भारतीय खुफिया संस्थाएं

Intelligence
इलस्ट्रेशन: मनीषा यादव

यूपीए-2 के तीसरे साल में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एसपीजी, रॉ और आईबी के कुछ भूतपूर्व और तत्कालीन अधिकारियों की एक बैठक बुलाई. बैठक में मनमोहन सिंह के साथ सोनिया गांधी भी मौजूद थीं. उस मीटिंग में मनमोहन सिंह ने अधिकारियों से कुछ सवालों पर उनकी राय जाननी चाही-  क्या इंटेलीजेंस एजेंसियों में मुस्लिम समुदाय के लोगों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के संबंध में कोई फैसला लिया जा सकता है? क्या रॉ में मुस्लिमों को शामिल करने के बारे में सोचा जा सकता है. क्या एसपीजी में सिखों और मुसलमानों पर लगे बैन को हटाने पर विचार किया जा सकता है?

मनमोहन सिंह के इन प्रश्नों पर राय जाहिर करते हुए अधिकारियों ने कहा कि ऐसा हो तो सकता है लेकिन इसमें खतरा बहुत बड़ा है. सालों से चले आ रहे सिस्टम को बदलने से अगर कुछ गड़बड़ हुई तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? अंततः पीएम ने और सोचने की बात कहकर मीटिंग समाप्त कर दी. फिर कभी इस बारे में कोई चर्चा नहीं हुई.

srमनमोहन सिंह जिस मुद्दे पर इन अधिकारियों से चर्चा कर रहे थे वह भारत की इंटेलीजेंस और सुरक्षा एजेंसियों से जुड़ी ऐसी कड़वी हकीकत है जिसके बारे में कभी कोई खुलकर चर्चा नहीं करता. हकीकत यह कि भारत की आजादी के इतने सालों बाद भी देश की इंटेलीजेंस एजेंसियों में मुसलमानों के लिए नो-एंट्री का बोर्ड लगा हुआ है और एसपीजी(स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप) और एनएसजी (नेशनल सिक्योरिटी गार्ड) में सिखों और मुसलमानों का प्रवेश वर्जित है. रॉ के एक पूर्व अधिकारी कहते हैं, ‘ये कोई आज की बात नहीं है. 1969 में अपने गठन से लेकर आज तक रॉ ने किसी मुस्लिम अधिकारी की नियुक्ति नहीं की है. हालांकि उसके अपने कारण हैं.’ एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी इसकी चर्चा करते हुए कहते हैं, ‘शुरू-शुरू में एक अनरिटन कोड था कि इंटेलिजेंस एजेंसियों में खासकर सेंसिटिव जगहों पर मुस्लिमों को नियुक्त नहीं किया जाता था. यही अलिखित नियम इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिखों के लिए भी बन गया.’

सन 84 में स्थापित एसपीजी से जुडे़ एक पूर्व अधिकारी तहलका से बातचीत में कहते हैं, ‘ये सही है कि सिख और मुस्लिमों को वीवीआईपी सुरक्षा में नहीं लगाया जाता. पूर्व में हमने सुरक्षा से जुड़े अलग-अलग मामलों के कारण ही देश के प्रधानमंत्रियों की हत्या होते देखी है. एसपीजी सुरक्षा का अंतिम घेरा होता है. ऐसे में उसमें किसी तरह का कोई जोखिम नहीं ले सकते. मैडम इंदिरा गांधी और राजीव जी की हत्या के उदाहरण हमारे सामने हैं.’

IMG_4772
फोटो: विकास कुमार

रॉ और एसपीजी की तरह ही एनटीआरओ (नेशनल टेक्निकल रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन) ने भी किसी मुस्लिम अधिकारी को अपने यहां नियुक्ति नहीं किया. कुछ ऐसा ही हाल मिलिट्री इंटेलीजेंस (एमआई) का भी है. एमआई के एक अधिकारी कहते हैं, ‘अभी इसमें कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि सालों से चले आने के कारण ये चीजें परंपरा के रूप में स्थापित हो चुकी हैं. इसमें किसी को कुछ अजीब नहीं लगता.’ मीडिया से बातचीत में इसको कुछ और स्पष्ट करते हुए रॉ के पूर्व विशेष सचिव अमर भूषण कहते हैं, ‘मुस्लिमों को संवेदनशील और सामरिक जगहों से बाहर रखने का एक सोचासमझा प्रयास किया जाता है. समुदाय को लेकर एक पूर्वाग्रह बना हुआ है.’

