दिल जीतने वाला कलाकार

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पौड़ी गढ़वाल के काबरा गांव में जन्मे और दिल्ली में पले-बढ़े दीपक से यह पूछा जाए कि अभिनेता बनने का ख्याल पहली बार उनके दिल में कब आया तो जवाब में मिलने वाली जगह, जहां यह ख्याल आया, वाकई दिलचस्प है. उनके स्कूल में प्रार्थना और राष्ट्रगान के तुरंत बाद वहीं हाजिरी ली जाती थी. दीपक सबसे आगे खड़े होकर रोल नंबर बोलते थे. शुरू में यह घबराहट का काम होता था जिसमें उनके पैर कांपते थे लेकिन बाद में उन्हें इसमें मजा आने लगा. और तो और, वे उसी दौरान इशारों और आवाज के उतार-चढ़ाव का इस्तेमाल करके अपने दोस्तों से बात भी कर लेते थे. तब उनमें पहली बार मंच का मोह जगा और उसका केंद्र बनने का इसके तुरंत बाद उन्होंने पढ़ाई को कोरेस्पॉन्डेंस के हवाले करके थियेटर की राह पकड़ ली और सात साल दिल्ली में नाटक करते रहे, छह साल अरविंद गौड़ के साथ ‘अस्मिता’ में और एक साल पं. एनके शर्मा के निर्देशन में.

मां को उनका यह शौक जितना भाता था, पिताजी उतना ही अपने बेटे के कॅरियर के लिए परेशान होते थे. उन्हें सरकारी नौकरी के लिए बेटे के ओवरएज हो जाने की फिक्र होती जा रही थी और बेटा मुंबई चला गया था. फिर संघर्ष के कुछ साल थे, लेकिन दीपक मानते हैं कि मुंबई में इतने लोग संघर्ष कर रहे होते हैं कि एक सामूहिक हौसला आपको आगे खींच ले जाता है. हालांकि वह संघर्ष एक अलग स्तर पर अब भी जारी है. अब ऑफर काफी मिलने लगे हैं लेकिन उन्हें ऐसी भूमिकाओं की तलाश है जिनमें वे अपनी सीमाओं से भी आगे जा सकें. उनके किरदारों का आकार भी बढ़ता जा रहा है और वैराइटी भी. जहां इसी शुक्रवार रिलीज हुई बेला नेगी की ‘दाएं या बाएं’ में वे मुख्य भूमिका निभा रहे हैं वहीं मृगदीप लांबा की कॉमेडी ‘तीन थे भाई’ में वे श्रेयस तलपड़े और ओम पुरी के साथ हैं. उनका चेहरा-मोहरा बॉलीवुड की मुख्यधारा के परंपरागत नायकों जैसा नहीं है और इस बात से वे कभी परेशान भी नहीं दिखते. शायद वे मुख्यधारा की फॉर्मूला कहानियों के सांचे में खुद को असहज ही महसूस करते हैं. बेला नेगी उन्हें बेहद मासूम बताती हैं. उन्हें लगता है कि उनकी फिल्म के नायक के चरित्र की जितनी विरोधाभासी परतें हैं- वह ईमानदार भी है और स्वार्थी भी, बुद्धू भी है और समझदार भी- उन्हें दीपक हर बारीकी के साथ जी गए हैं.

साधारण नैन-नक्श वाला ये शख्स फिल्मों में हमारे शहर या हमारे घर के  आसपास रहने वाला नजर आता है. दीपक अपने अभिनय में अपनी इस खूबी से बहुत ही सहजता से कायम रखने में सफल रहे हैं. ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में जानदार अभिनय के कारण कंगना ने भले ही सारा बाजार लूट लिया हो, लेकिन दर्शक दीपक डोबरियाल के उम्दा अभिनय को भुलाए नहीं भूल सकते. उनमें एक स्थायी सकारात्मकता है जो खिलंदड़पने या बेफिक्री जैसी भी लगती है लेकिन उसकी जड़ें शायद उनके पहाड़ी गुणसूत्रों में हैं. वे उस बल्लेबाज की तरह हैं जो आपको विज्ञापनों में या अपने स्टाइलिश शॉट्स के गुण गाता हुआ भले ही न दिखे लेकिन बात उस पर छोड़ोगे तो वह मैच निकाल ले ही जाएगा.

1 COMMENT

  1. काफी पुराना लेख है लेकिन दीपक डोबरियाल की काबिलियत आज भी वही है।

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