31 अक्तूबर 1984 का वह दिन!

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देखने में 31 अक्तूबर 1984 का दिन आम दिनों की तरह था। लोग काम-धंधों पर निकल रहे थे। उनमें से बहुत से ऐसे थे जो काम तो गए पर कभी घर लौट कर नहीं आए। कुछ लोग और सैनिक अपनी छुट्टियां बिताने दूर दराज की रेलगाडिय़ों पर चढ़े पर कभी घर नहीं पहुंचे। इस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके सिख अंगरक्षकों ने कर दी थी। सुबह हुई इस वारदात के बाद दोपहर तक लोगों में ऊहापोह की स्थिति रही। दोपहर को जब राजीव गांधी देश लौटे तो हालात बिगडऩे लगे। देश की राजधानी दिल्ली समेत कई शहरों मेें सिखों की मारकाट शुरू हो गई। सबसे ज्य़ादा नुकसान दिल्ली और कानपुर में हुआ। गुंडों-बदमाशों की भीड़ ने सिखों के घरों को आग लगा दी परिवार के मर्दों को सड़कों पर जिंदा जलाया और महिलाओं की अस्मत लूटी। दिल्ली की पुलिस केवल तमाशबीन ही नहीं बनी रही बल्कि वह दंगाइयों की मदद करती नज़र आई। कुछ सिख परिवार जिनके पास हथियार थे और वे अपनी रक्षा कर रहे थे, पुलिस ने उनसे हथियार लेकर उन्हें भीड़ के हवाले कर दिया। सिखों के लिए अपनी जान-माल को बचाना लगभग असंभव था।

दिल्ली के तिलकनगर इलाके में काफी सिख परिवार थे। उनके पास हथियार थे। पुलिस के लाख धमकाने पर भी उन्होंने अपने हथियार नहीं दिए। नतीजा यह हुआ कि कोई भी दंगई वहां पहुंच ही नहीं पाया। वे सुरक्षित रहे। गुरूद्वारों में शरण लेने वाले सिख भी बच गए। उनका सभी कुछ लुटा गया पर जान बच गई। रेलगाडिय़ों मेें सफर कर रहे सैंकड़ों सिख यात्रियों को दंगाईयों ने मार दिया। कई फौजी जो छुट्टी काट कर लौट रहे थे या छुट्टी जा रहे थे वे भी भीड़ कर शिकार बने।

ये हालात और भी खराब हो गए होते अगर हिंदू परिवारों और पड़ोसियों ने सिखों को न बचाया होता। उस तनाव के समय में भी आम लोगों में सांप्रदायिक सौहार्द नज़र आया। लोग दंगाईयों से डरे तो थे पर फिर भी चोरी छुपे सिखों की मदद कर रहे थे। दिल्ली के नेहरू विहार में रहने वाले दर्शन सिंह बताते हैं कि उनके परिवार को पड़ोसियों ने तीन दिन तक अपने छोटे से घर में बंद रखा। उनके बेटे के बाल काट दिए और फिर बड़ी मुश्किल से वे सुरक्षित गुरूद्वारा बंगलासाहिब पहुंचे। इस प्रकार की कई और भी घटनाएं हैं।

आज इस घटना को 34 साल हो गए हैं। दिल्ली का जीवन अपनी रफ्तार पकड़ चुका है पर जो लोग उस समय दिल्ली और दूसरे शहरों से उजड़ कर पंजाब आ गए थे वे आज भी जीवन को पटरी पर नहीं ला पाए हैं। उनमें से इक्का दुक्का लोगों को छोड़ कर कोई वापिस लौटा नहीं है। उनमें बहुत से ऐसे भी हैं जिन्होंने 1947 का बंटवारा देखा है। उस समय हुए दंगों को देखा और भोगा है। दंगों के दौरान दिल्ली में सबसे ज्य़ादा मारकाट  यमुना पार त्रिलोकपुरी में हुई। वहीं से उजड़ कर अब पंजाब में मोहाली मेें रह रही नरिंदर कौर पप्पी के लिए आज भी वे यादें ताज़ा हैं।

उसका पति सर्वजीत सिंह एक प्रैस में कार चालक था। जब दंगे शुरू हुए उस समय वह अपनी ड्यूटी पर था। वह तीन दिन से लगातार काम पर था इसलिए अपने घर नहीं गया था। उसे पता भी नहीं चला कि क्या हो गया है। उसे दंगे होने का गुमान तक नहीं हुआ। जब शाम को वह अपने कार्यस्थल से बाहर निकला तो रास्ते में कुछ खास नहीं था। पर आगे आने पर उसे कुछ लोग मिले तो उन्होंने बताया कि इंदिरा गांधी के सिख अंगरक्षकों ने उन्हें गोली मार दी है और अब लोग सिखों को मार रहे हैं आप भी ध्यान से घर जाना। उसके बाद सर्वजीत ने घर की बजाए गुरूद्वारे का रु ख कर लिया। रास्ते में कुछ दंगाइयों ने उस पर लोहे की सलाख से हमला किया। उसके सिर पर चोट आई पर पगड़ी के कारण जख्म गहरा नहीं था। इस कारण वह भाग कर अपनी जान बचाने में सफल रहा। उसकी किस्मत अच्छी  थी कि आगे उसे कुछ ऐसे लोग मिल गए जो थाने जा रहे थे। वह भी उनके साथ हो लिया। थाने वालों ने उसे ट्रक में बिठा कर गाज़ीपुर भेज दिया। वहां से वह पैदल शकरपुर पहुंचा। उस समय त्रिलोकपुरी में सबसे ज्य़ादा दंगे हो रहे थे। वहीं उसका घर था।  बड़ी मुश्किल से वह अपने घर पहुंचा। उसके पीछे काफी लोग लग गए थे। वहां से वह अपने सुसराल चला गया। उसका ससुराल हिंदू परिवार था। ससुराल वालों ने उसे एक पेटी में बंद रखा। बाद में भारी मात्रा में पुलिस, सेना के जवानों, नागरिक एकता पार्टी के सदस्यों और प्रैस के लोगों के आने पर वह बाहर निकला और उसे एक शिविर में पहुंचा दिया गया। जब यह घटना हुई उस समय सर्वजीत की पत्नी आठ महीने की गर्भवती थी।

