कुछ समाज ने मारा, बाकी संरक्षण ने

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सुमित्रा का पिता जो उसे न पढ़ा सका, न लिखा सका, न प्यार कर सका, न देखभाल कर सका, अपने अभिभावकीय अधिकार का प्रयोग करके उसके जीवन को अंधेरा बना गया और जीवन जीने की किसी भी तैयारी के बगैर यह निर्दोष लड़की एक अजनबी पुरुष के हाथ सौंप दी गई.

सुशीला

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मनीषा यादव

सुशीला करीम के साथ सूरत जाकर रहने लगी थी. उसके पिता ने लखनऊ के एक ब्लॉक के थाने में रिपोर्ट लिखा दी. पुलिसवाले नौ-दस महीने में सूरत से लड़की को ‘बरामद करा लाए.’ लड़की होम में, लड़का जेल में, फिर बेल पर. बात करने पर लड़की ने पति का साथ चुना. लड़के के पिता ने हेबियस कॉर्पस का केस करके लड़की को अदालत में हाजिर करवा लिया. उसने वहां भी यही बात कही. लड़की हिन्दू थी, लड़का मुसलमान. उन्हें बाकायदा शादी करके रहने का परामर्श दिया गया. लड़की का धर्म परिवर्तन हुआ फिर निकाह. पिछले छह-सात साल से वे लोग सूरत में रह रहे हैं और हम लोगों को फोन करते रहते हैं.

किशोरियों के साथ बातचीत करते हुए हमने पाया कि किसी लड़के के साथ दोस्ती करके घर से भाग जानेवाली किसी भी किशोरी को यह नहीं मालूम था कि विवाह की कानूनी उम्र अठारह वर्ष है और मंदिर में चुपचाप माला बदल लेने को विवाह नहीं माना जाता. वे अपने प्रेमी के साथ घर बसाना चाहतीं थीं इसीलिए अब मजिस्ट्रेट के सामने अपनी उम्र बीस वर्ष बताती हैं ताकि नाबालिग कहकर उन्हें पिता के पास न भेज दिया जाय. होम का दायित्व है कि वे इनके घर वालों को बुलवाएं मगर केवल एक अन्तर्देशीय पत्र डालकर खानापूरी करने से तो काम नहीं चलता. इसलिए बच्चियां यहां पर दसियों साल पड़ी रह जाती हैं. ज्यादातर मामलों में स्वयंसेवी संगठनों के लगातार प्रयासों से ही इन्हें पुनर्स्थापित करना संभव हो पाता है. इनमें से अस्सी प्रतिशत लड़कियां अपने द्वारा चुने गए लड़कों के साथ गईं. सुशीला इन्हीं में से एक है.

होम से छूटने की तीन ही विधियां हैं – किशोरी को उसके माता-पिता ले जाएं, उसकी शादी कर दी जाए या वह अपने पांव पर खड़ी होने लायक हो

परन्तु क्या इन सारी परिस्थितियों के लिए शासन ही उत्तरदायी है? पत्रकार तथा स्वयंसेवी संगठन भी अक्सर चटखारेदार सनसनीखेज खबर छापने और यश कमाने के लोभ में, सरकारी प्रयासों की बखिया उधेड़ते हैं. वे इन्सेस्ट तथा बलात्कार की शिकार किशोरी को जनसुनवाइयों में सरेआम पेश करके अपने संगठन के लिए धन व ख्याति बटोरते हैं. सशक्तीकरण के उद्देश्य से काम करनेवाली संस्थाओं और व्यक्तियों को न केवल ऐसा करने से बचना है बल्कि होम के भीतर मानसिक सशक्तीकरण के लिए काम करने के साथ-साथ उससे बाहर भी समाज में चेतना जगानी होगी. उन सिद्धातों को देखना और उनसे निपटना होगा जिनकी रक्षा के लिए मां-बाप ने बच्चियों को घर से निकाला – जाति? तयशुदा विवाह? या केवल पिता का ही कहना मानना?  ये भी देखना होगा कि वे कौन से कष्ट है जिन्हें न सह सकने के कारण किशोरी ने घर छोड़ा – इन्सेस्ट? डांट-फटकार? नीचा दिखाना? सारे दिन का बेगार श्रम?

