बीएचयू विवाद: महामना ‘ही’ या महामना ‘भी’

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22 मार्च 1915 को इंपिरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में बीएचयू बिल पेश किया गया. इस बिल को बटलर ने पेश किया. इसके बाद बहस हुई. रामेश्वर सिंह और मालवीय समेत कई लोगों ने भाषण दिए. बहस हुई और विधेयक पारित होकर अधिनियम बन गया. विश्वविद्यालय की शुरुआत के लिए कई तिथियों का निर्धारण हुआ, लेकिन आखिर में बात चार फरवरी 1916 को वसंत पंचमी का दिन निर्धारित हुआ. आधारशिला रखने लॉर्ड हार्डिंग्स बनारस आए थे. इस समारोह की अध्यक्षता दरभंगा के तत्कालीन महाराज रामेश्वर सिंह ने की थी. जोधपुर के राजा ने धन्यवाद ज्ञापन किया. सर सुंदरलाल पहले चांसलर (वीसी) बनाए गए. जब उनका निधन हुआ, तो स्वामी अय्यर वीसी बने. लेकिन अय्यर शीघ्र ही विश्वविद्यालय छोड़कर चले गए. फिर 1919 में मालवीय इसके वीसी बने और तकरीबन दो दशक तक वीसी रहे.

बीएचयू की आधारशिला चार फरवरी 1916 को रखी गई. लेकिन जो नाम गुमनाम रह गए, उनमें  एनी बेसेंट और नरेश रामेश्वर सिंह हैं
बीएचयू की आधारशिला चार फरवरी 1916 को रखी गई. लेकिन जो नाम गुमनाम रह गए, उनमें एनी बेसेंट और नरेश रामेश्वर सिंह हैं

झा कहते हैं कि विश्वविद्यालय की स्थापना की इस कहानी को दफन कर दिया गया. अगर सिंह ने भूमिका निभाई, जिसके सारे दस्तावेज और साक्ष्य मौजूद हैं, तो उनके नाम को इस तरह क्यों मिटा दिया गया? क्यों विश्वविद्यालय में उनका नाम महज एक दानकर्ता के रूप में एक जगह दिखता है? सिंह की अहम भूमिका से जुड़े दस्तावेजों के बारे में पूछने पर झा कहते हैं, ‘आप यही देखिए न कि जब विश्वविद्यालय बनने की प्रक्रिया चल रही थी, तो अंग्रेज सरकार किसके साथ पत्राचार कर रही थी? जब विश्वविद्यालय का शिलान्यास हुआ, तो बधाई के पत्र किसके नाम आए? झा बताते हैं कि 1914, 1915 और 1916 में लंदन टाइम्स, अमृत बाजार पत्रिका से लेकर स्टेट्समैन जैसे अखबारों में ऐसी रिपोर्ट की भरमार है, जिसमें महाराजा रामेश्वर सिंह के प्रयासों की चर्चा है और विश्वविद्यालय की स्थापना के संदर्भ में विस्तृत रिपोर्ट हैं.

झा कहते हैं कि महाराजा बीकानेर और बीएचयू के सीनेट मेंबर रहे वीए सुंदरम ने साल 1936 में बीएचयू के वास्तविक इतिहास को बदलने की कोशिश की और तब से ही कई नाम विस्मृति के गर्भ में चले गए. बकौल झा,  1936 में विश्वविद्यालय पर एक किताब आई- बीएचयू 1905-1935. इसे सुंदरम ने लिखा और इसकी प्रस्तावना महाराजा बीकानेर ने तैयार की, जो बीएचयू की स्थापना के समय बनी 58 सदस्यों की समिति में भी नहीं थे. इसी किताब ने इतिहास को बदल दिया और मालवीय को उभारकर सबके नामों को गायब कर दिया.

झा साफ करते हैं, ‘मैं यह बात मालवीयजी के प्रति किसी द्वेष से नहीं कह रहा हूं और न ही उनकी क्षमता को कम करके आंक रहा हूं, लेकिन जिस व्यक्ति (दरभंगा महाराज) ने इतनी बड़ी भूमिका निभाई, उसकी चर्चा तक न होना अखरता है.’ झा आगे कहते हैं, ‘बीएचयू के इतिहास में उनके नाम तक की चर्चा न होना या उनके नाम पर एक भवन तक का न होना अजीब लगता है.’ झा इस किताब को संस्थान के 100 साल पूरे होने पर ही लाने की तैयारी में हैं.

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