भूषण की बात की पुष्टि कुछ साल पहले अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ में छपी एक खबर से हो जाती है. खबर में लिखा था कि पूर्व केंद्रीय शिक्षामंत्री हुमायूं कबीर के पोते की रॉ में भर्ती सिर्फ इस आधार पर रद्द कर दी गई क्योंकि वे मुस्लिम थे. हिमायूं कबीर उन लोगों में रहे हैं जिन्होंने बंटवारे के समय पाकिस्तान जाने के बजाय भारत को चुना. रिटायर्ड वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी भी कहते हैं, ‘इन संस्थाओं में बंटवारे के बाद से ही एक सांप्रदायिक पूर्वाग्रह बना हुआ है. उनकी (मुस्लिमों की) देशभक्ति पर ये एजेंसियां संदेह करती हैं.

ऐसा नहीं है कि इसको लेकर इन संस्थाओं और सरकार में कोई चर्चा नहीं हुई. रॉ से जुड़े सूत्र बताते हैं कि लंबे समय से रॉ की रिक्रूटमेंट पॉलिसी को लेकर संस्था के भीतर चर्चा चल रही है. लेकिन एजेंसी में ही एक तबका ऐसा है जो इसमें किसी तरह के बदलाव का सख्त विरोधी है. पूर्व प्रमुख पीके ठाकरन के समय में (2005-2007) इस दिशा में कुछ काम हुआ था. ठाकरन ने रिक्रूटमेंट पॉलिसी को बेहतर करने और उसमें धर्म के आधार पर भेदभाव खत्म करने के उद्देश्य से एक कमेटी बनाई थी. हालांकि उस कमेटी की न तो कभी रिपोर्ट आई और न ही पॉलिसी में कोई बदलाव हुआ.

एनडीए के कार्यकाल में भी ये मामला चर्चा में रहा. एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘कारगिल युद्ध के मद्देनजर एक कमेटी बनाई गई थी जिसको पूरे इंटेलीजेंस सिस्टम पर रिपोर्ट तैयार करनी थी कि क्या और किस तरह के सुधार लाए जाएं. उस समय ब्रजेश मिश्रा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार थे. उस दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई थी कि कैसे सुरक्षा एजेंसियों में एक धर्म विशेष के लोगों का प्रभुत्व है और एक समुदाय के लिए वो जगह वर्जित है.’ उस कमेटी से जुड़े रहे एक अधिकारी कहते हैं,  ‘मैंने इस बाबत ब्रजेश मिश्रा से बात की कि कैसे मुसलमान अधिकारियों के लिए हमें इंटेलीजेंस सिस्टम खोलना चाहिए तो वे ये बात सुनकर जोर से हंसे. फिर कहा बताइए किसे रखवा दें. आप परेशान मत होइए. करेंगे इस दिशा में भी करेंगे. सही सलाह दीजिए ऐसी मत दीजिए कि आपकी और हमारी दोनों की नौकरी पर बन आए.’

Anadयूपीए के कार्यकाल में जब जेएन दीक्षित एनएसए बने तो उस समय भी यह मामला उठा था. गृह मंत्रालय में पदस्थ रहे एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ‘उस समय भी रिक्रूटमेंट पॉलिसी में बदलाव के लिए चर्चा हुई थी. लेकिन रॉ के भीतर ही एक धड़ा इसके सख्त खिलाफ था. उसने सख्त लहजे में सरकार को बता दिया था कि सरकार को इस दिशा में सोचने की जरूरत नहीं है.’ यूपीए-2 का जिक्र तो हम ऊपर कर ही चुके हैं.

रॉ के एक पूर्व अधिकारी कहते हैं, ‘देखिए इसमें किसी को हाथ नहीं डालना चाहिए. पहले से एक व्यवस्था बनी हुई है वो डिस्टर्ब हो जाएगी. जो बदलाव करेगा उसे भविष्य में होनेवाली गड़बड़ी की जिम्मेवारी लेने के लिए तैयार रहना होगा. ऐसा नहीं है कि मैं मुसलमानों को एजेंसी में शामिल करने के खिलाफ हूं. लेकिन अभी वो समय नहीं आया है. जब देश के भीतर के लोग ही इस्लामिक आतंकवाद में गिरफ्तार हो रहे हों तब ऐसा सोचना किसी देशद्रोह से कम नहीं है.’

