हम फिदा-ए-लखनऊ

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इसी तरह से सुंदर सांस्कृतिक केंद्रों, व्यवस्थित प्रेक्षागृहों, चमचमाते बाज़ारों, मल्टीप्लेक्स, शॉपिंग मॉल, डिस्कोथेक-बार और एम्यूजमेंट सेंटर, क्लबों और खूबसूरत पार्कों की भी कमी नहीं है. दिलचस्प बात ये भी है कि चौक जैसे रिवायती इलाके में भी पांच से ज्यादा पूल और बिलियर्ड्स प्वाइंट हैं जो कि खचाखच भरे रहते हैं.

पढ़ने-लिखने के शौकीन इस शहर में पुस्तकालय पहले भी थे, लेकिन दिल्ली मुंबई की तर्ज पर अब लखनऊ में भी 300 स्टोरीज डॉट कॉम जैसे बेहतरीन ऑनलाइन पुस्तकालय हैं जो न सिर्फ घर बैठे आपको आपकी मनपसंद किताबें पहुंचा रहे हैं बल्कि आपके बच्चों में पठन-पाठन की आदतें विकसित करने के लिए भी काम कर रहे हैं. आज शहर से कई सारी प्रतिष्ठित पत्रिकाएं और लगभग सारे बड़े अखबार निकल रहे हैं. शहर अभी भी हिंदी-उर्दू के बड़े नामों का गढ़ है. साथ ही यहां युवाओं के द्वारा रोज नए बुक क्लब और लिटरेरी सोसाइटी शुरू हो रहीं हैं. रेजीडेंसी जैसी ऐतिहासिक जगह पर भी सुबह-सुबह युवाओं द्वारा ‘बेवजह मॉर्निंग’ जैसा ताजगी भरा आयोजन किया जा रहा है. यहां एक नहीं बल्कि दो-दो भव्य लिटरेचर फेस्टिवल होते हैं जिनमें देश-दुनिया के बड़े साहित्यकार लखनऊ शिरकत करते हैं. इस तरह से नए दौर के लखनऊ में आज वो सब कुछ है जो यहां पहले कभी नहीं था.

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अच्छी बात ये है कि नए दौर में होने के बावजूद गुजिश्ता दौर से भी इसने अपनी नातेदारी निभाए रखी है. संक्रमण काल से गुजर रहे किसी भी समाज के लिए ये बहुत कठिन काम होता है. लेकिन असल में लखनऊ को लखनऊ उसकी समन्वय की असीम क्षमता ही बनाती है. ये इसी शहर में हो सकता है कि एक ही वक्त में एक ही तरह के लोगों के द्वारा टुंडे के कबाब और बाजपेयी पूड़ी भंडार की पूड़ियां भी लंबी लाइन में लगकर खरीदीं जाएं और सहारा गंज के फूड कोर्ट में पास्ता या सिज़लर खरीदने के लिए भी गदर मचा रहे. मीर-ओ-गालिब पर भी गाहे-गाहे तब्सरा होता रहे और अमीश त्रिपाठी की भी पुरसिश होती रहे. वे बेगम अख्तर के मुरीद भी रहें और शकीरा के दीवाने भी. हज़रतगंज में ‘गंजिंग’ करने के भी शौकीन हों, तो नक्खास में इतवारी बाजार में भी तफरीह करते मिलें. चौक वाले चिकन के कुरते भी उन पर उतने ही फबते हों जितने प्रोवोग से लिए पश्चिमी परिधान. जहां गोमतीनगर, जानकीपुरम, एल्डिको और आशियाना में भी उतनी ही लखनवियत हो जितनी कश्मीरी मोहल्ले, शीश महल, राजा बाजार या सआदतगंज में मिलती है.

लखनवी तहज़ीब पर अक्सर ही अभिजात्य और जनविरोधी होने का आरोप लगता है, क्योंकि नफासत की आड़ में वह अवधी लोक संस्कृति से मुंह फेर लेती है

इन जैसी तमाम खुशगवार मिसालों के बावजूद अगर हमें वास्तव में लखनऊ के समन्वयकारी चरित्र को सलीके से समझना है तो यहां के सामाजिक ताने-बाने में गुंथी मिसालों को मद्दे नजर रखना चाहिए. जैसे अगर यहां झाऊ लाल का बनवाया इमामबाड़ा है, तो जनाबे आलिया का बनवाया हनुमान मंदिर भी है. पड़ाइन की बनवाई मस्जिद है, तो आसफुद्दौला का अता किया कल्याण गिरि मंदिर भी है. ये वो शहर है जहां मुसलमान बड़े मंगल पर हलवा-पूड़ी बटवाते हैं, जमघट पर पतंग उड़ाते हैं, होली में रंग खेलते हैं, कृष्ण जी की बारात में शामिल होते हैं, तो हिंदू मुहर्रम में अजादारी करते हैं, सबीले लगवातें हैं और रमज़ान में सहरी के लिए जगाते हैं, बल्कि इफ्तारी का इंतज़ाम भी करते हैं. ये रिवायतें तब से पूरी आबो ताब के साथ कायम हैं जबसे राजा झाऊलाल कर्बला की ज़ियारत के लिए इराक जाया करते थे और वाजिद अली शाह जोगिया चोले में कन्हैया बना करते थे. इसीलिए यहां अब तक हमको लोगों की जुबान पर वाजिद अली शाह की लिखी गई गणेश हनुमान स्तुतियां भी मिल जाती हैं और नानक चंद नानक के लिखे मर्सिए भी.

