बिहार पंचायत चुनाव : बदलाव की बयार

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पंचायत चुनावों का कोई मतलब नहीं, इसने बिहार की संस्कृति का क्षरण किया है:  डाॅ. विजय

Vijay-fFwebदेश में जो व्यवस्था है उसमें पंचायत चुनावों को और उससे बनने वाली व्यवस्था को तीसरी सरकार के रूप में देखा गया. लेकिन बिहार में होने वाले पंचायत चुनाव में तीसरी सरकार की जो मूल अवधारणा है उसकी ही कमी दिखती है. बिहार में पंचायत चुनाव में सबसे मजबूत सवाल स्वायत्तता का है. न पंचायत की सरकार को अब तक अपनी योजना बनाने का अधिकार मिल सका है, न उसके अपने कर्मचारी हैं, न अपना भवन है. तो तीसरी सरकार जैसी अवधारणा कहां कारगर हो पा रही है. मैं तो यह मानता हूं कि संविधान में 73वां संशोधन हुआ, वही एक बड़ी भूल जैसा था या कहिए कि बेईमानी की गई थी. पंचायत और नगर निगम को लिस्टेड ही नहीं किया गया. संविधान के नीति निर्देशक तत्व में जो 40 क है, उसके अनुसार पंचायतों को या इस तीसरी सरकार को राज्य के भरोसे छोड़ दिया गया. इसलिए गौर कीजिए कि 23 सालों के बाद जब 2001 में बिहार में फिर से पंचायत चुनाव शुरू हुआ तो उसमें उत्साह दिखा. सामाजिक न्याय का नजरिया भी दिखा लेकिन उसके बाद पंचायत की व्यवस्था और उसके चुने हुए प्रतिनिधि सिर्फ राज्य सरकार के एजेंसी भर बनकर रह गए और ब्यूरोक्रेसी ने इसे चंगुल में ले लिया. नतीजा यह हुआ कि पंचायत के प्रतिनिधि दलाल हो गए और वे उसी तर्ज पर चुनाव लड़ने लगे, जिस तरह से लोकसभा-विधानसभा के चुनाव लड़े जाते हैं. जो लोग लोकसभा-विधानसभा मंे चुकते गए, वे पंचायत चुनाव में मुखिया बनने के लिए लड़ने लगे. लोकसभा या विधानसभा सदस्य बनकर लूट सकने की संभावना खत्म हुई तो मुखिया बनकर लूटने लगे. और राज्य सरकारों ने भी मुखियाओं को पैसे में उलझा दिया क्योंकि पैसे में अगर नहीं उलझाया जाता तो फिर पंचायतें अपने अधिकार की मांग करतीं और पंचायतों को अधिकार देने को और स्वायत्त करने को कोई तैयार नहीं है. मुखिया राजनीतिक दलों और नेताओं के लिए वोट मैनेज करने का टूल बन गए, इसे आप बिहार में सभी जगह देख सकते हैं और यह भी देख सकते हैं कि कैसे अधिकाधिक पैसे खर्च कर चुनाव लड़े जा रहे हैं. मैं तो साफ मानता हूं कि बिहार में पंचायत चुनावों ने राज्य की संस्कृति का क्षरण किया है और इस तरह से चुनाव कराने का कोई खास फायदा नहीं.

( लेखक गांधीवादी विचारक हैं )
(निराला से बातचीत पर आधारित) [/symple_box]