कुछ लोग मानते हैं कि समुदाय की देशभक्ति और उसके समर्पण को लेकर संदेह की वजह से ही 1998 में आईबी ने राष्ट्रीय स्तर पर यह सर्वे कराया था कि क्या मुस्लिम समुदाय से देश की आंतरिक सुरक्षा को कोई खतरा तो नहीं है. 28 बिंदुओं वाले सर्वे में यह प्रश्न भी था कि पाकिस्तान के साथ युद्ध की स्थिति में मुसलमान भारत के साथ खड़े होंगे या नहीं. तब तक भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु परीक्षण कर चुके थे. ऐसे में सर्वे के माध्यम से यह जानने का भी प्रयास किया गया था कि दोनों देशों के बीच शुरू हुई न्यूक्लियर रेस को समुदाय किस तरह से देखता है. कुछ और प्रश्न थे जैसे- क्या मुस्लिम समुदाय ने पाकिस्तान के परमाणु परीक्षण का विरोध किया है?   मुसलमानों की पाकिस्तान के परीक्षण पर क्या प्रतिक्रिया है. मुस्लिम उम्मा की एकता का आह्वान करनेवाले प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के भाषण के बारे में वे क्या सोचते हैं.

रॉ के पूर्व प्रमुख आनंद कुमार वर्मा कहते हैं, ‘देखिए जहां सिक्यूरिटी का सवाल उठता है वहां जरूरत से ज्यादा सेंसिटिव होना पड़ता है. वहां नजदीक के ही नहीं बल्कि दूर के खतरों के बारे में भी सोचना पड़ता है. इसलिए भर्ती के समय बहुत ध्यान दिया जाता है कि कहीं अभी न भी सही लेकिन बाद में तो कोई खतरा पैदा नहीं हो जाएगा.’

तो क्या यह मान लें कि मुसलमानों को नियुक्त करने को लेकर कोई पूर्वाग्रह इंटेलीजेंस एजेंसियों में नहीं है? पूर्व वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी एसआर दारापुरी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते, ‘व्यवस्था में कुछ लोगों को अभी भी लगता है कि इनकी लॉयल्टी उधर (पाकिस्तान के प्रति) हो सकती है. इसीलिए जो सेंसिटिव डेस्क होती हैं आईबी में उनको नहीं दी जाती हैं. इस कारण से ये रॉ में भी नहीं रखे जाते.’

modi
फोटो: विजय पांडे

वफादारी के प्रश्न पर आईपीएस अधिकारी तथा इंटेलीजेंस की ज्वाइंट कमिटी के पूर्व सचिव केकी दारुवाला एक स्थान पर अपनी राय व्यक्त करते हुए कह चुके हैं कि उन्होंने इंटेलीजेंस ब्यूरो के अपने एक साथी से पूछा कि पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले भारतीयों एजेंटों की सामुदायिक स्थिति क्या है. उसका उत्तर था कि अधिकांश जासूस बहुसंख्यक समाज से हैं.

एके वर्मा के मुताबिक, ‘ नियुक्ति करने वाले अधिकारी में एक पूर्वाग्रह  हो सकता है लेकिन यह उस अधिकारी की अपनी व्यक्तिगत सोच है. ऐसी कोई सरकारी पॉलिसी नहीं है. अब नियुक्ति करने वाला ही पूर्वाग्रह से भरा है तो सरकार क्या कर सकती है’ वर्मा मुसलमानों की देशभक्ति पर संदेह की बात को खारिज करते हुए कहते हैं, ‘ शुरू में लोगों को इस तरह के संदेह रहे होंगे लेकिन देखिए हमारे गृहमंत्री और गृहसचिव भी गैर हिंदू लोग बन चुके हैं. अब ये तो बेहद संवेदनशील पोस्ट होती हैं. उनका दखल सब जगह रहता है. हां ये एक तथ्य तो है ही कि मुस्लिम समुदाय के जो लोग हैं अगर उनसे पूछा जाए कि आपकी लॉयलिटी किसकी तरफ है – धर्म के प्रति या देश के प्रति तो मेरा अनुमान है कि वो हमेशा कहेंगे कि उनकी पहली वफादारी तो धर्म की तरफ है. सवाल फिर यहीं से उठता है.’