मुझे याद है कि हमारे पास एक प्रकरण आया था जिसमें पति ने पत्नी के ऊपर तेल छिड़क कर आग लगा दी थी. वह मरी नहीं बच गई. पति ने बेहयाई से मुझसे कहा ‘दीदी, वह लूज कैरेक्टर थी. एक बार मुझसे लड़कर संस्था में भी रह चुकी है. आप तो जानती ही हैं, संस्था में कैसे चरित्र की लड़कियां रहती  हैं.’ पत्नी को जिन्दा जला कर मारने की चेष्टा करने वाला खूंखार अपराधी पत्नी को लूज कैटेक्टर बता रहा था क्योंकि उसके अत्याचार से त्रस्त होकर वह एक बार संस्था की पनाह ले चुकी थी. इस प्रकरण से एक और बात का संकेत मिलता है कि वे पुरुष, जो यहां की संवासिनियों से विवाह कर रहे हैं, वे उन्हें, उनके अतीत का ताना भी दे सकते हैं. परिस्थिति की शिकार किशोरी अपराधी के कटघरे में खड़ी रहेंगी,  ‘तुमने कुछ न कुछ तो किया ही होगा जो तुम्हें संस्था में रख गया.’

संरक्षणगृहों में रह रहीं लड़कियों से जुड़ी एक जटिलता यह भी है कि इनकी पहचान गोपनीय रखने के नाम पर शासन, अखबार या टीवी के विज्ञापनों आदि में इनका नाम नहीं आने देता.  ऐसी अनेक लड़कियां यहां बंद हैं जिन्हें केवल अपने पिता का नाम मालूम है, अपने घर का पता नहीं. हम ऐसी अनेक बच्चियों से मिले जो बचपन में यहां आई थीं और यहीं किशोरी हो गईं. संवासिनियों की पहचान की गोपनीयता बनाए रखकर उनकी पहचान कैसे उनके परिजनों तक पहुंचाई जाए इसके प्रभावी तरीके ढूंढ़ने होंगे.

किसी भी होम से छूटने की तीन विधियां हैं – किशोरी को उसके माता-पिता ले जाएं, उसकी शादी कर दी जाए या किशोरी यह सिद्ध कर सके कि वह आर्थिक सामाजिक नैतिक दृष्टि से अपने पांव पर खड़ी हो जाएगी. बातचीत के दौरान संरक्षणगृह की एक अधीक्षिका हमें बताती हैं कि मजिस्ट्रेट यदि स्वतन्त्र मुक्ति का आदेश दे भी दे तो वे किशोरी को आखिर किस पते पर भेज दें. आखिर उन्हें फॉलोअप भी तो करना पड़ता है. इसलिए 99 प्रतिशत प्रकरणों में किशोरी को पिता या पति के हाथों ही सौंपा जाता है. यदि लड़कियां पिता के घर न जाना चाहें या पिता उन्हें घर न बुलाना चाहें या उनका पता नहीं चल पा रहा हो तो ऐसी हालत में उनके सामने दो ही विकल्प होते हैं या तो वे शादी कर लें या आजीवन होम में रहें. इसलिए न चाहते हुए भी कई मामलों में संवासिनियां शादी के लिए अक्सर हामी भर देती हैं.

गर्भपात की सहमति देने के लिये इनके मां-बाप मौजूद नहीं. लेडी डॉक्टर्स इन नाबालिग बच्चियों को मां बनने देने के लिए मजबूर हैं

होम में रहकर किशोरियां शिक्षा की मुख्य धारा से कट जाती हैं क्योंकि बाहर  निकलकर वे स्कूल नहीं जा सकतीं. जिस देश में प्रशिक्षित युवावर्ग विश्वविद्यालय तथा तकनीकी संस्थानों से डिग्री लेकर नौकरी के लिए भटक रहा है वहां क्या ये किशोरियां होम में निरुद्ध रह कर स्वावलंबी बन पाएंगी? जाहिर है तीसरा विकल्प दिखावटी है, और उनकी शादी ही की जानी है.

संरक्षण गृह में कुछ बच्चियां बाल अपराध के कानून में भी बंद हैं. एक बच्ची ने बताया कि वह चाचा-चाची के साथ बस में जा रही थी. एक पर्स सीट के नीचे पड़ा था, चाचा ने कहा इसे उठा कर दे दो . तीनों गिरहकटी के जुर्म में पकड़े गए. चाचा-चाची छूट गए, बच्ची यहीं रह गई. आज बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के आरोपी सबसे पहले स्वयं को नाबालिग साबित करने पर इसीलिए तुल जाते हैं ताकि सज़ा से बच जाएं लेकिन जो असल में नाबालिग हैं उनके साथ सरकार क्या कर रही है?

मनोवैज्ञानिक मैस्लो ने हाइरारकी ऑफ नीड्स का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था. इसके अनुसार चलें तो संरक्षणगृह किशोरियों की बेसिक आवश्यकताओं को तो पूरा कर रहे हैं जैसे कि छत, खाना और सुरक्षित महसूस करना लेकिन स्नेह, अपनापन, आत्मसम्मान और आत्मसाक्षात्कार की दिशा में यह कुछ भी नहीं करता. उदारमना लोग अक्सर अपने माता-पिता की पुण्यतिथि पर होम में पूड़ी, परांठे, हलुआ और कभी पुराने कपड़े भिजवा देते है,. पर क्या किशोरियों को यही चाहिए?

