किसकी इच्छा से मृत्यु

कब तक जीना चाहेंगे या नहीं. ये सम्मानीय मृत्यु पाने की एक संभावना देता है.’

हालांकि, लंबा जीवन जीने का समर्थन करने वाले इसके दूसरे पहलू यानी गलत इस्तेमाल को लेकर भी सशंकित है, जिसकी संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता. क्या गारंटी है कि इच्छा मृत्यु के अधिकार का प्रयोग कमजोर, बूढ़े, विकलांग, मानसिक रूप से अक्षम लोगों को किसी निजी स्वार्थ की वजह से मारने के लिए नहीं किया जाएगा?

स्वैच्छिक इच्छा मृत्यु के अधिकार की समर्थक रहीं पेशे से काउंसलर बर्नाडाइन पांच साल पहले मुंबई से गोवा रहने आईं, पर यहां आने के बाद फिर से अपने स्टैंड पर सोचना चाहती हैं. कारण है उनका वृद्धाश्रमों के साथ काम करना. वे बताती हैं, ‘मेरे घर के पांच किलोमीटर के क्षेत्र में लगभग 6-7 वृद्धाश्रम हैं. बुजुर्गों को घर से निकालने और उनके प्रति हो रही हिंसा की कहानियां लगातार सुनने के बाद मैं फिर से सोचना चाहती हूं कि बुजुर्गों के लिए इच्छा मृत्यु की बात होनी चाहिए या नहीं.’ इच्छा मृत्यु के गलत इस्तेमाल की बहस पर अपना पक्ष रखते हुए ढेलिया कहते हैं, ‘क्या सिर्फ गलत इस्तेमाल की संभावनाओं के चलते इच्छा मृत्यु की बहस को ही खत्म कर देना चाहिए? एक सर्जन द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले चाकू का भी गलत इस्तेमाल किया जा सकता है. ऐसे में क्या सर्जन को चाकू का प्रयोग करने से रोक देना चाहिए?’ अपने निजी अनुभव साझा करते हुए वह बताते हैं, ‘मेरे पिता बहुत बीमार थे, दो साल से बिस्तर पर थे. उनको तड़पता देखकर मैं चाहता था कि वो जल्द से जल्द आराम से इस दुनिया से चले जाएं. ऐसा नहीं था कि मैं उन्हें प्यार नहीं करता था या उनकी परवाह नहीं करता था. मैं उन्हें बहुत प्यार करता था और उन्हें इस तरह से कष्ट में नहीं देख सकता था.’

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ढेलिया ने अपने इरादे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को बताए, जिन्होंने उन्हें ऐसा करने के लिए मना किया. वे बताते हैं, ‘मेरे एक करीबी डॉक्टर दोस्त ने मुझे मना करते हुए कहा कि तुम्हें ये बात जीवन-भर सालती रहेगी कि तुमने अपने पिता को मारा था.’ ये सुनकर ढेलिया ने अपना इरादा छोड़ दिया पर कुछ महीनों बाद मेडिकल प्रेक्टिशनर्स की कॉन््फ्रेंस में एक न्यूरोसर्जन ने उन्हें इस बात के लिए मना लिया और फिर ढेलिया ने अपने पिता का एक्टिव ट्रीटमेंट रोक दिया जिसके बाद उनका देहांत हो गया. अपने इस निर्णय पर बहुत बेतकल्लुफी से ढेलिया बताते हैं, ‘वो शांति से चले गए.’