अपनी बात को विस्तार देते हुए वे कहते हैं, ‘देखिए उनके जो धर्म के सिद्धांत हैं. उसमें जो बातें लिखी गई हैं जिन्हें मानने के लिए वे बाध्य हैं उनमें ही लिखा है कि देश के प्रति नहीं बल्कि उम्मा के प्रति वफादार होना चाहिए. उम्मा यानी जो पूरा इस्लामिक डायसपोरा है वो आपके वतन के समान है. आपकी पहली लॉयलिटी उम्मा के प्रति है उस देश के प्रति नहीं जहां आप पैदा हुए हैं, जहां रहते हैं. इसलिए आप देख रहे हैं कि यूरोप और अमेरिका में वहीं पर पैदा हुए लोग, उसी वातावरण में पले बड़े लोग, जिनके बारे में मानना चाहिए कि वो वहां के वैल्यूज को अपने आप स्वीकार कर लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है. इसलिए नहीं हो रहा है क्योंकि मस्जिद में या उनकी कम्यूनिटी की जो मजलिसें होती हैं या परिवार में जो चर्चा होती है उसमें हमेशा ये बात उठती रहती है कि आपको अपने धर्म के प्रति हमेशा निष्ठा दिखानी है. अगर आपने कभी स्टडी किया हो तो आप समझ जाएंगे कि उस धर्म में कई ऐसी चीजें है जो किसी और धर्म में नहीं हैं. ऐसी चीजें जो हमें और आपको आपत्तिजनक लगें लेकिन उनको नहीं लगती हैं. उनका धर्म कहता है कि अगर किसी ने धर्म को छोड़ दिया तो कोई भी बिलीवर उसको जान से मार सकता है.’

prakashधर्म के आधार पर मुसलमानों के साथ भेदभाव के सवाल पर आईबी के एक अधिकारी कहते हैं, ‘इसे धर्म के चश्मे से देखना ठीक नहीं होगा. इंटेलीजेंस में किसी भी अधिकारी पर आंख बंदकर विश्वास नहीं किया जाता. यह हिंदुओं के साथ ही हर धर्म के व्यक्ति पर लागू होता है. वे एक उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘हमारे यहां सभी अधिकारियों के भूत और वर्तमान का पूरा हिसाब दर्ज रहता है. इस मामले में हम पूरी सख्ती बरतते हैं. एक अधिकारी जो हमारे यहां आए थे उन्होंने एजेंसी ज्वाइन करते समय जो जानकारी दी थी उसमें इस बात का जिक्र नहीं था कि उनके नाना ने दो शादियां की थी. उनकी दूसरी नानी के दोनों बेटे आजादी के बाद पाकिस्तान चले गए थे. जब उनसे ये पूछा गया तो वो कहने लगे कि ये तो बहुत पुरानी बात है. इससे क्या मतलब. उनसे फिर कुछ और नहीं पूछा गया. जिस राज्य से वो आए थे उन्हें वहां वापस भेज दिया गया.’

एक तरफ जहां एजेंसी के अधिकारी इस तरह के उदाहरणों के आधार पर अपने निर्णय को जायज ठहराते हैं वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय से आने वाले ऐसे अधिकारी भी हैं जो इस तरह की प्रोफाइलिंग को षडयंत्र के रूप में देखते हैं. एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, ‘ये लोग हमें नहीं लेना चाहते हैं तो सीधे कह दें. ये जानबूझकर कोई न कोई रिश्ता किसी न किसी मुस्लिम देश से निकाल देते हैं. और फिर कहते हैं कि ये तो सेंसिटिव मामला है. आप खुद सोचिए कि भारत में ऐसा कौन-सा मुसलमान होगा जिसके परिचय का कोई पाकिस्तान या बांग्लादेश में नहीं होगा. एक पीढ़ी पहले जाते ही कोई न कोई उस पार का निकल आता है. बस इस आधार पर ये उस अधिकारी को ब्लैक लिस्ट कर देते हैं. ‘

