उपद्रव की उपकथा

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अधर्म का धर्म:  त्रिलोकपुरी में अगस्त के महीने में हुई विहिप की एक रैली
अधर्म का धर्म: त्रिलोकपुरी में अगस्त के महीने में हुई विहिप की एक रैली

पहली घटना इसी साल 17 अगस्त की है. इस दिन विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने कल्याणपुरी से एक रैली निकाली थी जो कि त्रिलोकपुरी के मदीना चौक पर आकर खत्म हुई थी. इस रैली के गवाह अधिकेशवन भी रहे हैं. वे बताते हैं, ‘ रैली में शामिल लोग चाकू, लाठी, हॉकी, तलवार और इन जैसे दूसरे हथियार लहराते हुए पैदल मार्च कर रहे थे. कल्याणपुरी से त्रिलोकपुरी की दूरी करीब दो किलोमीटर है. जब-जब यह रैली किसी मुस्लिम बहुल ब्लॉक से गुजरती तब-तब रैली में शामिल लड़के मुस्लिम विरोधी और पाकिस्तान विरोधी नारे लगाने लगते. बड़ी बुरी हालत थी. शाम के वक्त रैली मदीना चौक पहुंची. यहां लोगों ने भाषण दिए. मदीना चौक के आसपास बड़ी संख्या में मुस्लिम परिवार रहते हैं. मुझे तो उसी दिन लगा था कि आज ही कुछ गड़बड़ जो जाएगी, लेकिन तब कुछ नहीं हुआ.’  कहा जा रहा है विहिप की यह रैली वाल्मीकि नौजवानों को संगठन और हिन्दुत्व की विचारधारा से जोड़ने की कवायद थी लेकिन अब ऐसा लगता है कि इसका एक और छिपा हुआ मकसद था. इलाके के हिंदू और मुसलमानों के बीच दरार डालना. इस रैली के बाद से त्रिलोकपुरी में दोनों समुदायों के लोगों के बीच पहले जैसी सहजता घटने लगी थी.

त्रिलोकपुरी में जब दंगे का माहौल बना था तब वॉट्सएप पर भड़काऊ मैसेज भेजे जा रहे थे. पुलिस इन मैसेज की जांच कर रही है

दूसरी घटना अक्टूबर के मध्य की है. दिल्ली मेट्रो के लिए मेट्रो लाइन का काम त्रिलोकपुरी में चल रहा है. इस लाइन के बीच में त्रिलोकपुरी का ब्लॉक-15 है. यहां ज्यादातर मुस्लिम परिवार हैं. मेट्रो ने इस ब्लॉक को तोड़ने और यहां के निवासियों को त्रिलोकपुरी के ब्लॉक-16, 17 और 18 के सामने के एक खाली प्लॉट पर बसाने का फैसला लिया था. लेकिन ऐसा कहा जा रहा है कि अक्टूबर के मध्य में पूर्वी दिल्ली से भाजपा सांसद महेश गिरी और पूर्व विधायक सुनील वैद्य ने ब्लॉक-16,17 और ब्लॉक-18 में रहनेवाले हिंदू परिवारों के साथ एक बैठक करके उन्हें भरोसा दिलाया कि उनके ब्लॉक के सामने कोई मुस्लिम कॉलोनी बसने नहीं दी जाएगी. इन लोगों को यह कहकर भी उकसाया गया कि यहां केवल ब्लॉक-15 के मुस्लिम नहीं आएंगे बल्कि सीलमपुर आदि से भी मुसलमान लाकर यहां बसाए जाएंगे. अधिकेशवन इस मीटिंग और इस तरह की अपवाह फैलाए जाने की पुष्टि करते हैं. वहीं ब्लॉक-16 में रहनेवाले और वाल्मीकि दलित महापंचायत के अध्यक्ष महेश कुमार ऐसी किसी भी मीटिंग से इनकार करते हैं. महेश का कहना है, ‘हम किसी समुदाय के बसाए जाने के खिलाफ नहीं हैं. हम तो बस इतना चाहते हैं कि हमारे ब्लॉक के आगे जो ग्रीन बेल्ट (खुला क्षेत्र) है उसे सुरक्षित रहने दिया जाए.’ बकौल अधिकेशवन इन दोनों घटनाओं ने त्रिलोकपुरी में ऐसी जमीन तैयार की जिसपर खड़े होकर ही लोगों ने दीपावली के बाद एक-दूसरे पर पत्थर चलाए और दंगा भड़काने की कोशिश की.

