बड़ा इम्तिहान

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हरीश रावत को धारचूला से  चुनाव लड़ना है. कांग्रेस उनकी जीत को लेकर आश्वस्त है. लेकिन सीएम की निगाहें डोईवाला और सोमेश्वर पर ही लगी हैं. दोनों सीटों पर जीत उनकी स्थिति मजबूत करेगी. अभी कांग्रेस पार्टी के 32 विधायक हैं. सरकार बसपा के तीन, यूकेडी के एक और तीन निर्दलीय विधायकों के समर्थन से चल रही है. उपचुनाव में तीनों सीटें मिलने से कांग्रेस बहुमत से सिर्फ एक सीट दूर रह जाएगी. बेशक तब भी सरकार गठबंधन के सहयोग से चले, लेकिन उस सूरत में रावत के पास खुलकर निर्णय लेने की आजादी रहेगी.

ये उपचुनाव नये नवेले प्रदेश अध्यक्ष बने किशोर उपाध्याय के रणनीतिक कौशल की भी परीक्षा माने जा रहे हैं. यही वजह है कि विरोधियों की तगड़ी घेराबंदी के बावजूद वे अपना पूरा फोकस उपचुनाव पर केंद्रित किए हुए हैं. वे जानते हैं कि चुनाव में पार्टी को कामयाबी मिलने की स्थिति में उन्हें इसका दोहरा लाभ मिलेगा. इसीलिए वे किसी तरह की अनावश्यक बयानबाजी से भी परहेज कर रहे हैं. एकजुटता उनका सूत्रवाक्य बन चुका है. वे जहां जा रहे हैं, एकजुटता की ही बातें कर रहे हैं. वे कहते हैं, ‘पार्टी में उत्साह लौट रहा है. त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में भाजपा मोदी के ‘हैंगओवर’ से बाहर आ गई है और उसके अधिकांश प्रत्याशी चुनाव हार गए हैं. साफ है कि उपचुनाव में भाजपा की डगर आसान नहीं होगी. पार्टी की स्थिति इस कदर खराब है कि कई-कई दावेदारों के चलते वह अभी तक प्रत्याशी ही तय नहीं कर पाई है. कांग्रेस तीनों सीटों पर जीत दर्ज करेगी.’

लेकिन प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत, उपाध्याय की बातों से इत्तेफाक नहीं रखते. टिकटों के ऐलान में हो रही देरी को वे सांगठनिक प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं. इसके अलावा एक ही सीट पर कई-कई दावेदारों के नाम सामने आने को भी वे पार्टी के पक्ष में बताते हैं. उनका कहना है कि जीत की संभावनाओं को देखते हुए ही पार्टी में चुनाव लड़ने के लिए ज्यादा नाम सामने आ रहे हैं.

कुल मिलाकर सूबे का सियासी परिदृश्य लोक सभा चुनाव के ठीक उल्टा है. तब भाजपा ने अपने प्रत्याशी पहले ही उतार दिए थे, लेकिन इस बार वह इस मामले में कांग्रेस से पिछड़ गई है. हालांकि असली हार-जीत तो उपचुनाव के नतीजों से ही तय होनी है.

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