को इसके लिए अरविंद केजरीवाल की भारी जीत से उम्मीदें बंधी है, जो भगोड़ा जैसी उपमा मिल जाने के बाद भी भाजपा का सफाया करने में सफल साबित हुए. हालांकि इन तमाम झंझावातों के बीच एक तथ्य यह भी है कि आज भी बिहार में नीतीश कुमार के जैसी छवि और अपील किसी दूसरे नेता की नहीं है. नीतीश अपनी इस साख को भुनाने की कोशिश जरूर करेंगे.

नीतीश के कामकाज की राह में मांझी ने पहले ही तमाम रोड़े बिछा दिए हैं. जब मांझी की सत्ता डावांडोल हुई तब उन्होंने इतनी घोषणाएं कर दी हैं कि उन्हें पूरा कर पाना किसी के लिए भी आसान नहीं है. मांझी वित्तरहित शिक्षा खत्म करने, ठेके पर बहाल शिक्षकों को नियमित वेतन पर नियुक्त करने के लिए कमिटी का गठन करना, ठेके में दलितों को आरक्षण देने, छोटे-छोटे पदों पर ठेके पर रखे गये लोगों का मानदेय बढ़ाने जैसी कई घोषणाएं कर नीतीश के लिए कई मुश्किलें खड़ी कर गए हैं. अब नीतीश कुमार के सामने चुनौती यह है कि यदि वे एक सिरे से मांझी की सभी घोषणाओं को खारिज करते हैं तो भाजपा के संग मिलकर मांझी राज्यभर में प्रचार करेंगे कि नीतीश जानबूझकर हमारे फैसलों को रद्द कर रहे हैं. और यदि नीतीश कुमार, मांझी के फैसले पर अमल करने की कोशिश करते हैं तो राज्य दिवालिया हो सकता है.

ऐसा भी नहीं कि परेशानी सिर्फ नीतीश कुमार के हिस्से में ही आई है. भाजपा भी कमोबेस उतने ही संकट में फंसी हुई है. दिल्ली विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा का मनोबल टूटा है. राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह यह घोषणा कर चुके हैं कि बिहार में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का नाम घोषित कर ही चुनाव लड़ा जाएगा. भाजपा के लिए उम्मीदवार को घोषित करना इतना आसान नहीं होगा. बिहार में भाजपा कई खेमों में बंटी हुई पार्टी है और सभी खेमे मजबूत हैं. चार-चार दावेदार तो अभी ही दिख रहे हैं, जिसमें सुशील मोदी, नंदकिशोर यादव की स्वाभाविक दावेदारी के साथ ही शहनवाज हुसैन और रविशंकर प्रसाद का नाम भी उछाला जा रहा है. सुशील मोदी या नंदकिशोर यादव के नाम पर अंत में रार मचनी तय है.

सुशील मोदी के नाम पर एक नई किस्म की मुश्किल है. बिहार से सटे झारखंड में भाजपा अभी-अभी एक वैश्य (रघुवर दास) को मुख्यमंत्री बना चुकी है. बिहार में भी वैश्य समुदाय का मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी अपने पारंपरिक और नए वोटरों के बीच संकट में फंस सकती है. नंदकिशोर यादव का नाम घोषित होने की हालत में सुशील मोदी पार्टी से नाराज हो सकते हैं. मोदी वर्षों से मुख्यमंत्री पद का सपना संजोए हुए हैं. इस उम्मीद के टूटने की हालत में भितरघात की स्थिति बन सकती है. मोदी को नीतीश कुमार के सबसे प्रिय मित्रों में माना जाता है. भाजपा के सामने यह चुनौती बड़ी है.

ऐसा भी नहीं कि परेशानी सिर्फ नीतीश कुमार के हिस्से में ही आई है. भाजपा भी संकट में फंसी हुई है. दिल्ली में हार के बाद भाजपा का मनोबल टूटा है

भाजपा की एक और चुनौती मांझी हैं. वे आज साथ दे रहे हैं, कल को रास्ता बदल भी सकते हैं. रास्ता बदलने का उनका लंबा इतिहास रहा है. वे अच्छे दिनों की संभावनावाले दल का साथ देने के लिए जाने जाते हैं. कांग्रेस के अच्छे दिन में कांग्रेसी थे. राजद के अच्छे दिन में लालू के थे. नीतीश के अच्छे दिन आये थे तो नीतीश के साथ आ गए. अभी भाजपा के इर्द-गिर्द हैं, कल को पाला बदल भी सकते हैं. इस इतिहास के मद्देनजर भाजपा मांझी पर एक हद से ज्यादा भरोसा नहीं कर सकती. मांझी आज कह रहे हैं कि उन्हें नीतीश के लोगों ने धमकी दी, उनके लोगों को जान से मारने की धमकी दी गई इसलिए वे डरकर विधानसभा में विश्वास मत प्राप्त करने नहीं गये. कल को मांझी यह भी कह सकते हैं कि नीतीश कुमार तो देवता आदमी हैं और महादलितों के हितैषी भी हैं. मांझी को जानने समझनेवालों का साफ मानना है कि वे कभी भी ऐसा कर सकते हैं. और यदि ऐसा हुआ तो दुविधा के दोराहे से गुजर रहे महादलित बहुत ही आसानी से नीतीश के पाले में आ सकते हैं. और अगर ऐसा होता है तो भाजपा की सारी रणनीति फेल हो जाएगी.

बिहार के रंगमंच पर चुनाव से पहले एक और चरित्र की धमाकेदार एंट्री होने की सुगबुगाहट है. मांझी के साथ ही भाजपा कोशिश में है कि जदयू और नीतीश कुमार से नाराज चल रहे साबिर अली जैसे पैसे व प्रभाववाले नेता की भी एक नई पार्टी खड़ी करवा दी जाय. इसके जरिए नीतीश और लालू से नाराज मुस्लिम नेताओं का जुटान करके मुसलिम वोटों में सेंधमारी करने की योजना है.

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