समाज ने किशोरियों की उपेक्षा की है, सरकार ने उपेक्षित किशोरियों को निरुद्ध किया है. किसी ने उन्हंे समाज में पुनर्स्थापित करने की चेष्टा नहीं की.

नारी निकेतनों में निरुद्ध किशोरियों का जीवन समाज के एक घर में निरुद्ध किशोरी के जीवन का आईना है. पारदर्शिता और समाज के साथ सहयोग करके काम करने के तमाम दावों के बावजूद सरकार अपनी इन संस्थाओं को गोपनीयता के आवरण में रखना चाहती है. न जाने क्यों सरकार समाज के लोगों को निकेतनों में जाने से किसी न किसी बहाने से रोकती रही है. यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है कि निरपराध किशोरियों को, जिन्हें केवल गवाही के लिए यहां रखा गया है, समाज से काटकर आखिर किस नियम के तहत रखा जा सकता है?

अंजू

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मनीषा यादव

अंजू की कहानी सुनाए बगैर बात पूरी नहीं हो सकती. अंजू नाम की किशोरी लखनऊ के पास के गांव की थी. 2001 में जब वह हमें मिली, गर्भवती थी. तेरह साल की लड़की के चेहरे पर बचपना था. होमवालों ने तो उसके घर के पते पर पोस्ट कार्ड भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली, हम लोगों ने उसके घर का पता लगा लिया. मुहल्ले का नाम था चमरही. जिस देश के संविधान में जाति और धर्म के नाम पर भेदभाव करने की सख्त मनाही है उस देश में आज भी मुहल्लों के नाम चमरटोला और चमरही आदि हैं. अंजू का बाप शराबी था, मां मर चुकी थी और उसे नानी पाल रही थी. जिस करीम के कारण वह गर्भवती थी वह उसे लेने होम नहीं आया. हम लोगों ने उसे सुरक्षा के परामर्श केन्द्र में बुलवा लिया. लड़की 13 साल की, करीम 34-35 साल का. करीम बोला ‘उसकी नानी हमारे खेत में काम करती थी मैं लड़की को वहीं बुला लिया करता था जहां पर हमारी गाय भैसें बांधी जाती हैं.’ मैंने सख्ती से कहा ‘खुद से बीस साल छोटी बच्ची को इस तरह इस्तेमाल करते आपको शर्म नहीं आई?’ ‘मैं नहीं करता तो उसका बाप उसे धंधे मेंे लगा देता, उनकी बिरादरी ही ऐसी है, ‘निर्लज्जता से इतनी गिरी हुई बात कहते करीम को संकोच नहीं हुआ.

अपने विषय में हो रही इन तमाम बातों से अनभिज्ञ अंजू को गर्भधारण से जुड़ी जटिलता का अहसास ही न था. फुसलाकर इस्तेमाल करनेवाले की हरकतों के बारे में वह सोचती थी कि यही प्यार है. हमारी आंखों के सामने ही चौदह साल की लड़की सरकार के संरक्षणगृह में मां बन गईं.

संवासिनी गृह में लेडी डॉक्टर रेनू वर्मा अंजू को विजिट करती थीं जो बड़ी निष्ठा से लड़कियों की सेहत का ध्यान रखती थीं. नेक नर्स जयश्री की देखरेख में गर्भवती लड़कियों को रोज एक उबला अंडा और एक केला दिया जाता था. गरीब घर की बेटियों के लिये एक बहुत बड़ी नेमत. मगर अनचाहे गर्भ का गर्भपात कराना कानूनी जटिलता से भरा है. नये ज्युविनाइल जस्टिस एक्ट के अनुसार किशोरावस्था नाम की कोई अवस्था नहीं होती.अठारह वर्ष की उम्र से छोटा व्यक्ति बच्चा है, और अठारह वर्ष की उम्र से बड़ा व्यक्ति वयस्क. नाबालिग़ की सहमति को सहमति नहीं माना जाता. गर्भपात की सहमति देने के लिये इनके मां-बाप मौजूद नहीं. लेडी डॉक्टर्स इन नाबालिग बच्चियों को मां बनने देने के लिए मजबूर हैं.

