दर्द के निशां

हालांकि एक तरह से देखा जाए तो दोनों संप्रदायों के बीच पनपी दुश्मनी अंतरधार्मिक विवाहों के कारण और बढ़ गई हैं. अगर आजकल की राजनीतिक ध्रुवीकरण की भाषा में कहें तो इसे ‘लव जिहाद’ का नाम भी दिया जा सकता है. ये सुनने में अतिरंजित शब्द लग सकता है पर फिर भी ये ग्रामीणों को उत्तेजित करने के लिए काफी है.

लगभग साल भर पहले, अहमद के 23 साल के बेटे नौशाद ने गांव की ही एक हिंदू लड़की के साथ भाग कर शादी कर ली. ग्रामीणों ने इस शादी का कड़ा विरोध किया. उसके बाद दोनों संप्रदायों में कई दौर की बातचीत के बाद गांव वालों ने इस शादी को स्वीकार कर लिया पर फिर भी स्थानीय लोगों की प्रतिक्रियाओं के डर से इस दंपति ने एक पड़ोसी गांव में रहना ही उचित समझा. हाल ही में इनके यहां बेटा भी हुआ है. इनकी शादी का मामला लोगों के ध्यान से उतर ही रहा था कि मस्जिद निर्माण का विवाद उठ खड़ा हुआ. दोनों की भागकर की गई शादी करने की बात दोनों समुदायों के लोगों के लिए एक-दूसरे पर तंज कसने और छींटाकशी करने का मुद्दा बन गई. इन सब विवादों के बाद ये दंपति अपने नवजात बच्चे के साथ कहीं छिप गए हैं.

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ये सुनने में हास्यास्पद है पर गांव में इस शादी को लेकर होने वाली व्यर्थ चर्चाओं ने तनाव को और बढ़ाया था. 53 वर्षीय फूलवती चूल्हे पर खाना बनाते हुए बताती हैं, ‘मुसलमान औरतें बोलती थीं कि हिंदुओं की लड़कियां तो ऐसे ही भागेंगी. हिंदुओं से अपनी लड़कियां नहीं संभल रहीं.’ संयोग से इस झगड़े के कारण गांव की पाइपलाइन से होने वाली गैस सप्लाई बंद हो गई है. लोग या तो चूल्हे पर खाना बना रहे हैं या ब्लैक में एलपीजी सिलेंडर खरीद रहे हैं. यहां छोचक एक रस्म होती है, जिसमें बेटी के यहां बच्चे के जन्म पर उपहार भेजे जाते हैं. ऐसा बताया गया कि इसे लेकर भी तानाकशी हुई जिसने तमाम प्रौढ़ महिलाओं में खासा गुस्सा भर दिया. वैसे पुरुषों ने इन सब को सिरे से ही नजरअंदाज किया. पर शायद उन्हें ध्यान देना चाहिए था.

मस्जिद निर्माण कार्य में साथ दे रहीं मुस्लिम महिलाएं उस रास्ते से मंदिर आने-जाने वाली हिंदू औरतों पर ताने कसती थीं. ऐसे एक मौके पर तो पथराव भी हुआ था. ‘शुरुआत उन्होंने की थी,’ आठ महिलाओं के दल के साथ नियमित रूप से मंदिर जाने वाली फूलवती आरोप लगाती हैं, ‘पहले तो हमने उनके उलाहनों पर ध्यान नहीं दिया पर जब हद पार हो गई तो हम सभी ने इसका विरोध किया, जिसके जवाब में उन्होंने हम पर पत्थरों से हमला कर दिया.’ भारत के शहरों में ऐसा अमूमन तब होता है जब किसी एक समुदाय का कोई धार्मिक जुलूस किसी दूसरे समुदाय के बाहुल्य वाले इलाके से होकर गुजरता है.

खैर, पुरानी ग्रामीण परंपराओं के अनुसार मामला पंचायत में पहुंचा और दोनों संप्रदायों के लोगों के बीच बातचीत भी हुई. पर आखिरकार हिंदुओं ने ये फैसला लिया कि वो उस प्राचीन मंदिर के पास हो रहे मस्जिद निर्माण का विरोध करेंगे. 25 मई की सुबह मस्जिद निर्माण के विरोध में रैली निकाल रही हिंदू महिलाओं पर पथराव भी हुआ था.

शाम तक ये मामला चरम तक पहुंच गया. जैसे ही हिंसा और आगजनी बढ़ी, गांव के लगभग 200 मुस्लिम परिवारों ने रातों-रात अटाली से 12 किमी. दूर बल्लभगढ़ पुलिस थाने में शरण ली. इस बीच अटाली गांव में प्रशासन ने धारा 144 लगा दी. बड़ी संख्या में पुलिस के जवान और कमांडो मस्जिद निर्माण स्थल सहित पूरे गांव की चौकसी में तैनात हो गए.

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थाने में जिंदगी
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संघर्ष के बाद थाने में रहे सुलेमान अपने टूटे घर के फोटो देख के रो पड़े. ‘जैसे ही हमें हिंसा और झगड़े के बढ़ने का पता चला, हमने जरूरी सामान बांधा और भाग निकले. इससे पहले कि हमलावर हम तक पहुंच पाते, हम गांव से बाहर निकल चुके थे.’ उनका घर मस्जिद के ठीक सामने है. वो आज उस जगह जाने में डरते हैं, जहां वो पले-बढ़े, जिसे वो घर कहते थे. उन्होंने मीडिया से निवेदन भी किया था कि वे उन्हें वहां से उनकी धार्मिक किताबें लाकर दे दें. दंगों के बाद लगभग 500 मुस्लिम बल्लभगढ़ थाने में रहे. ये किसी आपदा के बाद बने रिलीफ कैंप के जैसा दृश्य था. कुछ लोगों के बहुत अधिक गर्मी की शिकायत के बाद एसडीएम ने यहां तीन कूलरों की व्यवस्था भी करवाई.

रिलीफ कैंप में मदद कर रहे 21 साल के मो.जहीर ने बताया, ‘अभी तक तो खाने की कोई किल्लत नहीं हुई है. कभी हम घर से कुछ ले आते हैं तो कभी किसी एनजीओ के लोग दान करते हैं. प्रशासन ने कई शिकायतों के बाद यहां कुछ कूलर भी लगवा दिए हैं. पर इन सब के बावजूद, ये कोई जीने का तरीका तो नहीं है.’ गांव की ही एक शिक्षिका ने बताया, ‘ज्यादातर औरतों के पास अतिरिक्त कपड़े नहीं थे. खाने के लिए, मदद के लिए हम किसी और पर निर्भर थे. हमने भिखारियों जैसी जिंदगी जी. मुझे तो ये भी नहीं पता कि मैं अपनी नौकरी पर दोबारा जा भी पाऊंगी या नहीं.’ बहरहाल स्थितियां अब सामान्य होने लगी हैं. लगभग दस दिनों के बाद प्रशासन द्वारा सुरक्षा का आश्वासन देने पर मुस्लिम घर लौटे हैं पर मुश्किलें अभी भी बनी हुई हैं.

फोटो फीचर : देखें अटाली दंगे के बाद का मंजर

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