अबकी बार, जनता का अधिकार

सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे अपनी बातचीत में उन आशंकाओं को एक साथ जोड़ते हैं जिसकी वजह से यह साझा मंच बना और यह प्रदर्शन हुआ. वो कहते हैं, ‘केंद्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार है. यह सरकार सत्ता में आई तो अच्छे दिनों के वायदे के साथ है लेकिन आते ही इसने अपने असल इरादे साफ कर दिए. नरेगा में बदलाव करने के प्रस्ताव दिए जाने लगे हैं. इस योजना को देश के कुछ जिलों तक सीमित कर देने का प्रस्ताव है. सूचना के अधिकार को लोगों के लिए और मुश्किल बनाने के बारे में विचार हो रहा है. लोगों की जमीन का अधिग्रहण आसानी से कैसे हो इसके लिए उपाये खोजे जा रहे हैं. असल में यह सरकार एक तरफ से कई हर जन कल्याण योजना को बंद या कमजोर करना चाह रही है. तो ऐसे में जन संगठनों की जिम्मेदारी बनती है कि वो एक जगह आएं. सरकार को चेतावनी दें कि वो जो-जो करना चाह रही है वैसा होने नहीं दिया जाएगा और यह प्रदर्शन इसी दिशा में पहली कोशिश है.’

हालांकि यह मंच अभी अपनी शुरुआती अवस्था में है और इसका कोई एक नाम भी अभी तय नहीं हुआ है. लेकिन निखिल डे की बातों से यह आभास मिलता है कि मजबूत सरकार और कमजोर विपक्ष की स्थिति में यह मंच भविष्य में एक नियंत्रक की भूमिका अख्तियार कर सकता है. मोर्चे के ढांचागत विकास की प्रक्रिया जारी है. विभिन्न संगठनों के प्रमुखों के मुताबिक  अगर सरकार मनमाने तरीके से काम करती रही तो उनके संगठन इस साझे मंच से सरकार के खिलाफ देश भर में इसी तर्ज पर धरना-प्रदर्शन करते रहेंगे.

चूंकि मंच अभी भी गठन की प्रक्रिया में है इसलिए स्पष्ट तौर पर इनकी मांगों की कोई सूची सामने नहीं आई लेकिन बातचीत में जो चिंताएं उभर रहीं है उनके मुताबिक नरेगा से लेकर भूमि अधिग्रहण और श्रम कानूनों पर सरकार की तिरछी नजर से इन संगठनों के भीतर एक किस्म की आशंका व्याप्त है जो आगे चलकर इनकी मांगों में परिवर्तित हो सकती है. बहुत कुछ आगे केंद्र सरकार के रुख पर भी निर्भर करेगा. एक विशेषता यह भी थी कि प्रदर्शन में शामिल लोग अलग-अलग राज्य से आए थे और उनकी अपनी-अपनी समस्याएं हैं. एक मुददे पर सभी संगठनों की एक राय थी कि केंद्र की सरकार का मौजूदा रुख निजी कंपनियों के हित में जाता दिख रहा है. सरकार एक-एक कर जन कल्याण की सभी योजनाओं को या तो बंद करना चाहती है या उसे कमजोर करना चाह रही है.

यहां इकट्ठा हुए लोगों की भारी संख्या इस बात की उम्मीद जगाती हैं कि केंद्र सरकार के लिए इन्हें अनदेखा करके फैसले लेना आसान नहीं होगा लेकिन ऐसे साझे मंच और प्रयास को लेकर एक ऐसी चिन्ता भी है जिसका निवारण उनलोगों को करना है जो इसका नेतृत्व कर रहे हैं. चिन्ता यह है कि क्या इतने सारे जनसंगठन लंबे समय तक एक मंच पर और एक साथ रह पाएंगे? इस बात की पूरी संभावना है कि आपसी मतभेद की वजह से फिलहाल आपस में मंच साझा कर रहे जनसेवी और सामाजिक कार्यकर्ता बाद में अलग-अलग राह चले जाएं.

इस चिंता को जब बिहार से आए वरिष्ठ अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता आशीष रंजन के सामने रखा गया तो उन्होंने इसे खारिज कर दिया. आशीष उन लोगों में से एक हैं जिनके प्रयास से करीब 30 जनवादी संगठनों का यह मंच अस्तित्व में आ सका है. वो कहते हैं, ‘देखिए, अभी-अभी तो सब लोगों के प्रयास से एक साझे मंच का निर्माण हुआ है. अभी तो इस मंच का कोई नाम भी नहीं रखा जा सका है. सो अभी से इस बारे में कुछ कहना या अंदाजा लगाना सही नहीं होगा.’ वो आगे कहते हैं, ‘यह मंच लोगों का है. यहां कोई नेता नहीं है. किसी का अपना कोई हित नहीं है. सारे लोग अलग-अलग मुद्दों की लड़ाई लड़ रहे हैं सो इस वजह से ऐसा होना तो नहीं चाहिए. अगर ऐसा होता है तो जनता नेतृत्व करने वालों से हिसाब मांगेगी. लोग इतनी दूर फिर कभी नहीं आएंगे. जंतर-मंतर आने के लिए न तो चन्दा देंगे और न ही झोली फैलाकर चन्दा जुटाएंगे.’

नर्मादा बचाओ आंदोलन से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर इस साझे मंच को मौजूदा समय की सबसे बड़ी जरुरत बताती हैं. उनके शब्दों में, ‘यह सरकार बनी तो है देश की बहुसंख्य गरीब जनता के वोट से लेकिन काम कर रही है प्राईवेट कंपनियों के लिए. मेक इन इंडिया के लिए ये लोग देश के बचे खुचे श्रम कानून को खत्म कर देंगे. सरकार एक मिनट में, अदानी को कई करोड़ का कर्ज दे देती है लेकिन आमलोगों का बैंक अकाउंट खुलवाने का ढोल पीटती है. सामने कंपनी की सरकार है अगर ऐसे में हम सब एक साथ नहीं आएंगे तो टिक नहीं पाएंगे.’ इस प्रदर्शन में जन संगठनों ने जो हुंकार भरी है वो केंद्र सरकार की नीतिओं पर कितना असर डालेगी और यह साझा मंच कब तक एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार के सामने टिका रहेगा इसका जवाब जल्द ही मिलने लगेगा. फिर भी इतना साफ है कि सरकार के लिए उस आवाज को, जो गांव की पगडंडी से चलकर देश की संसद के पास तक पहुंची है, अनसुना कर पाना मुश्किल होगा.

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