जिन्होंने पहले से ही विवादित संस्था को और भी विवादित बना दिया है

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ऐसे में इस रजिस्टर को यदि झूठा ही मान लिया जाए, जैसा कि सिन्हा ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा भी है, तब भी इतना तो साफ ही हो चुका है कि पिछले एक साल के दौरान वे किन-किन लोगों से मिल रहे थे. सवाल उठता है कि एक जांच अधिकारी का उन लोगों से मिलना जिनकी वह खुद जांच कर रहा हो, किस बात का संकेत देता है ?

सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटी (सीएसडीएस) के संपादक अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जब इन दोनों मामलों की निगरानी सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के हाथों में है, तब सीबीआई चीफ आरोपितों से क्यों मिले? इतनी अधिक बार हुई ये मुलाकातें अपने आप में कई तरह की आशंकाओं को जन्म देने के लिए पर्याप्त हैं. इन आशंकाओं को इस बात से और बल मिलता है कि ये मुलाकातें सिन्हा के घर पर हुई हैं. ऐसे में इन दोनों ही मामलों में जांच प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है.’ रणविजय सिंह कहते हैं, ‘पहले से ही विवादित अफसर रहनेवाले सिन्हा ने सीबीआई का मुखिया बनने के बाद अपनी विवादित फितरत में कई और आयाम जोड़ दिए हैं’

दिसंबर, 2012 में सीबीआई प्रमुख के रूप में नियुक्त होने से लेकर अब तक रंजीत सिन्हा के कार्यकाल का गंभीरता से अध्ययन किया जाए तो रणविजय सिंह द्वारा उनको लेकर कही गई बातों में दम नजर आता है.

बात इसी साल अप्रैल के आखिरी दिनों की है. 2जी मामले में आरोपी पूर्व दूर संचार मंत्री दयानिधि मारन और उनके भाई के खिलाफ सीबीआई, एयरसेल-मैक्सिस सौदे में हुई गड़बड़ियों की जांच कर रही थी. उनके खिलाफ आरोप पत्र तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी. इस बीच अचानक ही रंजीत सिन्हा ने मारन बंधुओं के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं होने की दलील देकर कहा कि सबूतों के अभाव में उनको आरोपी नहीं बनाया जाना चाहिए. इस मामले की जांच कर रहे अधिकारियों का तर्क था कि मारन भाइयों के खिलाफ उनके पास काफी मजबूत सबूत हैं और उनको आरोपी बनाया ही जाना चाहिए. जांच अधिकारियों तथा सीबीआई मुखिया के बीच पैदा हुए इस टकराव को देखते हुए इस मामले को अटॉर्नी जनरल के पास भेज दिया गया. तब तक देश में आम चुनावों का परिणाम सामने आ चुका था और एनडीए को बहुमत मिल गया. ऐसे में पूर्व अटॉर्नी जनरल ने इस पर कोई राय देने से इंकार कर दिया. इसके बाद नई सरकार ने इस मामले में जब अटॉर्नी जनरल की राय मांगी तो, नये अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सीबीआई के जांच अधिकारियों की बात को सही माना. इसके बाद सीबीआई ने इस मामले में हाल ही में आरोप पत्र दायर कर दिया है. इसमें मारन बंधुओं को आरोपी बनाया गया है.

चारा घोटाले के बाद लालू प्रसाद यादव के पक्ष में रिपोर्ट तैयार करने के आरोप में पटना हाई कोर्ट ने रंजीत सिन्हा को जांच से हटाने का आदेश दिया था

इसी तरह का एक और मामला लोकसभा चुनावों से पहले का भी है. तब चुनाव के ठीक पहले रंजीत सिन्हा चारा घोटाले से जुड़े तीन और मामलों में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आरोप समाप्त करवाना चाहते थे. उनका तर्क था कि इन तीनों मामलों में भी लालू के खिलाफ वही सब सबूत हैं जिनके चलते वे एक मामले में पहले ही पांच साल की सजा पा चुके हैं. तब भी सीबीआई के ही एक अधिकारी, (निदेशक अभियोजन) के अलावा सॉलिसिटर जनरल का विरोध उनके आड़े आ गया. बिहार में इस घोटाले की जांच के दौरान भी वे लालू यादव की मदद के आरोपों में घिर गए थे. डेढ़ दशक पहले इस घोटाले की जांच के दौरान वे पटना में सीबीआई के डीआईजी थे. लालू के पक्ष में रिपोर्ट तैयार करने के आरोप में तब पटना हाईकोर्ट ने सिन्हा को जांच से हटाने का आदेश दे दिया था.