लेकिन सुरक्षा एजंसियों का मानना है कि भले अधिकारी में कोई दिक्कत नहीं हो लेकिन ऐसे हालात में एक द्वंद की स्थिति तो उत्पन्न होती ही है. इसके अलावा मुसलिम समुदाय से खुफिया संस्थाओं में भर्ती की कुछ अन्य व्यावहारिक समस्याओं के बारे में भी रॉ के एक पूर्व अधिकारी कहते हैं, ‘मान लीजिए किसी हिंदू अधिकारी का ब्रैकग्राउंड आपको चेक करना है. इसके लिए आपको उससे जुड़े 50 लोगों को चेक करना होगा. वहीं किसी मुस्लिम अधिकारी की पृष्ठभूमि जानने के लिए आपको 100-150 लोगों के बारे में पूरी की पूरी जानकारी इकट्ठी करनी होती है. सामान्य तौर पर हिंदुओं का परिवार देश में सिमट जाता है लेकिन मुसलमानों के परिजनों को जानने के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश के चक्कर भी लगाने पड़ते हैं.’

subhashमुसलमानों के प्रतिनिधित्व के सवाल पर यूपी के पूर्व पुलिस प्रमुख प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘सवाल ये है कि जब आप आधुनिक शिक्षा नहीं लेंगे तो जाहिर सी बात है सरकारी नौकरी या अन्य कई प्रतियोगी परीक्षाओं में नहीं आ पाएंगे. मान लीजिए थोड़ी बहुत आपने शिक्षा ले भी ली तो इस समुदाय के मनोविज्ञान में ये है कि हम सरकारी नौकरी और खासकर की पुलिस या फौज की नौकरी नहीं करेंगे. क्योंकि पुलिस या फौज की नौकरी करने के लिए आपको देश के प्रति अटूट देशभक्ति चाहिए. और आपको मर मिटना पड़े तो मर मिटने के लिए तैयार रहिए. ये कहते हैं कि ठीक है, हम बहादुर हैं. हम मर मिटने को तैयार हैं लेकिन हम इस्लाम के लिए मर मिटने को तैयार हैं. ये खुलकर कोई नहीं कहेगा लेकिन ये बातें इनके भीतर गहरी मानसिकता में है. तो ये पुलिस में आते नहीं, फौज में जाते नहीं. और उसके बाद कहते हैं कि हमारा प्रतिनिधित्व कम है. इनके रिप्रजेंटेशन को बढ़ाने की बार-बार चर्चा होती है लेकिन सवाल ये है कि वो पढ़ें तो. वो तो खाली कुरान पढ़ना चाहते हैं. तो हम क्या करें.’

इंटेलिजेंस से जुड़े तमाम ऐसे अधिकारी भी हैं जो ये राय रखते हैं कि सालों से चले आ रहे इस भेदभाव को समाप्त किया जाना चाहिए. वे बताते हैं कि कैसे ये अलिखित नियम अंततः इंटेलीजेंस को ही नुकसान पहुंचाता आया है. आईबी और रॉ दोनों से पूर्व में जुड़े रहे अधिकारी बी रमन ने अपनी किताब काव बॉयज में मुसलमानों के आईबी और रॉ में भर्ती होने की जरूरत पर बल दिया है. आउटलुक पत्रिका से बातचीत में रॉ के पूर्व प्रमुख एएस दुलत कहते हैं, ‘मुसलमानों की नियुक्ति न सिर्फ जरूरी है वरन वो बेहद महत्वपूर्ण भी है. एक मुस्लिम अधिकारी ही मुस्लिम समाज के मानस को बेहतर तरीके से समझ सकता है. कोई गैर मुस्लिम कितना भी दावा करे कि वो समुदाय के बेहद करीब है वो उस समाज की बारीकियों को पूरी तरह नहीं समझ सकता. वहीं एक मुस्लिम भाषा, रूपक और संस्कृति के स्तर पर उससे संवाद कर सकता है.’

पाकिस्तान में जासूसी के लिए एजेंट्स के चयन में शामिल रहे एक अधिकारी कहते हैं, ‘आपको गैर मुस्लिम को किसी मुस्लिम देश में भेजने के लिए उसे पूरी तरह से बदलना पड़ता है. शारीरिक और मानसिक दोनों स्तरों पर. भाषा बोलचाल और संस्कृति की तमाम बारीकियां उसे सिखानी पड़ती हैं. जिसमें न सिर्फ ढेर सारा पैसा और समय खर्च होता है बल्कि उसकी सफलता पर भी हमेशा संदेह बना रहता है. वे एक उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘एक अधिकारी को हमने एक मुस्लिम देश में भेजने के लिए तैयार किया. वो एक गैर मुस्लिम था. उसे ‘मां दुर्गा की कृपा से’ और ‘मां दुर्गा सब ठीक कर देगी’ जैसे लाइनें बोलने की आदत थी. उसकी ट्रेनिंग के दौरान इसे छुड़ाने की खूब कोशिश की गई. हम कामयाब रहे उसने मां दुर्गा वाली बात बोलनी बंद कर दी थी. जाने से एक दिन पहले मैंने उसे बुलाया और कहा कि तुम रिलैक्स रहना. सब ठीक से हैंडिल हो जाएगा. उसने तपाक से बोला, यस सर मां दुर्गा की कृपा से सब ठीक हो जाएगा. उसने हमारी कई महीनों की मेहनत पर पानी फेर दिया था.’