लखनऊ की एक मकबूलियत इसके दस्तरखान की वजह से भी है. शाकाहार के शौकीनों के लिए यहां पूड़ी-सब्जी, खस्ता-कचौड़ी, छोले-भटूरे, चाट, पानी के बताशे और बंद-मक्खन जैसे बेशुमार नज़राने हैं तो नॉनवेज का तो गढ़ ही लखनऊ है. दर्जनों तरह के कबाब लखनऊ से मंसूब हैं, साथ ही सैकड़ों तरह के और पकवान भी. टुण्डे कबाबी, रहीम की नहारी, नौशीजान और इदरीस की बिरयानी जैसी जगहें खाने-पीने के शौकीनों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं. यहां एक बात बता देना जरूरी है कि एक मुद्दत तक लखनऊ में बिरयानी को जानवरों की गिज़ा कहा जाता रहा. और पुलाव को उस पर तरजीह दी जाती रही, लेकिन आज दमपुख्त लखनवी बिरयानी भी यहां खूब खाई जाती है. अब्दुल हलीम शरर ने अपनी किताब गुजिश्ता लखनऊ में दोनों के बारीक अंतर को इस तरह समझाया है- ‘देहली में बिरयानी का खास रिवाज है. मगर लखनऊ की नफासत ने पुलाव को उस पर तरजीह दी. आवाम की नज़र में दोनों करीब-करीब एक ही हैं, मगर बिरयानी में मसाले की ज्यादती से सालन मिले हुए चावलों की शान पैदा हो जाती है, पुलाव के मुकाबिल बिरयानी नफासत पसंद लोगों की नज़र में बहुत ही लद्धड़ और बदनुमा गिज़ा है.’

लखनऊ की इन खूबियों के बावजूद अगर किसी बयान में सिर्फ खूबियां ही बताई जाएं तो ये बयान अधूरा ही कहा जाएगा. ये भी सच है कि अपनी तमाम खूबियों के बावजूद इस शहर के स्वभाव में कई ऐसी बातें हैं जिन्हें किसी भी नज़र से तहज़ीब के दायरे में नहीं रखा जा सकता. यहां हिंदू-मुस्लिम दंगे नहीं होते लेकिन बहरहाल दंगे तो हर साल होते ही हैं. यूं तो ये शहर ‘पहले आप’ के लिए मशहूर है लेकिन ये भी सच है कि बाहर वालों से मिलते समय लखनऊ वाले अपने शहर को लेकर एक सुपीरियॉरिटी कॉम्पलेक्स में घिरे रहते हैं. ऊपरी दिखावे में विश्वास रखते हैं और एक खास किस्म की आत्म-मुग्धता और विशिष्टता बोध के मारे भी होते हैं, जिस वजह से लखनवी तहज़ीब पर अक्सर ही सीमित वर्ग की सामंती, अभिजात्य, प्रतिगामी और जनविरोधी सभ्यता होने का आरोप भी लगता है, क्योंकि नफासत की आड़ में वह सहज-सरल अवधी लोक संस्कृति से मुंह फेरकर खड़ी हो जाती है. इसी वजह से अवध के कई चेतनाशील लोगों ने ही लखनवी तहज़ीब को कटघरे में खड़ा किया है. जिसके संकेत हमें रमई काका, कुंवर नारायन और रफीक शादानी तक की कविताओं में खूब मिल जाएंगें. दूसरों की ऐबजोई और मज़ाक उड़ाने और नीचा समझने में उन्हें खास लुत्फ मिलता है. मीर-तकी-मीर भी लखनऊ वालों के इस हमले से बच नहीं पाए थे, यही वजह है कि लखनऊ में लंबा वक्त गुज़ारने के बाद भी उन्हें लखनऊ कभी पसंद नहीं आया. एक बड़े शायर यगाना चंगेज़ी को  भी अदब-नवाज़ कहे जाने वाले लखनऊ  ने जिस तरह ज़लील किया वो लखनऊ के लिए कभी न मिटाया जा सकने वाला कलंक है. बात सिर्फ ये थी कि यगाना की शाइरी लखनऊ वालों को पसंद नहीं आती थी. मजाज़ लखनवी ने भी एक सर्द रात यहीं के एक शराबखाने की छत पर दम तोड़ दिया, लेकिन उनको बचाने के लिए कोई नहीं था. अभी कुछ वक्त पहले इस अहद के कबीर कहे जाने वाले शायर अदम गोंडवी लखनऊ में मदद की बाट जोहते हुए दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन एक और मरते हुए के लिए भी ये शहर अपनी धीमी चाल को तेज़ नहीं कर सका.

आप किसी भी लखनवी से इन कमियों का ज़िक्र कीजिए वह सर झुकाकर अपनी शर्मिंदगी का इज़हार करेगा, लेकिन साथ ही साथ लखनवी अंदाज़ में ये कहकर आपको लाजवाब भी कर देगा कि आप सेर भर बेर लेते हैं तो पाव भर गुठलियां भी आती हैं न?

2 COMMENTS

  1. आप पाव भर बेर लेते हैं तो पाव भर गुठलियां भी तो आती हैं न, खूब ढाला है दास्ताने-लखनऊ भाई. अलहदा मिजाज परोसा है शहर का, गोया कि आपकी मोहब्बत का इकरारनामा लजीज अल्फाजों के सहारे जेहन की तह तक पसर गया. मजा आ गया भई, आपका ये इश्क परवान चढ़े और हिमांशु बाचपेयी लखनवी बने रहें.

  2. Wah Lucknow Kiya bat He आप सेर भर बेर लेते हैं तो पाव भर गुठलियां भी आती हैं न?

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