मगर कहां, कब और कौन (चाहे व्यक्ति से कितना ही करीबी क्यों न हो) किसी दूसरे व्यक्ति की मौत के बारे में फैसला कर सकता है? ये दुविधा अरुणा के मामले में भी कोर्ट के सामने आई थी. किसी रिश्तेदार या थर्ड पार्टी के, मरीज की मर्जी के बिना उसके लिए इच्छा मृत्यु की मांग करने के अधिकार पर कोर्ट ने सवाल उठाया था कि क्या थर्ड पार्टी यानी पिंकी िवरानी या केईएम अस्पताल के स्टाफ को, अरुणा के लिए इच्छा मृत्यु की मांग करने का अधिकार होना चाहिए? इस मामले में निर्णय देते हुए कोर्ट ने कहा था िक पिंकी विरानी जो अरुणा का करीबी दोस्त होने दावा करतीं हैं और जिन्होंने अरुणा की इच्छा मृत्यु के लिए याचिका दायर की है, वो न ही उनकी रिश्तेदार हैं, न ही केईएम अस्पताल के स्टाफ की तरह अरुणा से भावनात्मक जुड़ाव रखती हैं. इसलिए हम पिंकी िवरानी को अरुणा की करीबी दोस्त न मानते हुए केईएम अस्पताल के स्टाफ को उनका करीबी दोस्त मानकर फैसला दे रहे हैं.

बर्नाडाइन के मामले में भी यह दुविधा मौजूद थी. वे बताती हैं,  ‘हम बचपन से सुनते आते हैं कि मां-बाप यही चाहते हैं कि वो बिना किसी कष्ट या लंबी परेशानी के दुनिया से जाएं. जब 92 वर्ष की उम्र में मेरी मां ने बिस्तर पकड़ा तो इच्छा मृत्यु का ख्याल मेरे मन में आना लाजमी था. वो बिस्तर पर थीं, उन्हें बेडसोर हो गए थे पर उनकी दिमागी हालत बिलकुल ठीक थी. वो हमारे लिए बहुत खराब समय था.’ बर्नाडाइन याद करती हैं, ‘कई बार जब वो दर्द बर्दाश्त नहीं कर पाती थीं, तब मुझसे कहतीं कि वो जितनी जल्दी हो सके मरना चाहती हैं.’ कुछ समय बाद इन सब कष्टों, दुविधाओं को छोड़कर अपनी नींद में ही बर्नाडाइन की मां चल बसीं.

बर्नाडाइन की मां की कहानी सवाल उठाती है कि अत्याधिक कष्ट से गुजर रहे लोगों की मृत्यु की इच्छा को कितनी गंभीरता से लेना चाहिए. नई  दिल्ली के एक कैंसर सहायता समूह ‘शांति अवेदना सदन’ की पैलिएटिव केयर यूनिट के साथ काम कर रही डॉ. प्रिया जैन बताती हैं कि कैसे कुंठा में आकर न जाने कितने ही मरीज उनसे उन्हें मार देने की बात कहते हैं. वह बताती है, ‘मगर जैसे ही वो अपने घरवालों, करीबियों के बीच जाते हैं, बात करते हैं, वो अपनी कही बात भूल जाते हैं.’ प्रिया इस बात को भी नकारती हैं कि ‘टर्मिनली इल’ यानी लाइलाज बीमारियों से पीडि़त लोग जल्दी और आसान मौत चाहते हैं. उनके अनुसार, ‘बमुश्किल दो प्रतिशत मरीज ही ऐसे होंगे जो यहां आकर हमसे कहें कि वो जल्द से जल्द मरना चाहते हैं.’