कश्मीर में चरमपंथ के चरम समय में मुस्लिम अधिकारियों का रोल बेहद महत्वपूर्ण रहा है. एक वरिष्ठ आईबी अधिकारी कहते हैं, ‘उस समय एक रणनीति के तहत मुस्लिम अधिकारियों को वहां भेजा गया था. इसका बहुत फायदा हुआ. ये अधिकारी वहां के लोगों के बीच ज्यादा बेहतर तरीके से घुल मिल गए. वो वहां के लोगों को ज्यादा बेहतर तरीके से समझ पाते थे. धीरे-धीरे स्थानीय लोगों ने भी इन ऑफिसरों पर भरोसा करना शुरू कर दिया. इससे हमें पाकिस्तान के प्रोपेगेंडा को वहां खत्म करने में मदद मिली.’

PM-Modi
फोटो: पीआईबी

आईबी से जुड़े एक अधिकारी कहते हैं, ‘इस्लामिक आतंकवाद के जिस खतरे से भारत जूझ रहा है उसमें मुस्लिम अधिकारी बहुत काम के साबित हो सकते हैं. जिन लोगों से आपको निपटना है अगर उनकी भाषा और तौर तरीके को आपका अपना कोई अधिकारी समझ सकता है तो इससे बेहतर क्या हो सकता है. लेकिन हम अभी भी लकीर के फकीर बने हुए हैं. हिंदुओं और सिखों को मुस्लिम बनाने का काम बंद होना चाहिए. जब आपके पास लोग हैं तो फिर नकली मुसलमान बनाने का क्या मतलब.’

इंटेलीजेंस एजेंसी में मुसलमानों को नहीं रखने संबंधी यह नियम वैसे तो सभी खुफिया विभागों में आजादी के समय से ही चल रहा था जो अब तक जारी है. लेकिन इनमें से एक विभाग में समय के साथ थोड़ा परिवर्तन आ चुका है. वह विभाग है आईबी. इस खुफिया संस्था में सालों से चले आ रहे मुसलमानों पर बैन को खत्म करने की शुरूआत नरसिंहा रॉव के प्रधानमंत्री बनने के बाद हुई. रॉव के दौर में ही आईबी के द्वार मुस्लिमों के लिए खोलने का निर्णय लिया गया.

उस दौर को बेहद करीब से देख चुके आईबी के एक अधिकारी कहते हैं, ‘ये बदलाव इतना आसान नहीं था. सरकार की तरफ से जब मुस्लिम अधिकारियों को भर्ती करने का फैसला लिया गया तो इसको लेकर आईबी में ही विरोध के स्वर उठने लगे. ये स्वाभाविक था क्योंकि दशकों से एक खास तरह की व्यवस्था कायम थी और अब उसमें परिवर्तन होने जा रहा था. लेकिन सरकार ने उस विरोध को खारिज कर दिया. उस समय सरकार की यह सोच थी कि आईबी में मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए अगर ऐसे मुस्लिम अधिकारी नहीं मिल रहे हैं जो पूरी तरह से उस पद के योग्य हैं तब भी उन्हें रखा जाना चाहिए.’

जल्द ही कुछ युवा मुस्लिम अधिकारियों को आईबी में शामिल किया गया. इस बदलाव का परिणाम ये हुआ कि आज आईबी के डायरेक्टर एक मुस्लिम हैं. 2013 में आसिफ इब्राहिम स्वतंत्र भारत के पहले आईबी चीफ बने. हालांकि बहुत से लोग आसिफ इब्राहिम को आईबी प्रमुख बनाने पर भी सवाल उठाते हैं.  प्रकाश सिंह कहते हैं, ‘आसिफ इब्राहिम आईबी के डायरेक्टर बनने के योग्य नहीं हैं. उन्होंने तीन आदमियों को सुपरसीड किया है जो उनसे योग्य थे. ये डायरेक्टर सिर्फ इसलिए बने क्योंकि वो मुस्लिम हैं.’

