‘अफसोस है कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर होते जा रहे हैं’

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क्या इस्लाम की छवि एक कट्टरपंथी धर्म की बनती जा रही है जिसमें आधुनिकता और सुधारों के लिए कोई जगह नहीं ?

मै सबसे पहले इस बातचीत के माध्यम से सभी लोगों से ये कह देना चाहता हूं कि क़पया वे इस्लाम को मुसलमानों के कामों से और उनकी बातों से न समझें. बहुत अफसोस की बात है कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर होते जा रहे हैं. मै इस्लाम के बारे में जो भी बात करूंगा वो कुरआन और हदीस के आधार पर करूंगा. इस्लाम समाज में सुधार के लिए ही आया था, फिर ये कैसे हो सकता है कि उसमें सुधार की गुंजाइश न हो. सुधार तो हमेशा जारी रहता है और रहना चाहिए. समय आगे बढ़ता है और इसके अनुसार रीफार्म भी होता रहता है. इस्लाम में सुधार के लिए ही शरीयत में इज्तेहाद की प्रक्रिया मौजूद है. इज्तेहाद के माने ही हैं री एप्लीकेशन ऑफ शरिया. शरीयत के बारे में भी लोगों में बहुत सी ग़लतफहमियां हैं. इस्लामी शरीयत पूरी तरह व्यवस्थित है. और दो बुनियादी उसूलों पर निर्भर है. शरीयत में रीज़निंग के खिलाफ कोई बात नहीं रखी जा सकती. अगर कोई बात हमको रीज़निंग के खिलाफ दिखाई देती है तो उसे हमें शरीयत से निकाल फेंकने का अधिकार है, उस पर बहस करने का अधिकार है. इस्लाम आस्था पर नहीं, विश्वास पर आधारित है. विश्वास रीज़निंग (तर्क) के बाद ही आता है. दूसरा बुनियादी उसूल ये है कि शरीयत में अन्याय के लिए कोई जगह नहीं है. याने इस्लाम में सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि किसी भी व्यक्ति के खिलाफ अन्याय नहीं किया जा सकता. तो एक ऐसा धर्म जिसकी बुनियाद ही रीज़निंग और न्याय पर है, मुसलमानों का रवैया उससे बिल्कुल अलग जा पड़ा है. इसका हमें बहुत खेद है इसीलिए मै कहता हूं कि इस्लाम को कुरआन और हदीस की बुनियाद पर ही जाना जाए. किसी मुसलमान के कामों के आधार पर नहीं.

विज्ञान और तकनीक से भी इस्लाम का टकराव आए दिन होता रहता है. इनको भी कई मुसलमान गैर-इस्लामी मानते हैं. ऐसी सोच बन गई है कि इस्लाम विज्ञान और तकनीक को तरक्की को अंगीकृत नहीं कर पाता  ?

ऐसा उन मुसलमानों की वजह से हुआ है जो शरीयत को बिना समझे शरीयत के बारे में बात करना शुरू कर देते हैं. बिना इस्लाम को जाने किसी चीज़ को गैर-इस्लामी करार दे देते हैं. अफसोस कि ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है. लेकिन इनमें से ज्यादातर लोगों को अज्ञानतावश सही तथ्य नहीं मालूम. किसी भी काम को करने का अगर साधन बदल जाए तो वह काम या साधन गैर इस्लामी कतई नहीं होता. इस्लाम ज़माने के आगे बढ़ने के साथ तकनीक और साधनों के बदलाव को स्वीकार करता है. क्योंकि विज्ञान और तकनीक से गुरेज़ करके तरक्की कैसे होगी ? अफसोस कि ज्यादातर मदरसों में भी ये चीज़ें नहीं सिखाईं पढ़ाईं जा रहीं. वहां भी एक दूसरे के खिलाफ नफरतें ही पढ़ाई जाती हैं. ज्यादातर मदरसों का अप्रोच ठीक नहीं है.उसमें आधुनिकता नाम की कोई चीज़ नहीं है. मदरसों को अपनी अप्रोच पूरी तरह बदलनी होगी.

परिवार नियोजन के बारे में मुसलमानों की एक बड़ी आबादी में कई पूर्वाग्रह हैं, आप इसको किस तरह देखते हैं ?

इस्लाम में परिवार नियोजन की अनुमति नहीं, ये बहुत बड़ा भ्रम है जिसका सर्वाधिक नुकसान खुद मुसलमानों को ही उठाना पड़ता है. अस्ल में इस्लाम में गर्भपात (एबॉर्शन) करवाने के लिए सख्ती से मनाही है. कुरआन में आया है कि मुफलिसी के डर से अपने बच्चे का कत्ल न करो. जब तक गर्भ में जान ही नहीं आई, वो बच्चा बना ही नहीं तो परिवार नियोजन करने से उसका कत्ल कैसे हो सकता है. इस्लाम में ये भी आता है कि विवाह अपने से अच्छी संतान छोड़कर जाने के लिए किया जाता है न कि अपने से ज्यादा संतान छोड़ कर जाने के लिए. एक ही बच्चा हो लेकिन हीरा हो. इस्लाम में क्वांटिटी पर नहीं क्वालिटी पर ज़ोर है. ईरान ने परिवार नियोजन के ज़रिए ही अपनी आबादी में वृद्धि को एकदम नियंत्रित कर दिया है. अगर इस्लाम में परिवार नियोजन की अनुमति न होती तो ईरान जैसे देश में ये कैसे हो पाता ?