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धार्मिक मतों को लेकर भी उलझन
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इच्छा मृत्यु से जुड़ी बहस को एक बड़ा कारण और उलझा देता है. वो है धार्मिक मत. हर धर्म में मृत्यु के समय और कारण को ईश्वर की मर्जी से जोड़कर देखा जाता है. ऐसे में इच्छा मृत्यु को ईश्वर के काम में इंसानी दखल माना गया है. सिख धर्म इच्छा मृत्यु को ईश्वर की इच्छा का विरोध कहता है, पर कष्ट भोगने को व्यक्ति के कर्मों का फल माना गया है. इस्लाम इच्छा मृत्यु को सिरे से खारिज करता है पर बहुत ही निराशाजनक परिस्थिति में अगर मरीज किसी आर्टिफिशियल तरीके की मदद से अपना जीवन नहीं जीना चाहता, तब ‘डू नॉट रिससिटेट (डीएनआर) आॅर्डर’ को मानते हुए अग्रिम निर्देश दिए जाएंगे. (डीएनआर एक कानूनी आदेश होता है, जो कि रोगी की सहमति के अनुसार, इमरजेंसी में डॉक्टरों द्वारा उसे सीपीआर या एडवांस्ड कार्डिएक लाइव सपोर्ट देने से रोकने के लिए होता है) यहूदी (ज्यूइश) मान्यताओं में मानव जीवन का संरक्षण ही सबसे बड़ा विषय है, हालांकि 16वीं सदी के एक कानून की नई व्याख्या कहती है ‘अगर आत्मा के जाने के रास्ते में कोई बाधा है तो उसे हटा देना ही जायज है क्योंकि यह कोई अलग कार्य नहीं है, बस उस अवरोध को हटा देना ही मृत्यु के प्राकृतिक तरीके की ओर ले जाएगा.’ (वेंटीलेटर?)

सरकार और धर्म ‘लिविंग डेड’ के बारे में अनिश्चितताओं से घिरे हैं.  दोनों कुछ ‘विशेष’ लोगों को अपनी मृत्यु का अधिकार चुनने की आजादी दे रहे हैं

बुद्ध धर्म की अवधारणाएं कुछ अलग हैं. उनकी धार्मिक पुस्तक ‘त्रिपिटक’ में बताया गया है कि स्वयं बुद्ध ने एक बीमार, शारीरिक रूप से कमजोर हो चुके भिक्षुक के आत्महत्या करने को गलत न मानते हुए माफ किया है. ईसाई धर्म में किसी भी व्यक्ति के लिए इच्छा मृत्यु का प्रस्ताव रखना, उसे जीवन के लिए अयोग्य मानने जैसा है पर वो विकल्प देते हैं. क्रिश्चियन मेडिकल एंड डेंटल एसोसिएशन मानती है कि किसी रोगी, जो दिन-ब-दिन शारीरिक तौर पर कमजोर होता जा रहा है, जिसके ठीक होने की भी कोई उम्मीद नहीं है, के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटा देने का विरोध नहीं होना चाहिए.

aruna shaaa

कानून, धर्म और मानवाधिकारों के बीच कुछ व्यक्तियों का मृत्यु आने तक उपवास रखने की प्रथा भी एक उलझा हुआ पहलू है. हिंदू धर्म ग्रंथों में इच्छा मृत्यु की खिलाफत की गई है पर ‘प्रयोपवेशन’ (मृत्यु आने तक उपवास करना) को आत्महत्या नहीं अपवाद माना गया है. जैन धर्म में भी इसी तरह से उपवास यानी ‘संथारा’ की प्रथा प्रचलित है. मृत्यु के लिए तैयार होने पर आहार छोड़ देने की इस प्रथा को ‘दिव्य बुलावे’ की तरह देखा जाता है.

नवंबर 2001 में, हिंदुओं के एक आध्यात्मिक गुरु सतगुरु सिवाया सुब्रमण्यस्वामी को जब पता चला कि उन्हें आंतों का लाइलाज कैंसर है, तो उन्होंने मृत्यु होने तक आहार छोड़ देने की घोषणा की. साथ ही किसी भी तरीके की मेडिकल सलाह या पैलिएिटव केयर लेने से भी मना कर दिया. 2006 में जैन धर्म की अनुयायी कैलादेवी हीरावत ने ‘संथारा’ लेने की घोषणा की, तब उनके परिजनों ने खुशी जाहिर की थी. बहरहाल मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील खुद को पक्ष-विपक्ष दोनों तरफ पाते हैं. कुछ को लगता है कि ये सामाजिक बुराई है, वहीं कुछ ये मानते हैं कि संविधान के अंतर्गत व्यक्ति को अपने धर्म और उसके विश्वासों का अभ्यास करने की पूरी आजादी है, तो इसे कानून का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए.

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