‘उस रात मुझे अन्याय के प्रतिरोध की सीख मिली’

इसंपेक्टर पुलिसिया अंदाज में बोला, ‘अरे तू है कौन जो इस ड्राइवर का वकील बनकर मुझे सिखा रहा है. हमें क्या करना है और क्या नहीं यह अब तुझसे पूछना पड़ेगा.’ बंशीलाल ने जवाब दिया, ‘मैं केवल एक पैसेंजर हूं. इस गाड़ी में केवल हम दो लोग बैठे थे.’ इंस्पेक्टर फिर गुर्राया,  ‘अच्छा तुम केवल दो पैसेंजर थे.’ इसके बाद वह एक पुलिसवाले से बोला, ‘इनको ले चल थाने, गाड़ी होगी सीज और इन तीनों को वहीं बैठा, इनको नेतागिरी का शौक लगा है.’

मुझे काटो तो खून नहीं, ड्राइवर अलग परेशान. लेकिन बंशीलाल अविचल थे. वे बोले, ‘पहले तो तमीज से बात करो, फिर चलो जहां चलना है, लेकिन थाने जाने से पहले मैं आपके एसपी से जरूर बात करना चाहूंगा.’ यह कहने के साथ ही वे पेट्रोल पम्प कार्यालय के अंदर गए और वहां रखा फोन घुमाने लगे.

इंस्पेक्टर पल भर में ही जमीन पर आ गया. वह मुझसे बोला, ‘इन भाई साहब को समझाइए. इतना गुस्सा ठीक नहीं.’ फिर ड्राइवर से बोला, ‘ला इधर कागज.’ ड्राइवर ने वह चालान इंस्पेक्टर को पकड़ाया और इंस्पेक्टर ने उसके कई टुकड़े कर हवा में उछालते हुए ड्राइवर की तरफ देखते हुए कहा, ‘ले खुश! जा तू भी मजे कर.’

मैं पेट्रोल पम्प कार्यालय में गया तो देखा बार-बार नंबर डायल कर रहे बंशीलाल लाइन व्यस्त होने के कारण बुरी तरह झुंझला रहेे हैं. मैं लगभग धकियाते हुए उन्हें बाहर लाया. उनके चेहरे पर गुस्से, झुंझलाहट और प्रतिरोध के वही भाव पूर्ववत तैर रहे थे.

रात लगभग 10 बजे मैं अपने कमरे पर पहुंचा. लेकिन एक नई सीख के साथ कि अन्याय चाहे खुद के साथ हुआ हो या किसी और के साथ, उसका प्रतिरोध अत्यंत दृढ़ता के साथ किया जाना चाहिए.

लेखक सेवानिवृत्त जिला समाज कल्याण अधिकारी हैं और देहरादून में रहते हैं.

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