मुस्लिमों को लेकर इंटेलीजेंस एजेंसियों में बायस की बात को तमाम जानकार लोग पूरी व्यवस्था में ही उनके प्रति बायस से जोड़कर देखते हैं. इसमें वह ट्रेनिंग भी शामिल है जो नौकरशाही को दी जाती है. आईबी के पूर्व ज्वाइंट डायरेक्टर एमके धर ने अपनी किताब ओपेन सीक्रेट्स में लिखा है कि उनकी मुस्लिम विरोधी धारणाएं तब और मजबूत हो गईं जब वे आईबी की ट्रेनिंग के लिए उसके ट्रेनिंग सेंटर आनंद पर्वत गए. वहां जो कुछ ट्रेनिंग के दौरान सिखाया गया उससे उनके मुस्लिम विरोधी विचार और मजबूत हुए… मैं आरएसएस और आईबी की मुसलमानों को लेकर समान धारणा से चौंक गया.’ दारापुरी कहते हैं, ‘ट्रेनिंग के दौरान ही मुस्लिमों का प्रोजेक्शन व्यवस्था के लिए एक खतरे के तौर पर किया जाता है. ये ही बात ट्रेनिंग लेने वाले अधिकारी के दिमाग में बैठती है.’

हालांकि ऐसी किसी तरह की ट्रेनिंग को खुफिया विभाग के अधिकारी खारिज करते हैं. वर्मा कहते हैं, ‘देखिए ऐसी कोई ट्रेनिंग हिंदुस्तान में नहीं दी जाती है. लेकिन अगर किसी विभाग में काम करनेवाले लोगों के मन में कोई भावना पहले से ही हो तो आप क्या कर सकते हैं. हिंदू समाज के किसी भी परिवार से आप पूछें कि क्या आप अपनी बेटी की शादी मुस्लिम परिवार में करने को तैयार हैं तो उसका जवाब होगा नहीं. चाहें कितना भी सुशिक्षित हो, मॉर्डन हो. इसलिए कि उसकी एक ऐतिहासिक सभ्यतामूलक बैकग्राउंड है. अगर उसी सिविलाइजेशनल बैकग्राउंड की वजह से किसी अधिकारी वर्ग में कोई भावना है तो उसको तो आप रोक नहीं सकते हैं. लेकिन ये देखना है कि उस भावना की वजह से वो कोई गलत काम तो नहीं कर रहा.’

लेखक और चिंतक सुभाष गाताडे कहते हैं, ‘आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे कि पूरी ब्यूरोक्रेसी का कम्यूनलाइजेशन हुआ है. ब्यूरोक्रेसी के भीतर तो बहुत पहले से ऐसा माइंडसेट बना हुआ है.’

sanjeevहालांकि प्रकाश सिंह मुस्लिम समुदाय की खुफिया और सुरक्षा संस्थाओं में अनुपस्थिति के लिए व्यवस्था के मुस्लिम विरोधी होने से ज्यादा खुद समुदाय को ही जिम्मेदार मानते हैं, ‘सवाल मुसलमानों के आईबी और रॉ में जाने का नहीं है. सवाल मुसलमानों के सरकारी नौकरियों में आने का है. मैं तो अपने व्यक्तिगत अनुभव से बता सकता हूं कि कई बार हम लोगों ने बहुत प्रयास किया कि मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए यूपी पुलिस और पीएसी में. हालत ये थी कि इनकी सिफारिश करनी पड़ रही थी. अधिकारियों को मुस्लिम इलाकों में जा कर कहना पड़ता था कि भइया अपने लड़कों को भेजो तो सही. हम तो भर्ती करने को तैयार हैं.’

