35 साल बाद 50 साल का आरोपी नाबालिग करार

0
170

नाबालिग होने के दावे वाली याचिका पहली बार 2008 में दायर की गई. उस समय अदालत ने विश्वनाथ से उसकी उम्र से संबंधित सभी दस्तावेज जमा करने के लिए कहा. लेकिन वह दस्तावेज जमा नहीं कर पाया.

पोरवाल का कहना है, ‘यह सुनवाई को टालते जाने के लिए अपनाया गया एक तरीका था. अंतत: जब 2012 में सुनवाई शुरू हुई तो विश्वनाथ कोई भी दस्तावेज पेश नहीं कर पाया. नाबालिग संबंधी याचिका वह 1981 में ही दायर कर सकता था, लेकिन उसके वकील ने 2008 तक का इंतजार किया, भला क्यों? यह सुनवाई को लंबा खींचने की योजना थी मतलब जब सभी रास्ते बंद हो जाएंगे तब यह मामला उठाकर सुनवाई को लंबा खींचा जाएगा.’

बहरहाल, यह साबित करने में 8 वर्ष लगे कि अपराध के समय विश्वनाथ की उम्र 16 वर्ष से कम थी. इसके लिए कानपुर देहात के उमरपुर प्राथमिक स्कूल के प्रधानाचार्य सुनील कुमार कटियार को अदालत में हाजिर होने का समन जारी किया गया था. इसी स्कूल में विश्वनाथ ने पांचवीं तक की पढ़ाई की थी, उस समय कटियार स्कूल के प्रधानाचार्य थे. कटियार ने अदालत में 1988 तक का स्टूडेंट रिकॉर्ड रजिस्टर पेश किया. रिकॉर्ड के अनुसार, विश्वनाथ ने उमरपुर प्राथमिक स्कूल में 24 अप्रैल 1976 को दाखिला लिया था. रजिस्टर में विश्वनाथ का जन्मदिन 1 जुलाई 1965 दर्ज था. विश्वनाथ ने पांचवीं पास करने के बाद स्कूल छोड़ दिया.

मामले में एक अहम मोड़ तब आया जब विश्वनाथ के वकील ने कानपुर के सिकंदरा स्थित सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज की ओर से वर्ष 1979 में जारी विश्वनाथ की हाईस्कूल की मार्कशीट अदालत में पेश की. विश्वनाथ इसमें फेल हो गया था लेकिन महत्वपूर्ण बात ये थी कि उनके जन्म की तारीख वही थी जो प्राथमिक स्कूल के रजिस्टर में दर्ज थी. अभियोजन पक्ष के वकील द्वारा आपत्ति करने के बाद उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद, इलाहाबाद की ओर से विश्वनाथ की मार्कशीट और प्रमाण पत्र समेत सभी दस्तावेजों की प्रामाणिकता की जांच की गई. बोर्ड के दस्तावेजों के अनुसार, अपराध के समय विश्वनाथ 15 वर्ष, सात माह और 13 दिन का था.      

000_APH2001072654782web
स्मृतिः सामूहिक नरसंहार में मारे गए लोगों की याद में स्मारक बनाया गया है जिसमें मारे गए लोगों की पूरी सूची है. उन्हें शहीद का दर्जा दिया गया है

हालांकि उम्र छिपाने के मुद्दे पर अभियोजन पक्ष के वकील बहुत ठोस तर्क नहीं रख पाए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में साफ कर दिया है कि मेडिकल परीक्षण से उम्र का ठीक-ठीक पता लगाना संभव नहीं है, ऐसे में अदालत अनावश्यक रूप से इस सामान्य राय से प्रभावित नहीं होगा कि अभिभावक भविष्य में कुछ लाभ उठाने की दृष्टि से बच्चों की उम्र एक-दो साल कम करके दर्ज करवाते हैं. अदालत के अनुसार इस मामले को प्रथमदृष्टया नजर आने वाले तथ्यों के आधार पर ही देखा जाना चाहिए.

आज विश्वनाथ महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत मजदूरी करते हैं.  विश्वनाथ ने कहा, ‘जब से केस शुरू हुआ है तब से मैं अपनी आठ एकड़ जमीन बेच चुका हूं. मेरी पांच बेटियां, दो बेटे हैं, मुझे उन सबकी देखभाल करनी है.’

पोरवाल बताते हैं, ‘विश्वनाथ भी फूलन की तरह मल्लाह जाति से है. उस समय इन डाकुओं को ‘बागी’ कहा जाता था. जब भी उन्हें किसी गांव पर हमला करना होता था या किसी का अपहरण करना होता था तब वे एक जगह इकट्ठा हो जाते और काम खत्म होने के बाद अपने-अपने गांवों में जाकर छिप जाते थे. उस वक्त हर गांव की चाहत होती थी कि उनका कोई न कोई सदस्य डाकुओं के गिरोह में हो ताकि उनका गांव ठाकुर जैसी सवर्ण जातियों की हिंसा से सुरक्षित रहे.’

‘नाबालिग होने का दावा मामले की सुनवाई के समय कभी भी किया जा सकता है, यहां तक कि केस का अंतिम फैसला हो जाने के बाद भी. अदालत के फैसले के अनुसार देरी से याचिका दायर करने के कारण नाबालिग होने के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता’    

दिलचस्प यह है कि अभियोग चलाने का पहला चरण चार माह पहले ही शुरू हुआ है और मामले को हर दिन सुनवाई के लिए रखा गया है. 24 सितंबर,  2015 को 15 गवाहों को अदालत में पेश किया गया. इनमें से सात को उसी समय पेश किया गया था जब फूलन और उसके गिरोह ने बेहमई में 22 राजपूतों   को मारा था. फूलन देवी के डर और दहशत की वजह से उस समय एक भी गवाह सामने आकर गिरोह की पहचान करने के लिए तैयार नहीं था. लेकिन सुनवाई आगे बढ़ने के साथ गवाहों ने दोषियों की पहचान करनी शुरू की. हालांकि गवाहों के लगातार बदलते बयानों ने मामले को पेचीदा बना दिया था.

बहरहाल, इस मामले में अंतिम फैसला आना अभी बाकी है, लेकिन बेहमई सामूहिक नरसंहार कांड मामले के 35 साल बाद अदालत द्वारा 50 साल के विश्वनाथ को अपराध के समय ‘नाबालिग’ घोषित करना हैरान करता है. यह फैसला तब आया है जब 16 दिसंबर, 2012 के निर्भया कांड के मामले में नाबालिग की सजा को लेकर देशभर में चली बहस और नए कानून के तहत गंभीर अपराधों में शामिल नाबालिग की उम्र सीमा 18 से घटाकर 16 वर्ष कर दी गई.