शाहीना बताती हैं, ‘लड़कियों को साइकिल देने वाली योजना और पंचायत में महिलाओं को आरक्षण देने की घोषणा, नीतीश कुमार के ये दो काम ही ऐसे रहे जिससे वे जाति की राजनीति को पार कर समूह की राजनीति करने वाले नेता बन गए और बड़ी से बड़ी चुनौतियों से पार पाकर तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गए.’ जन जागरण शक्ति संगठन के प्रमुख आशीष रंजन कहते हैं, ‘बिहार पंचायत चुनाव में आपको तमाम बुराइयां दिखेंगी. सरकार की मंशा मंे भी खोट दिखेगा. कहने को पिछले तीन बार से पंचायत चुनाव हो गए हैं. मुखिया करोड़पति हो गए हैं. लाखों में अब कोई बात नहीं करता. कहीं पर पंचायत सरकार का काम फंक्शनल नहीं दिखेगा. कायदे का पंचायत भवन नहीं दिखेगा. टेक्निकल स्टाफ नहीं दिखेंगे. ऐसी तमाम शिकायतें आप कर सकते हैं लेकिन इन तमाम शिकायतों को अभी परे कर सकते हैं, क्योंकि यह पंचायत चुनाव तमाम बुराइयों के बावजूद बिहार को बड़े स्तर पर बदल रहा है. दलित-वंचित अपने राजनीतिक हक के लिए आगे आ रहे हैं. वे चुनाव लड़ रहे हैं, जीत रहे हैं और फिर राजनीति में आगे बढ़कर अपनी हिस्सेदारी पाने के लिए बेताब हैं. आप कह सकते हैं कि मुखियापति और सरपंचपति का जमाना है, महिलाएं सिर्फ मोहरा रहती हैं लेकिन उसका दूसरा पहलू यह देखिए कि इस पंचायत चुनाव के पहले बिहार में स्थिति ऐसी भी नहीं थी. यह तो तय है न कि जो महिला पंचायत चुनाव लड़ेगी उसे स्टूडियो जाकर कटआउट के लिए अपनी तस्वीर खिंचवानी होगी. उसे गलियों में घूमना होगा. सभाओं में कभी-कभार ही सही जाना होगा. यह क्या कम है. बिहार के एक बड़े हिस्से में यह होना भी तो असंभव-सा ही दिखता था.’
शाहीना और आशीष रंजन की तरह ही तमाम लोगों की यही राय है कि पंचायत चुनाव बिहार को बदल रहा है. उसका काला पक्ष है लेकिन उस काले पक्ष पर संभावनाएं भी हावी दिखती हैं. इस बात को बिहार के मुखिया नीतीश कुमार भी अपने तरीके से कहते हैं. 30 मार्च को जब वे शराबबंदी की पुनर्घोषणा करके आदेश दे रहे होते हैं तो खुलकर कहते हैं, ‘यह कड़ा फैसला है लेकिन यह फैसला हमने महिलाओं के कहने पर लिया है. उन महिलाओं के कहने पर जो अब राजनीति और समाज को समझने लगी हैं. उन महिलाओं ने ही हमसे कहा था कि शराब बंद करवा दीजिए. हमने उनकी बात मानकर चुनाव के पहले ही घोषणा कर दी कि अगर सरकार में आए तो शराब बंद करवा देंगे.’ सरकार में आने के बाद उन्होंने पहला फैसला शराबबंदी का ही लिया. नीतीश कुमार यह कहकर बता रहे होते हैं कि बिहार की राजनीति में महिलाओं का क्या महत्व है. और बिहार में महिलाओं का राजनीतिक महत्व बढ़ाने में इस पंचायत चुनाव की भूमिका क्या रही है, यह सब जानते हैं.

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कोई कैसे भी देखे इस चुनाव को, सच ये है कि महिलाओं की स्थिति और बिहार के हाल को पंचायत चुनावों ने ही बदला है : शाहीना परवीन

