‘आप’सी खींचतान

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7 मार्च : आप की नेता अंजली दामनिया ने प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और मयंक गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. अंजली ने अपने बयान में मयंक गांधी पर ब्लॉग के माध्यम से बैठक की बातें सार्वजनिक करने के लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की. अंजली ने प्रशांत भूषण पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने पार्टी को दिल्ली चुनाव में हराने के लिए काम किया.

10 मार्च : पीएसी से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के हटाये जाने के बाद चौतरफा आलोचना झेल रही आम आदमी पार्टी ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर एक पत्र जारी कर आधिकारिक रूप से योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण पर पार्टी विरोधी गतिविधि में शामिल होने का आरोप लगाया और पीएसी से उनके निष्काषन को सही बताया.

11 मार्च :  पार्टी द्वारा सार्वजनिक आरोप लगाने के बाद प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव ने संयुक्त रूप से एक पत्र लिखा. इस पत्र के माध्यम से दोनों नेताओं ने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों को निराधार बताया. दोनों नेताओं ने मांग की है कि उन पर लगाए जा रहे आरोपों की जांच पार्टी के लोकपाल से करवाई जाए.

11 मार्च : आम आदमी पार्टी पार्टी के पूर्व विधायक राजेश गर्ग और अरविंद केजरीवाल के बीच बातचीत का एक टेप सार्वजनिक हुआ है. इसमें केजरीवाल दोबारा से आप की सरकार बनाने के लिए कांग्रेसी विधायकों को तोड़ने की साजिश कर रहे हैं.

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पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नहीं?

यह सवाल पार्टी में कई मौकों पर, कई अलग-अलग सदस्यों के द्वारा उठाया जा चुका है. आप के पूर्व विधायक विनोद कुमार बिन्नी, शाजिया इल्मी और भारत में कम कीमत पर हवाई यातायात मुहैया करवानेवाले बड़े उद्योगपति कैप्टन जीआर गोपीनाथ तक कई नेताओं ने यह शिकायत की है. सबने पार्टी छोड़ने या पार्टी से निकाले जाने की बड़ी वजह इसी आंतरिक लोकतंत्र के अभाव को बताया था. हालांकि यह बात ध्यान देने वाली है कि पार्टी से निकाले जाने के बाद विनोद कुमार बिन्नी और पार्टी छोड़ने के बाद शाजिया इल्मी भाजपा में शामिल हो गए. शाजिया इल्मी उन नेताओं में थीं जो एक समय में अरविंद के खास माने जाते थे. पार्टी के लिए एक विधानसभा और एक लोकसभा चुनाव लड़ चुकीं शाजिया ने जब लोकसभा चुनावों के बाद मई 2014 में पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दिया तो पत्रकारों से बात करते हुए अरविंद केजरीवाल पर पार्टी के भीतर लोकतंत्र बहाल न करने का आरोप लगाया. अलग-अलग समय पर पार्टी से बाहर जानेवाले कई लोगों के आरोप भी कमोबेश वैसे ही थे जैसे आज योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण लगा रहे हैं.

यह बात भी दिल्चस्प है कि जब पार्टी से बाहर जाने वाले लोग आंतरिक लोकतंत्र के अभाव की बात कर रहे थे तब ये दोनों नेता लगभग चुप थे. अगर आज पार्टी में लोकतंत्र नहीं होने की बात कही जा रही है तो इसके लिए अरविंद केजरीवाल के साथ-साथ योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की भूमिका भी कहीं न कहीं बनती है. इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश लिखते हैं, ‘इसके लिए सिर्फ केजरीवाल या उनके खास गुट को जिम्मेवार ठहराना पूरी तरह सही नहीं होगा. इसके लिए वे भी जिम्मेवार हैं, जिन्हें हाईकमान ने पीएसी से बाहर का रास्ता दिखाया. महज दो साल पहले गठित पार्टी में इतना ताकतवर हाईकमान एक व्यक्ति के कारण पैदा नहीं हो सकता. प्रशांत हों या योगेंद्र, सबने केजरीवाल के इर्द-गिर्द खास तरह का राजनीतिक आभामंडल बुने जाने की प्रक्रिया में अपना-अपना अवदान दिया.’

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‘छह विधायक कांग्रेस से अलग होकर हमें समर्थन कर दें’

11 मार्च को एक ऑडियो टेप सामने आया है. इसमें रोहिणी से पार्टी के पूर्व विधायक राजेश गर्ग अरविंद केजरीवाल के साथ बातचीत कर रहे हैं. बातचीत में अरविंद केजरीवाल विधानसभा चुनावों से पहले जोड़तोड़ करके, कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की बात कर रहे हैं ताकि चुनाव लड़े बिना एक बार फिर से दिल्ली में सरकार बना सकें. इस ऑडियो से नाराज होकर वरिष्ठ नेता अंजली दामनिया ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया, लेकिन बाद में इस्तीफा वापस ले लिया.

