नीतीश-लालू को झटका, पर भाजपा की बल्ले-बल्ले नहीं

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विधानसभा चुनाव में धनबल और जाति से ही इस बार का भविष्य तय होना है, यह लगभग तय होता दिख रहा है. इतना ही नहीं, बिहार में यह भी सच है कि गांव, पंचायत अथवा प्रखंड स्तर पर जो जनप्रतिनिधि हैं, उन्हें आम जनता न भी माने तो भी यह माना जाता है कि वे सीधे-सीधे जनता के संपर्क में रहते हैं और आम जनता को प्रभावित करने की क्षमता किसी पार्टी के बूथ मैनेजरों या कार्यकर्ताओं से ज्यादा रखते हैं. नली-गली से लेकर इंदिरा आवास, मनरेगा जॉब कार्ड, लाल कार्ड-पीला कार्ड, शादी-ब्याह आदि कई ऐसे काम होते हैं, जिसके लिए जनता उनसे सीधे संपर्क में रहती है और वे उसके जरिये अपनी पकड़ मजबूत बनाकर उन्हें अपने पक्ष में भी रखते हैं. ऐसे में अगर जनप्रतिनिधियों का मूड पैसे पर तय होता है तो भाजपा उन्हें अपने पेड कार्यकर्ता के तरीके से इस्तेमाल कर सकती है. तब इसमें हैरत की बात नहीं होनी चाहिए हालांकि इससे विधानसभा चुनाव में नीतीश-लालू प्रसाद की जोड़ी को परेशानी हो सकती है. इस तरह देखें तो विधान परिषद चुनाव का विधानसभा चुनाव से सीधा रिश्ता नहीं होते हुए भी और इसे सेमीफाइनल नहीं कहते हुए भी, इसमें कई ऐसे संकेत छिपे हुए हैं, जिससे आगे की राजनीति के संकेत मिल रहे हैं. नीतीश-लालू प्रसाद की जोड़ी को परेशान करने के लिए ये संकेत काफी भी है. लेकिन यहां सवाल दूसरा है कि क्या यह परिणाम हताश-निराश-परेशान और आपस में ही जोर-आजमाइश कर रही भाजपा और उसके गठबंधन दलों के लिए इतनी बड़ी खुशी का पैगाम लेकर आया है कि वह इसी के सहारे विधानसभा चुनाव में भी करिश्मा कर लें, ऐसा कतई नहीं कहा जा सकता.

अव्वल तो यह है कि बिहार के चुनाव परिणामों में पिछले 20 सालों से एक दिलचस्प उदाहरण भी रहा है. कोई चुनाव परिणाम रिपीट नहीं हुआ. अगर 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद की पार्टी को भारी जीत मिली तो अगले ही साल 2005 में विधानसभा चुनाव में वे बिहार की सत्ता से बेदखल हो गए. 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा उपचुनाव हुआ तो लालू प्रसाद की पार्टी को कई जगहों पर जीत मिली, उसे भी सेमीफाइनल कहा गया था लेकिन अगले ही साल 2010 में जब विधानसभा चुनाव हुआ तो लालू प्रसाद की पार्टी और बुरी तरह से परास्त हो गई.

इसी तरह 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने सारे रिकार्ड तोड़कर बिहार में जीत हासिल की और यह माना गया कि यह आंधी अभी विधानसभा चुनाव तक कायम रहेगी लेकिन एकाध माह में ही विधानसभा उपचुनाव में लालू-नीतीश की जोड़ी ने कमाल कर दिखाया, भाजपा पिछड़ गई. इस तरह हर छोटे चुनाव को सेमीफाइनल कहा जाता रहा है लेकिन वह सेमीफाइनल कभी फाइनल के बारे में निर्णय देने वाला नहीं हो सका है.

biharभाजपा के सामने यही और इतनी ही मुश्किल नहीं है. उसके पास रोज-ब-रोज चुनौतियां भी तो बढ़ती जा रही हैं. पप्पू यादव और जीतन राम मांझी ने साथ संवाददाता सम्मेलन कर और मांझी को एनडीए की ओर से सीएम पद का उम्मीदवार बनाए जाने की मांग कर अलग से सियासी हलचल पैदा कर दी है. हालांकि इस बारे में यह भी कहा जा रहा है कि यह भाजपा की ही सधी हुई चाल है कि मांझी और पप्पू यादव साथ मिलकर चुनाव लड़ें और उसमें किसी तरह ओवैसी का मिलान हो ताकि बिहार में त्रिकोणीय चुनाव हो और फिर उसके लिए राह कुछ आसान हो. भाजपा के लिए दूसरी मुश्किलें भी हैं. काफी दिनों से अदृश्य और पटना के ‘फरार सांसद’ कहे जाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता शत्रुघ्न सिन्हा भी अचानक प्रकट हो गए हैं. वे भाजपा के बडे़ से बड़े आयोजनों में नहीं दिखे थे लेकिन अब अचानक दिखे हैं तो बोलना शुरू कर दिया है. बोलना शुरू किया तो मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा के तमाम प्रत्याशियों को खारिज कर लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान का नाम आगे कर दिया. मुश्किल इतनी ही नहीं, भाजपा में खेमेबाजी इतनी तेज हो गई है कि सुशील मोदी की सभा में कभी बिहार का मुख्यमंत्री कैसा हो, सीपी ठाकुर जैसा हो… जैसे नारे भी आराम से लगाए जा रहे हैं. भाजपा की अपनी परेशानियां अपनी जगह बनी हुई हंै. विधान परिषद चुनाव परिणाम लालू-नीतीश के लिए झटका है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह भाजपा के लिए किसी बड़ी खुशफहमी को पालने का मौका दे दे.

इतनी ही नहीं, भाजपा में खेमेबाजी इतनी तेज हो गई है कि सुशील मोदी की सभा में कभी बिहार का मुख्यमंत्री कैसा हो, सीपी ठाकुर जैसा हो… जैसे नारे भी आराम से लगाए जा रहे हैं. भाजपा की अपनी परेशानियां अपनी जगह बनी हुई हंै. विधान परिषद चुनाव परिणाम लालू-नीतीश के लिए झटका है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह भाजपा के लिए किसी बड़ी खुशफहमी को पालने का मौका दे दे.

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