Shahina Perweenweb

पिछली बार जब पंचायत चुनाव हुआ था तो महिलाओं ने आरक्षित सीटों से ज्यादा पर अपनी जीत दर्ज की थी. 50 प्रतिशत सीटें उनके लिए आरक्षित हैं, इससे ज्यादा प्रतिशत सीटों पर महिलाओं की जीत हुई थी लेकिन उस जीत में एक और बात हुई थी. मुखिया की सीट पर महिलाएं करीब उतनी ही जीत पाई थीं, जितनी सीटें उनके लिए आरक्षित थीं. इसके अलावा एक या दो प्रतिशत के करीब सामान्य सीट पर महिलाएं मुखिया के लिए चुनी जा सकी थीं. ऐसा इसलिए हुआ था कि पुरुष बाकी पदों को तो महिलाओं के हवाले कर देने को तैयार भी हैं लेकिन मुखिया पद को अब भी नहीं देना चाहते. ऐसा इसलिए कि यह पद सीधे-सीधे आर्थिक मसले से जुड़ा हुआ है.
जो महिलाएं आरक्षित पद होने के कारण मुखिया पद के लिए चुन भी ली गईं, उनमें से भी कई को पांचों साल तक कई किस्म की प्रताड़नाओं का शिकार होना पड़ा. अध्ययन के दौरान कई केस ऐसे आए जिससे यह साफ हुआ. मुखिया बनने के बावजूद कई महिलाओं को घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ा. अधिकांश मामले साइन करने को लेकर हुए. पुरुषों का एक हिस्सा चाहता है कि उनके घर की महिलाएं आरक्षण का लाभ लेकर मुखिया तो बनें लेकिन वे सिर्फ मुखिया ही बनी रहें. इसके अलावा अपने दिमाग या विवेक का इस्तेमाल न करें लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा क्योंकि कई जगहों से ये खबरें आ रही हैं कि महिलाएं गोलबंद होकर चुनाव लड़ रही हैं. इस गोलबंदी का रूप-स्वरूप ऐसा है कि कई महिलाएं आपस में तय कर रही हैं कि उनमें से कौन महिला पंचायत समिति सदस्य के लिए चुनाव लड़ेगी, कौन सरपंच के लिए और कौन दूसरे पदों के लिए. इतना ही नहीं, कौन उपमुखिया बनेगी, यह तक इस बार कई जगहों पर तय कर रही हैं.
मुजफ्फरपुर के कांटी इलाके से खबर आई कि वहां एक सीट पर 40 पुरुषों और तकरीबन 39 महिलाओं ने मुखिया पद के लिए नामांकन कर दिया है, जबकि वह सीट महिलाओं के लिए आरक्षित भी नहीं है. यह गोलबंदी का ही असर है. ऐसा कर वे आपस में सहमति बना रही हैं. महिलाएं अब पुरुषों की तरह दांव-पेंच अपना रही हैं. यह सीमित क्षेत्र में ही है लेकिन यह एक बेहतर संकेत है. आने वाले दिनों में इसका असर दिखेगा और यह बिहार जैसे राज्य के लिए बेहतर ही होगा. यह क्यों अच्छा होगा, इसे इस रूप में देख-समझ सकते हैं.
महिलाएं जिन पदों के लिए चुनी गईं, उसका असर पूरे बिहार में व्यापक रूप में देखा गया. महिलाएं वार्ड सदस्य के लिए चुनी गईं, सरपंच पद के लिए चुनी गईं और उन पदों पर रहते हुए खुलकर काम किया. वार्ड सदस्यों को ही देखें. वार्ड सदस्य चुनकर जब महिलाएं आईं तो उसका असर यह हुआ कि बिहार में कई ऐसे मसले उठने लगे जो कभी उठते ही नहीं थे और यह मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रही हूं कि वे मसले पुरुष प्रतिनिधि कभी उतनी शिद्दत से नहीं उठाते. आंगनबाड़ी चल रहा है या नहीं, मध्याह्न भोजन सही समय और सही क्वालिटी के साथ मिल रहा है या नहीं, सैनिटरी नैपकिन का बंटवारा सही से हो रहा है या नहीं, स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय है या नहीं, इन सभी मसलों को पिछले 15 साल में वार्ड और पंचायत स्तर पर महिला प्रतिनिधियों ने ही उठाया है.

(लेखिका द हंगर प्रोजेक्ट में कार्यक्रम अधिकारी हैं )

(निराला से बातचीत पर आधारित) [/symple_box]