टेप लीक होने में अपनी भूमिका से इनकार करते हुए राजेश गर्ग ने यह गंभीर आरोप लगाकर सनसनी फैला दी कि केजरीवाल तथा उनके दो विश्वस्त सहयोगी- मनीष सिसोदिया और संजय सिंह दिल्ली में सरकार बनाने के लिए जरूरी विधायकों का समर्थन जुटाने के लिए कांग्रेस विधायकों को तोड़ने की कोशिश में थे.

उन्होंने अपने आरोप के समर्थन में एक संपादित ऑडियो क्लिप भी जारी की. उन्होंने दावा किया कि ऑडियो क्लिप में जो आवाज है वह केजरीवाल की है. उनका कहना था कि इससे आप नेतृत्व की सच्चाई और पारदर्शिता के दावों की कलई खुल जाती है. गौरतलब है कि आप के ही पूर्व विधायक द्वारा जारी इस ऑडियो टेप में अरविंद केजरीवाल अपने विधायक से कह रहे हैं कि कांग्रेस तो समर्थन देगी नहीं तो इस बात के लिए कोशिश करो कि कांंग्रेस के छह विधायक एक अलग गुट बनाकर हमारा समर्थन कर दें. इसके बाद कांग्रेस के पूर्व विधायक आसिफ मुहम्मद ने दावा किया है कि उसके पास एक ऐसा वीडियो है जिसमें पार्टी नेता संजय सिंह सरकार बनवाने के बदले उन्हें मंत्री पद का लालच दे रहे हैं.

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पार्टी में अरविंद केजरीवाल के बढ़ते कद और फिर इसी वजह से उपजी समस्या के बारे में एनडीटीवी के वरिष्ठ प्रबंध संपादक ऑनिंद्यो चक्रवर्ती का मानना है कि चुनाव के वक्त पार्टी की बजाय किसी एक नेता को चेहरा बनाने का यह खतरा रहता ही है कि वो व्यक्ति पार्टी के भीतर भी ताकतवर हो जाए. अपने लेख में चक्रवर्ती लिखते हैं, ‘आम आदमी पार्टी व्यक्ति पूजा की इस राजनीति की सबसे नई और शायद और सबसे ज्यादा लाभ हासिल करनेवाली पार्टी रही है. सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों का आंदोलन होने के बावजूद हाल के चुनावों में इसने खुद को एक नेता के सहारे बेचा. इसका नारा ‘पांच साल केजरीवाल’ और ‘मांगे दिल्ली दिल से, केजरीवाल फिर से’ जैसे आकर्षक कारोबारी जिंगल एक आम नायक के तौर पर केजरीवाल की सुनियोजित छवि निर्माण में महत्वपूर्ण रहे.’

चक्रवर्ती अपने लेख में आगे लिखते हैं, ‘आज जिन योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने ‘आप’ के भीतर बढ़ती केजरीवाल भक्ति को मुद्दा बनाया है, वे तब इस चुनावी रणनीति का हिस्सा थे. दरअसल, तब जब मैंने प्रशांत भूषण से पूछा कि क्या पार्टी की जगह केजरीवाल को पेश करना सही था तो उन्होंने माना कि यह चीज केवल चुनाव प्रचार के दौरान होनी चाहिए थी. मुझे प्रशांत भूषण का यह भरोसा कुछ यूटोपियाई लगा कि जब चुनावों के बाद चीजें सामान्य हो जाएंगी, तब व्यक्ति पूजा की जगह आंतरिक लोकतंत्र बहाल हो जाएगा. राजनीति में व्यक्ति पूजा का ऐसा कोई जादुई बटन नहीं होता, जिसे आप चुनाव जीतने के लिए ऑन कर दें और चुनाव बीतने के बाद जब अपनी बात चलाना चाहें तब ऑफ कर दें.’

इस सब से इतर पार्टी के कुछ नेताओं की मानें तो पार्टी में हाई कमान कल्चर कभी था ही नहीं. मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, आशुतोष और आशीष खेतान सहित कई नेता बार-बार यह दोहराते रहे हैं कि पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र शुरू से आज तक है. इस बारे में आम आदमी पार्टी का सोशल मीडिया देखने वाले अंकित लाल कहते हैं, ‘अगर पार्टी में लोकतंत्र नहीं होता तो आज इस मुद्दे पर देश के हर कोने से कार्यकर्ता नहीं बोल रहे होते. पार्टी के भीतर भी कई बार हम आपस में बुरी तरह से लड़े हैं. मैं खुद कई बार अरविंद के साथ कई मुद्दों पर एक मत नहीं हो पाया और हम घंटों एक-दूसरे से बहस करते रहे.’ अंकित आगे कहते हैं, ‘योगेंद्र और प्रशांत भूषण के बारे में भी जो फैसला हुआ है वो पार्टी ने लिया है. पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का पालन किया गया है.’ पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रो. आनंद कुमार भी यह मानते हैं कि इस प्रकरण की वजह से आम आदमी पार्टी को पूरी तरह से अलोकतांत्रिक बता देना ठीक नहीं है. वो कहते हैं, ‘आज की तारीख में जितनी भी पार्टियां हैं उसमें किसी की हिम्मत नहीं है कि कोई भी व्यक्ति पार्टी के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर एक सवाल उठा दे. ऐसा करने पर तुरंत सवाल उठाने वाले व्यक्ति को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है.’

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