आज सन 2014 में यह रिपोर्ट आपसे साझा करते समय लगता है कि यदि ये किशोरियां संवासिनीगृह में निरुद्ध न होतीं तो शायद बदायूं के उस ऊंचे पेड़ पर लाल और हरी चुन्नियों से लटके शव बन चुकी होतीं. हमारे प्रदेश के धर्मनिरपेक्ष नेता जी का कहना है, ‘लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है,क्या उन्हें फांसी दे दोगे?’ लड़कों को फांसी नहीं दी जा सकती, मगर तेरह साल की लड़कियों को तो सरेआम फांसी दे ही दी गई है.

दिल्ली में घटे निर्भया कांड के बाद जब स्वयं को अति प्रगतिशील बतानेवाले लिबरल लेफ़्ट नारीवादी समूह सेक्स के लिए सहमति की उम्र 18 वर्ष से घटा कर 16 करने का ईमेल अभियान चला रहे थे तब मेरा दिल कांप रहा था. उस समय आंखों के सामने इन किशोरियों के चेहरे थे जो मां बनने को मजबूर हो गईं. लिबरल लेफ़्ट नारीवादी समूह शायद उन किशोर-किशोरियों की बात कह रहे थे जिनके लिए सेक्स एक नया खेल हो सकता है. वे लोग कह रहे थे कि शारीरिक रूप से बच्चे आजकल जल्दी मेच्योर हो रहे हैं इसलिए सहमति की उम्र घटा कर 16 कर दी जाए.

इन नारीवादियों और उन अनपढ़ बड़ी-बूढ़ियों की राय में क्या फर्क है जो कहा करती थीं कि ‘बिटिया सयानी हो गई है इसके हाथ पीले कर दो’

मेरी जिज्ञासा है कि इन नारीवादियों की राय और उन अनपढ़ बड़ी-बूढ़ियों की राय में क्या फर्क है जो कहा करती थीं कि‘बिटिया सयानी लगने लगी है अब इसके हाथ पीले कर दो’ क्या सेक्स और प्रजनन को प्रेम और जिम्मेदारी से पूरी तरह अलग करके देखा जाना सही होगा?

‘मैरी स्टोप्स क्लिनिक’ के कार्यकर्ताओं के मुताबिक उनके क्लीनिक में एमटीपी के लिए आने वाली अविवाहित किशोरियों और युवतियों के साथ कभी भी उनके पुरुष साथी नहीं आते. वे अपनी किसी सहेली के साथ आती हैं, अक्सर छिपकर. मुझे लगा कि इससे यही पता लग रहा है कि हमारे समाज में आई आधी-अधूरी आधुनिकता का इस्तेमाल पुरुष, स्त्री के शारीरिक शोषण के लिए ही कर रहे हैं. विवाहपूर्व या विवाहेतर सेक्स उनके लिए मनोरंजन है, जिम्मेदारी नहीं और न ही कोई लंबा रिश्ता.

मनुष्य ने सामाजिक व्यवस्था इसलिए बनाई होगी ताकि मनुष्य अन्य मनुष्यों के साथ चैन से जी सके. परन्तु सामाजिक नियम, मूल्य-मान्यताएं, उम्र का लिहाज, जाति की परंपरा, नैतिकता के मानदंड इतने कठोर, जटिल और इतने महत्वपूर्ण मान लिए गए कि जिन्दगी जीना दूभर हो गया. इतने बड़े समाज और इतनी बड़ी व्यवस्था के बीच एक इंसान के नाजुक से दिल और छोटी सी चाहतों का क्या हो?

इन जीवनों की जटिलता को नजदीक से देखने पर लगता है कि परामर्श की जरूरत किशोरी को नहीं, उसके परिवार को है. अध्यापक, डॉक्टर, इंजीनियर, मिस्त्री, सिपाही कुछ भी  बनने के लिए प्रशिक्षण जरूरी होता है लेकिन माता-पिता बनने  का कोई  प्रशिक्षण नहीं. प्रेमविहीन, संवेदनाशून्य, क्रूर सभी लोग माता-पिता बनने को स्वतन्त्र हंै. स्नेह-प्यार-दुलार-प्रशंसा के दो शब्द सुनने की किशोरी में उत्कट चाहत है, परन्तु उपेक्षा, अवहेलना, उदासीनता और घर के निरानंद कामकाज के बोझ के अतिरिक्त इनमें से ज्यादातर को यह समाज दे क्या रहा है?

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  1. नेपथ्य के पीछे घटनेवाली लड़कियों की अमानवीय घटनाओं ने न केवल झकझोर कर रख दिया वरन क्रूर सच्चाइयों से भी अवगत कराया। शालिनी जी हमेशा ही समस्या की तह में जाकर ,गहरी पड़ताल कर अपनी बात तार्किक ढंग से रखती हैं।
    madhu kankaria

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