‘अफसोस है कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर होते जा रहे हैं’

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अगर किसी चीज़ पर आपको ऐतराज़ है तो उसका विरोध करने के लोकतांत्रिक तरीके हैं, अगर आपको लगता है कि किसी ने कोई अपराध किया है तो आप उसे सजा दिलाने के लिए न्यायपालिका की शरण में जा सकते हैं. लेखक को मार डालने का फतवा जारी कर देना अथवा जान लेने पर उतारू हो जाना कहां तक उचित है ?

यहां मै आपसे सहमत हूं. सही तरीका यही है कि अगर किसी से शिकायत है तो उसके खिलाफ कोर्ट में जाकर न्याय के लिए लड़ाई लड़नी चाहिए न कि खुद ही उसे मार डालने पर आमादा हो जाना चाहिए. सज़ा कोर्ट देगी. मुझे या आपको अधिकार नहीं है सजा देने का. इस तरीके का विरोध भी इस्लाम के बारे में लोगों को ग़लत धारणा बनाने पर मजबूर करता है. पैगम्बर मुहम्मद साहब तो सिर्फ अपने विरोधियों को ही नहीं बल्कि उन लोगों को भी माफ कर दिया करते थे जो उन्हे गालियां देते थे. ऐसी कई मिसालें हमें मिलती हैं.

इस्लाम में कई फिरके और विचारधाराएं हैं, और सभी अपने आप को ही सही बताते हैं. अक्सर वैचारिक मतभेद खूनी संघर्ष में बदल जाता है, ऐसे में किसको सही और किसको ग़लत माना जाए ?

मैने आपको बताया कि इस्लाम के दो बुनियादी उसूल हैं. रीज़निंग के खिलाफ कुछ भी स्वीकार्य नहीं और न्याय के खिलाफ कुछ भी स्वीकार्य नहीं. जो भी फिरका इस पर अमल कर रहा हो, वही सही है. रही बात खून खराबे की तो जो लोग ये कर रहे हैं वे मुसलमान बिल्कुल नहीं हैं. तालिबान जो कुछ कर रहे हैं, वे अपराधी हैं मुसलमान नहीं. इस्लाम में या तो आप मुसलमान हो सकते हैं या क्रिमिनल हो सकते हैं. दोनो एक साथ नहीं हो सकते.

आप जो कह रहे हैं वे आदर्शवादी बाते हैं, लेकिन हो तो इसका उल्टा ही रहा है ?

मैने आपसे इंटरव्यू की शुरूआत में सबसे पहली बात ही ये कही थी कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर हो गया है. कृपया उसकी बातों और कामों से इस्लाम को न जानें. मै वही बातें कर रहा हूं जो कुरआन और हदीस में हैं. लेकिन अफसोस कि मुसलमान इन्हे जानते समझते नहीं.

आपने कहा कि मुसलमान इस्लाम से बहुत दूर आ पड़ा है, ऐसा क्यों हो रहा है ?

हमारे यहां मौलवियों ने आम मुसलमानों के सामने इस्लाम की एक बिल्कुल ग़लत तस्वीर रखी है. ये जाहिल लोग हैं, इस्लाम जानते ही नहीं. साथ ही ज्यादातर मौलवी खुद ही बहुत तंगनज़र हैं. बहुत कम ही मौलवी हैं जो विज़नरी हैं. इसीलिए कई बार मै गुस्सा होकर अपने स्टूडेंट्स से कह देता हूं अगर आगे बढ़ना है तो मुफ्ती से मुक्ति पाओ. धर्म अपने आप में अमृत है लेकिन जब उसमें जहालत (अज्ञान) और सियासत जैसी चीज़ें घुल जाती हैं तो वह ज़हर बन जाता है. हमारे यहां धर्म में बहुत पहले ही ये चीज़ें आ चुकी हैं. मुसलमानों को चाहिए कि वे इल्म हासिल करें और दुनिया में अपना मुकाम हासिल करें. साथ ही किसी भ्रम की स्थिति में दूसरों के बहकावे में आने के बजाए अपनी अक्ल पर भरोसा करें.

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