वे उदाहरण देते हुए कहते हैं ‘अभी तो सीबीआई में स्पेशल डायरेक्टर मुसलमान था. एडिशनल डायरेक्टर मुसलमान था. डायरेक्टर आईबी खुद मुसलमान हैं. विदेश विभाग के प्रवक्ता मुस्लिम हैं. असलियत ये है कि जितना इनको बढ़ने का मौका मिलना चाहिए उससे ज्यादा मिलता है. देश के प्रति निष्ठा तो होनी पड़ेगी. देश के प्रति निष्ठा जिस आदमी में है वो है. जैसे अट्टा हुसैन 15 कोर में श्रीनगर में आर्मी के कमांडर थे. ये एक सेंसिटिव पोस्ट है. आखिर इंडियन आर्मी ने उन्हें क्यों रखा. क्योंकि उनकी देशभक्ति पर किसी को संदेह नहीं था. उन्हें कहीं हैदराबाद, बंबई या नॉर्थ ईस्ट में लगाया जा सकता था लेकिन उन्हें कश्मीर में लगाया गया. जो आदमी काबिल है उसे कोई माई का लाल इस देश में आगे बढ़ने से नहीं रोक सकता. और अगर वो मुसलमान है सिख है तो आवश्यक्ता से अधिक तवज्जो मिलती है. अगर इस देश में योग्यता के बावजूद मान्यता नहीं मिलती तो वो हिंदू को नहीं मिलती. पर ये बात कोई कहने को तैयार ही नहीं होगा. सच्चाई यही है कि आप चाहें जितने काबिल हों अगर आप हिंदू हैं तो आपको प्राथमिकता नहीं मिलेगी.’

अपना अनुभव बताते हुए सिंह कहते हैं, ‘मैं यूपीएससी बोर्ड में था तब जब भी कोई मुसलमान लड़का आता था तो हम कहते थे कि चलो एक तो मिला अरे इसे किसी तरह से धक्का देकर ऊपर चढ़ा दो. मैं आपको अपने अनुभव से बता सकता हूं कि उसको इंटरव्यू लेवल पर हमेशा बोर्ड की तरफ से मदद मिलती है. सवाल है कि अगर आप पढ़ेंगे नहीं तो कहां से हम आपको आईपीएस और आईएएस बना दें. आप सिपाही में भर्ती नहीं होंगे क्योंकि हमें देश की सेवा करनी पड़ेगी. हमको नक्सलियों से लड़ना पड़ेगा, हम क्यों लड़ें. हमें नॉर्थ इस्ट में लड़ना पड़ेगा हम क्यों लड़ें. हमें कश्मीर में पृथकतावादियों से लड़ना होगा, हम उनसे नहीं लड़ेंगे. जब ये चीजें आपके जहन में बैठी हुई हैं और फिर आप दोष देते हैं भारत सरकार को.’

उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी रिजवान अहमद अपने अनुभव साझा करते हुए कहते हैं, ‘मेरा तो अनुभव है कि मुस्लिम अधिकारियों की बहुत कदर ही होती है. उन्हें सेंसिटिव पोस्टिंग भी दी जाती है. हां, इंटेलिजेंस के बारे में मुझे नहीं पता. मैं वहां कभी रहा नहीं.’

लेकिन दारापुरी व्यूरोक्रेसी के सांप्रदायिकता में गहरे तक धंसे होने का सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘आपने देखा होगा कि चुनाव के पहले कितने वरिष्ठ अधिकारियों ने दक्षिणपंथी पार्टी का दामना थामा. आप कल्पना कीजिए कि जब ये सर्विस में रहे होंगे तो क्या कर रहे होंगे. ये कहां और कितने सेक्यूलर रहे होंगे ये समझा जा सकता है.’

लेकिन क्या व्यवस्था में प्रतिनिधित्व को लेकर मुस्लिम समाज के अधिकारियों की तरफ से कोई आवाज उठती है? वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट कहते हैं, ‘तमाम जगहों पर जो मुसलमान अधिकारी बैठे हैं वो सोचते हैं कि हम तो कौम से अलग हैं. और वो बड़े गर्व से कहते भी हैं कि हम बाकी मुसलमानों जैसे नहीं है. इसका मतलब क्या है मुझे नहीं पता. दूसरे मुसलमान कैसे होते हैं मुझे नहीं पता. आजकल आप देखिए तो मुस्लिम अफसर सरकार के प्रति ज्यादा लॉयल होगा. सरकार की खिलाफत करने वाले अफसरों को देखेंगे तो वो अधिकांश हिंदू रहे हैं. मुसलमान अफसर की कोशिश रहती है कि वो दिखाए कि वो सबसे ज्यादा वफादार है. वो दूसरे से ज्यादा झुकेगा, दूसरे से ज्यादा खुशामद करेगा. इंटेलीजेंस में भी यही है.’

[email protected]