रंजीत सिन्हा के कार्यकाल में उठनेवाले विवादों की यह कथा पिछले साल अप्रैल में हुए कोयला घोटाले की स्थिति रिपोर्ट के लीक होने का जिक्र किए बगैर अधूरी ही कही जाएगी. यही वह मामला है जब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को ‘पिंजरे में बंद तोता’ कहा था. तब सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई कोयला आवंटन घोटाले की जांच कर रही थी. इसी दौरान कोर्ट ने सीबीआई से इस मामले की स्टेटस रिपोर्ट जमा करने को कहा. कायदे के मुताबिक सीबीआई को यह रिपोर्ट सीधे सुप्रीम कोर्ट को दिखानी चाहिए थी, लेकिन उसने इस रिपोर्ट को पहले कानून मंत्री अश्विनी कुमार के साथ ही कोयला मंत्रालय के अधिकारियों को भी दिखा दिया. यह बात खुद रंजीत सिन्हा ने अदालत में स्वीकार की, साथ ही यह भी माना कि सरकार के निर्देश पर इनमें बदलाव भी किए गए. रंजीत सिन्हा का यह कदम हर लिहाज से गलत था. उस वक्त प्रशांत भूषण का कहना था कि, ‘हवाला मामले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को साफ तौर पर कहा था कि अदालत की निगरानी में होने वाले मामलों की जांच के संबंध में उसे सिर्फ और सिर्फ अदालत के प्रति ही जवाबदेह होनी चाहिए.’ इसके अलावा सीबीआई के पूर्व निदेशक त्रिनाथ मिश्रा ने भी तब सीबीआई द्वारा स्टेटस रिपोर्ट सरकार को दिखाए जाने को गलत बताया था. सीबीआई की इस हरकत को सुप्रीम कोर्ट ने अपने भरोसे के साथ खिलवाड़ बताया था. और उसे जम कर लताड़ लगाई थी.

इनके अलावा और भी कई विवाद ऐसे ढूंढे जा सकते हैं जिनका कालखंड भी रंजीत सिन्हा का अब तक का कार्यकाल ही रहा है. फिलहाल वापस उसी मूल कथा पर आते हैं.

इस मूल कथा को लेकर केंद्र सरकार के रुख की बात की जाए तो माना जा रहा है कि इस मामले में उसकी निगाहें भी न्यायपालिका की तरफ ही जमी हैं. छह सितंबर को प्रशांत भूषण ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिख कर इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए सिन्हा को हटाने की मांग की थी. अभय कुमार दुबे कहते हैं, ‘बेशक मामला कोर्ट के संज्ञान में है और बहुत संभव है कि कोर्ट इस पर फैसला भी करेगा लेकिन बेहतर होता कि सरकार अपने स्तर पर कम से कम ऐसा कोई संकेत तो देती जिससे आम जनता को लगता कि पिछली सरकार के मुकाबले यह सरकार भ्रष्टाचार को मिटाने को लेकर ज्यादा गंभीर है. सरकार के पास गठबंधन जैसी मजबूरी भी नहीं है, और कार्रवाई करने का पर्याप्त आधार भी है.’

बहरहाल, सरकार अथवा सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से इतर बात की जाए तो सबसे सरल और सबसे अहम सवाल अब भी वही है कि, 1974 बैच के इस आईपीएस अधिकारी ने एक बेहद गरिमामयी पद पर रहते हुए 2जी स्पैक्ट्रम, और कोयला घोटाले के आरोपितों के साथ बीसियों बार अपने घर पर मुलाकात करके क्या सीबीआई की निष्पक्षता को लेकर आम जनता के मन में पहले से ही गहरी बैठी हुई शंकाओं को यकीन की तरफ ले जाने का काम नहीं किया है? दिल्ली में पिछले सात-आठ साल से ऑटो चला रहे सिन्हा के ही गृहराज्य के एक मेहनतकश युवा दिनेश कहते हैं, ‘सब जानते हैं कि बड़ा अधिकारी लोगों से अपने घर पर मिलने को किस लिए कहता है.’

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