सर्वजीत अब मोहाली में है वह बताता है कि जब वह छुपते-छुपाते घर जा रहा था तो उसने रास्तें में दंगाइयों को सिखों के घरों में आग लगाते और उनकी हत्या करते देखा। सिखों के घरों में दरवाजों को खुलवा कर या तोड़ कर उन पर एक खास प्रकार का पाऊडर डालते थे जो एकदम आग पकड़ लेता। दंगाइयों के पास अजीब तरह की तलवारें-बरछे थे जैसे उसनेपहले कभी नहीं देखे थे। बाद में हरचंद सिंह लौंगोवाल और सुरजीत सिंह बरनाला त्रिलोकपुरी आए और उनकी मदद से वहां से उजड़े परिवारों को पंजाब लाने का रास्ता साफ हो गया।

नरिंदर कौर पप्पी ने बताया कि बाहर से

विस्थापित हो कर लौटे सिख परिवारों के लिए सबसे पहला शिविर आनंदपुर साहिब में लगाया गया था। कुछ लोगों को मोहाली के फेज़-11 में भी रखा गया। उस समय की पंजाब सरकार ने कहा था कि सभी विस्थापितों को घर, नौकरी और कारोबार करने के लिए बूथ भी ‘अलॉटÓ किए जाएंगे। उस समय हम संत गुरूगोबिंद सिंह भवन मेें रहे। इसके बाद हमें कपड़े वगैरा की सहायता तो मिली लेकिन हमारी ज़रूरत के अनुसार वह बहुत कम था। देखा जाए तो सरकार की तरफ से व्यवहारिक रूप से कोई मदद नहीं आई न ही कोई नेता हमारी मदद को आया। वे हमारे सिर पर केवल राजनीति ही खेलते रहे।

मनमोहन सिंह की कांग्रेस सरकार आने के बाद हमें दो लाख रु पए की मदद मिली। बादल सरकार ने वह पैसा भी हमसे यह कह कर ले लिया कि आपको मकान दिए गए हैं। एक मकान की कीमत 33,000/- रु पए थी फिर उस पर ब्याज लगा दिया और हमसे लगभग डेढ लाख रु पए तक ले लिए गए। हमें नोटिस आ रहे थे कि जल्दी पैसे भरो नहीं तो घर से निकाल देंगे। असल में जिनकी कुछ जान पहचान सरकारी अफसरों या नेताओं के साथ थी उन्हें कुछ लाभ मिल गया। उनके ‘रेड कार्डÓ भी बन गए। कई तो दो-दो कार्ड भी बना ले गए। नौकरी भी उन्हीं को मिली जिनकी सिफारिश थी या जो पंजाब के नेताओं और अफसरों के जानकार थे। जो लाभ हमें मिलने थे वे सभी कुछ खास लोगों को दे दिए गए। हमारे मकान की किश्त 184 रु पए महीना तय की गई थी जबकि मेरे पति की आय 450 रुपए प्रति माह थी। उसे शिवालिक पब्लिक स्कूल में नौकरी मिली गई। लगभग ऐसी ही कहानी मनमोहन सिंह, कुलबीर सिंह, प्रभजीत सिंह, सुखबीर कौर, मोहिंदर सिंह, भूपेंद्र सिंह और बलबंत सिंह की है। ये सभी परिवार  आजकल मोहाली में रह रहे हैं।

दिल्ली के रहने वाले तेजा सिंह और उसका परिवार भी इस हादसे से गुजर चुका है। तेजा सिंह का परिवार दिल्ली के तिलक नगर में रहता था। उनके तीन बेटे और एक बेटी थी। उनके घर के पास में बहुत से सिख लोगों को टायर गले में डाल कर जिंदा जलाया जा रहा था। तेजा सिंह की पत्नी ने अपने पति और तीन बेटों को बाल काट दिए थे और एक पेटी में बंद कर दिया। उनके आसपास वाले लोग ज्य़ादातर हिंंदू परिवार थे। आसपास हिंदू परिवार वालों उनकी बहुत मदद की थी और अपने घर में रखा था। नहीं तो उनके परिवार वालों को दंगाइयां ने मार डालना था। आजकल यह परिवार चंडीगढ़ में रहता है। उनके दो बेटे दिल्ली में ही रहते है। इस परिवार को भी वह दिन कभी नहीं भूलते। आज भी दिल्ली के दंगों की यादें ताज़ा है।

इनके जख्मों को अभी तक पूरी तरह से सहलाया नहीं गया है। आज 34 साल बीत जाने के बाद भी इस जनतांत्रिक देश में हज़ारों लोगों के किसी एक भी हत्यारे को सज़ा नहीं हुई है। ये लोग आज भी न्याय के लिए भटक रहे हैं। पर उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा है।