1984 के बाद 2014 में एक बार फिर सांप्रदायिक हिंसा को झेल चुका त्रिलोकपुरी धीरे-धीरे सामान्य दिनचर्या की तरफ लौट रहा है. गलियों में बच्चे खेल रहे हैं. दुकानें धीरे-धीरे खुल रही हैं. सड़कों और चौराहों पर पुलिस की भारी मौजूदगी अभी-भी है. रात के समय चौकसी और बढ़ जाती है. पुलिस वाहनों के चक्कर अभी-भी जारी हैं और हिंसा के इतने दिनों बाद अफवाहें भी उसी गति से चल रही हैं. हर किसी के पास अपनी एक कहानी है. हर किसी के मोबाइल में एक वीडियो है. कोई पुलिस उत्पीड़न की कहानी लिए बैठा है तो कोई बता रहा है कि कल शाम फिर से फलां ब्लॉक में तनाव था. किसी के पास कोई तथ्य नहीं है.  बातचीत के दौरान एक समुदाय दूसरे को तो दूसरा पहले को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है. मूल में एक ही कहानी है लेकिन इसे दोनों समुदाय के लोग अपने-अपने नजिरए से सामने रखते हैं. एक बात जो साफ तौर पर दिखती है वह यह कि इस हिंसा के बाद पूरा इलाका दो खेमों में बंट चुका है.

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‘हम दोस्त ही रहे, हिंदू मुसलमान नहीं बन पाए’

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फोटोः विकास कुमार

साठ साल के बाबू खान अपने परिवार के साथ त्रिलोकपुरी के ब्लॉक- 27 में रहते हैं और उनसे नौ साल बड़े अमर सिंह अपने परिवार के साथ ब्लॉक-11 में रहते हैं. ये दोनों पिछले 40 साल से दोस्त हैं. इस दीपावली की शाम को भी अमर सिंह, मिठाई देने के लिए बाबू खान के घर आए थे. थोड़ी देर बैठे. वे अपनी बातों में मशगूल थे कि तभी इलाके में तनाव फैल गया. इस तनाव के बीच बाबू खान ही अमर सिंह को सुरक्षित उनके घर तक पहुंचा के आए थे. दोनों की दोस्ती कबूतर उड़ाने की है. पिछले 40 साल से दोनों साथ में शाम बिताते हैं और साथ में कबूतर उड़ाते हैं. पहले दोनों ने कबूतर पाले हुए थे, लेकिन समय की कमी की वजह से अमर सिंह ने कबूतर पालना छोड़ दिया और कबूतर उड़ाने के लिए हर शाम बाबू खान की छत पर आने लगे.

अमर सिंह बातचीत में बाबू खान को ‘बबुआ भाई’ बुलाते हैं. दोनों के बच्चे एक-दूसरे को चाचा-ताऊ बुलाते हैं. हर खुशी साथ में मनाते हैं. बाबू खान ईद पर अमर सिंह के यहां सेवई लेकर जाते हैं तो सिंह साहब अपने हर त्योहार पर खान साहब के घर मिठाई लेकर आते हैं. इन अलबेले दोस्तों से हमारी मुलाकात तब हुई जब दोनों साथ में बैठकर कबूतरों को दाना दे रहे थे. हर दिन की तरह आवाज लगाकर उन्हें उड़ा और बुला रहे थे. जब हमने इनसे हालिया तनाव के बारे में जानना चाहा तो दोनों ने एक स्वर में इसके लिए राजनीति और राजनीतिक पार्टियों को जिम्मेदार ठहराया. खान साहब बोले, ‘हम तो दिल्ली के निवासी हैं. साथ में हैं. दोनों दोस्त हैं.  पिछले चालीस साल से एक साथ हैं. हर खुशी. हर गम हमने साथ में जिया है. अभी तक तो कभी न ये हिंदू हुए और न हम मुस्लिम. पता नहीं बाकी लोग कैसे हो जाते हैं? हम दोनों का तो एक ही शौक है. कबूतर पालना और उन्हें यूं आसमान में गोल-गोल घूमते हुए देखना’ बगल में बैठे अमर सिंह अपने दोस्त की बात से सहमति जताते हुए कहते हैं, ‘समझ नहीं आ रहा कि क्या कहूं लेकिन जो हुआ सो बहुत गलत हुआ.’

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