मुस्लिम संगठनों और धर्मगुरूओं के द्वारा जिस तरह फिल्म और साहित्य का विरोध किया जाता है उसके बाद इस्लाम में अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए कितनी गुंजाइश बचती है ?

देखिए अगर आपका इशारा सलमान रूश्दी सेटनिक वर्सेज़ की तरफ है तो मै आपको बता दूं बहुत पहले जब मैं लंदन में था तो मैने खुद वो किताब पढ़ने की कोशिश की थी लेकिन उस किताब की भाषा इतनी अभद्र और आपत्ति जनक है कि वह मुझसे नहीं पढ़ी गई. इस किताब में उन पैगम्बरों के बारे में भी इतनी घटिया गालियों के साथ बातें की गईं हैं जो कि इस्लाम ही नहीं दूसरे धर्मों के लिए भी सम्माननीय हैं. ऐसे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस हरकत को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.  अभिव्यक्ति की आज़ादी ज़रूरी चीज़ है और देश का संविधान और इस्लाम दोनों इसे मानते हैं. लेकिन ये बात भी याद रखने लायक है कि आपकी स्वतंत्रता तब तक जायज है जब तक दूसरों की स्वतंत्रता में व्यवधान न पड़े. अपनी आज़ादी के नाम पर आप मेरी नाक नहीं तोड़ सकते. आप किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं का इस तरह अपमान नहीं कर सकते.

अगर किसी चीज़ पर आपको ऐतराज़ है तो उसका विरोध करने के लोकतांत्रिक तरीके हैं, अगर आपको लगता है कि किसी ने कोई अपराध किया है तो आप उसे सजा दिलाने के लिए न्यायपालिका की शरण में जा सकते हैं. लेखक को मार डालने का फतवा जारी कर देना अथवा जान लेने पर उतारू हो जाना कहां तक उचित है ?

यहां मै आपसे सहमत हूं. सही तरीका यही है कि अगर किसी से शिकायत है तो उसके खिलाफ कोर्ट में जाकर न्याय के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए न कि खुद ही उसे मार डालने पर आमादा हो जाना चाहिए. सज़ा कोर्ट देगी. मुझे या आपको अधिकार नहीं है सजा देने का. इस तरीके का विरोध भी इस्लाम के बारे में लोगों को ग़लत धारणा बनाने पर मजबूर करता है. पैगम्बर मुहम्मद साहब तो सिर्फ अपने विरोधियों को ही नहीं बल्कि उन लोगों को भी माफ कर दिया करते थे जो उन्हे गालियां देते थे. ऐसी कई मिसालें हमें मिलती हैं.

इस्लाम में कई फिरके और विचारधाराएं हैं, और सभी अपने आप को ही सही बताते हैं. अक्सर वैचारिक मतभेद खूनी संघर्ष में बदल जाता है, ऐसे में किसको सही और किसको ग़लत माना जाए ?

मैने आपको बताया कि इस्लाम के दो बुनियादी उसूल हैं. रीज़निंग के खिलाफ कुछ भी स्वीकार्य नहीं और न्याय के खिलाफ कुछ भी स्वीकार्य नहीं. जो भी फिरका इस पर अमल कर रहा हो, वही सही है. रही बात खून खराबे की तो जो लोग ये कर रहे हैं वे मुसलमान बिल्कुल नहीं हैं. तालिबान जो कुछ कर रहे हैं, वे अपराधी हैं मुसलमान नहीं. इस्लाम में या तो आप मुसलमान हो सकते हैं या क्रिमिनल हो सकते हैं. दोनो एक साथ नहीं हो सकते.

आप जो कह रहे हैं वे आदर्शवादी बाते हैं, लेकिन हो तो इसका उल्टा ही रहा है ?

मैने आपसे इंटरव्यू की शुरूआत में सबसे पहली बात ही ये कही थी कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर हो गया है. कृपया उसकी बातों और कामों से इस्लाम को न जानें. मै वही बातें कर रहा हूं जो कुरआन और हदीस में हैं. लेकिन अफसोस कि मुसलमान इन्हे जानते समझते नहीं.

आपने कहा कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर आ पड़ा है, ऐसा क्यों हो रहा है ?

हमारे यहां मौलवियों ने आम मुसलमानों के सामने इस्लाम की एक बिल्कुल ग़लत तस्वीर रखी है. ये जाहिल लोग हैं, इस्लाम जानते ही नहीं. साथ ही ज्यादातर मौलवी खुद ही बहुत तंगनज़र हैं. बहुत कम ही मौलवी हैं जो विज़नरी हैं. इसीलिए कई बार मै गुस्सा होकर अपने स्टूडेंट्स से कह देता हूं अगर आगे बढ़ना है तो मुफ्ती से मुक्ति पाओ. धर्म अपने आप में अमृत है लेकिन जब उसमें जहालत (अज्ञान) और सियासत जैसी चीज़ें घुल जाती हैं तो वह ज़हर बन जाता है. हमारे यहां धर्म में बहुत पहले ही ये चीज़ें आ चुकी हैं. मुसलमानों को चाहिए कि वे इल्म हासिल करें और दुनिया में अपना मुकाम हासिल करें. साथ ही किसी भ्रम की स्थिति में दूसरों के बहकावे में आने के बजाए अपनी अक्ल पर भरोसा करें.

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