प्रतिबंध लगाकर आप किसी चीज काे बदल नहीं सकते, इसलिए मैं स्वतंत्र प्रेस को तरजीह दूंगा…

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महोदया, एक पत्रकार के लिए क्या बताना है-क्या नहीं, इसका निर्णय लेना हमेशा ही कठिन होता है और इस पूरी प्रक्रिया में, कहीं न कहीं, किसी न किसी को नाराज या रुष्ट करने का खतरा हमेशा बना रहता है. सरकार के मामले में कुछ छिपाना और बाद में उसके जाहिर होने का डर, किसी व्यक्ति के मामले से बहुत अधिक होता है. पता नहीं क्या कारण हैं कि प्रशासन में काम करने वालों को लगता है कि सिर्फ वे ही ये जानते हैं कि जनता को कब, कैसे और क्या जानकारी दी जाए. और जब कोई ऐसी खबर जो वो नहीं बताना चाहते हैं, प्रकाशित हो जाती है तो वो नाराज हो जाते हैं.  ऐसे में जो बात नहीं समझी जाती वो ये कि ऐसे तरीके अपनाने से आधिकारिक तथ्यों के प्रति विश्वसनीयता कम होती है. यहां तक कि सरकार के ईमानदार दावों पर भी सवाल उठने लगते हैं. ऐसे लोकतंत्र में जहां विश्वास पर ही जनता का रवैया टिका हो, वहां सरकार को अपने किए या कहे किसी काम पर संदेह की गुंजाइश भी नहीं रहने देनी चाहिए. आपातकाल के बाद से आप लगातार ये बात कह रही हैं कि आपका विश्वास है कि एक मुक्त समाज में जनता को सूचित रखना, जानकारियां देना प्रेस की ही जिम्मेदारी होती है. कई बार ये एक अप्रिय काम होता है, फिर भी इसे करना होता है क्योंकि एक मुक्त समाज कि नींव मुक्त सूचनाओं पर ही टिकी होती है. यदि प्रेस सिर्फ सरकारी घोषणाएं व आधिकारिक बयान ही छापेगी (जो वो अब कर ही रही है) तो कोई चूक या कमी कौन दुरुस्त करेगा?

मैं कई बार 3 दिसंबर 1950 को, ऑल इंडिया न्यूजपेपर एडिटर्स कॉन्फ्रेंस में नेहरु की कही बात को पढ़ता हूं, ‘मुझे इस बात पर कोई शक नहीं हैं कि सरकार प्रेस के द्वारा ली जा रही स्वतंत्रता को पसंद नहीं करती, और इसे खतरनाक भी समझती है, पर प्रेस की आजादी में दखल देना गलत होगा. प्रतिबंध लगाकर आप किसी चीज को बदल नहीं सकते, आप बस उस बात की अभिव्यक्ति पर रोक लगा सकते हैं, उसके पीछे छिपे भाव और अंतर्निहित विचार को आगे बढ़ने से रोक सकते हैं. इसीलिए, मैं एक दबे या सुनियंत्रित प्रेस की तुलना में एक पूरी तरह से स्वतंत्र प्रेस को तरजीह दूंगा भले ही उसमें इस स्वतंत्रता के दुरुपयोग का खतरा ही क्यों न शामिल हो.’ जिस तरह की सेंसरशिप अभी लगाई गई है ये किसी भी नई पहल, सवालों-जवाबों के लिए खुले माहौल और खुली सोच का गला घोंट देगी. मुझे यकीन है कि आप ऐसा तो नहीं चाहेंगी.

कुलदीप नैयर

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