सुर के सम्राट का प्रस्थान

    पंडित भीमसेन जोशी का अवसान सुर, लय और ताल की दुनिया के एक अध्याय ‘सुर’ के खत्म हो जाने जैसा है. पंडितजी के साथ मेरे संबंधों में बीते कई वर्षों की मीठी और आनंददायक तसवीरें गुंथी हुई हंै. मेरे पास कहने को शब्द बहुत कम हैं लेकिन बताने को संस्मरण अनगिनत. हमारा संबंध सिर्फ कला और कलाकार के दायरे में सीमित नहीं था बल्कि यह रिश्ता एकदम घरेलू था और आगे भी रहेगा. इस रिश्ते में पंडितजी का बड़प्पन, उनकी आत्मीयता, उनका अभिभावकत्व जैसे तत्व घुले-मिले हैं. मैं शायद सौभाग्यशाली हूं कि मुझे उनके साथ कार्यक्रमों में शिरकत करने के अवसर भी बारंबार मिले. पुणे, कोलकाता, मुंबई और दिल्ली में ऐसे अनगिनत कार्यक्रम हुए जब मैंने उनके साथ मंच साझा किया. ऐसा संयोग बैठता था कि वे सामने बैठकर मेरी प्रस्तुति देखते थे, इससे बड़ा सौभाग्य क्या होगा.

    हमारे चाचा शंभू महाराज पंडितजी के मित्रों में रहे, इसलिए उनकी विशेष कृपादृष्टि हमेशा मुझ पर रही. 12 साल की उम्र से ही उन्होंने मुझे मंचों पर सराहना और सिखाना शुरू कर दिया था. सवाई गंधर्व में मैं जितनी बार नाचा हमेशा अपनी ताल के साथ मुझे एक ही सुर बहता हुआ सुनाई पड़ा, पंडितजी के मुंह से निकलने वाला सुर… वाह बेटा, वाह-वाह, जय हो महाराजजी…मंच के सामने उनकी उपस्थिति ही ऊर्जादायी होती थी.

    बंडी-पजामा पहने, जेब में खैनी चुनौटी रखे- ऐसा आडंबरहीन व्यक्तित्व था पंडितजी काहमारे रिश्ते को परिभाषित करने के लिए एक वाकये का जिक्र करना चाहूंगा. पंडितजी दिल्ली आए हुए थे. कर्जन रोड पर उनका कार्यक्रम था, पर मैं किसी कारणवश उस कार्यक्रम में जा नहीं सका. पंडितजी ने वहां अपना कार्यक्रम समाप्त किया. फिर उनको मेरी याद आ गई कि मैं कार्यक्रम से ही नदारद हूं. आधी रात को वे मेरे घर पहुंच गए. पूछने लगे, ‘अरे भई, तुम आए नहीं.’ मैंने कहा, ‘भइया मैं किसी काम में फंस गया था, इसलिए नहीं आ सका.’ पंडितजी कहने लगे, ‘अब मैं तुमको यहां गाकर सुनाऊंगा.’ बैठ गए पंडितजी गाना सुनाने, भोर तक वे गाते रहे और हम सुनते रहे. तब कहीं जाकर वे सोए. और सुबह ही उन्हें वापस जाना था, उनकी फ्लाइट थी. जल्दी-जल्दी हम उन्हें लेकर एयरपोर्ट पहुंचे. वहां पहुंचकर पंडितजी ने कहा कि टिकट तो वे घर ही भूल आए हैं. कहने का अर्थ है कि इस तरह का स्वच्छंद और मस्तमौला व्यक्तित्व था पंडितजी का.

    पंडितजी के प्रति मेरे मन में एक महत्वपूर्ण छवि उनकी सादगी की बनती है. ऐसा सादा जीवन, सफलता के इतने शीर्ष पर देख पाना विरल अनुभव है. शरीर पर बंडी डाले, पजामा पहने उसी तन्मयता से मिलते देखना अचरज में डाल देता था. चुनौटी हमेशा अपनी बंडी की जेब में रखे रहते थे. उनको खैनी से प्रेम था और जब भी मैं सामने होता था एक चुटकी मुझे भी जरूर खिलाते थे.

    कला के प्रति पंडितजी का समर्पण और संगीत से लगाव की मिसाल दी जाती है. व्यक्ति अगर उसका आधा भी समर्पित हो जाए तो शास्त्रीय संगीत का महारथी बन सकता है. मुझे आज भी याद है उनके सिर का ऑपरेशन हुआ था. लेकिन जैसे ही उनकी हालत में थोड़ा-सा सुधार हुआ वे एक बार फिर से लोगों को अपने सुर की सरिता से सराबोर करने लगे थे. इतने गंभीर ऑपरेशन के बाद भी उन्होंने तमाम कंसर्ट किए. व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे भी गाना उन्हें गवारा था, लेकिन संगीत से वियोग उन्हें बर्दाश्त नहीं था. वही आवाज, वही गर्जन, वही कोमलता उनमें हमेशा दिखी. खुली आवाज का यह जादू कहीं और नहीं दिखता मुझे. हालांकि प्रतिभाएं एक से एक हैं, पर अब पंडितजी की शून्यता वाले दौर में उनकी असल परीक्षा होगी. पिछले सवाई गंधर्व कार्यक्रम में ही एक बार फिर से पंडितजी की संगीत से अगाध श्रद्धा के दर्शन हुए जब वे व्हीलचेयर पर बैठे, नाक में नली लगाए कुछ देर के लिए कार्यक्रम में उपस्थित हुए.

    उनकी खासियत यह थी कि वे जिस भी राग में गाते थे उस वातावरण को सजीव कर देते थे. मालकौंस, दरबारी, पूरिया, भटियार या फिर सुबह-सुबह उनका भजन ‘जो भजे हरि को…’ ऐसा तन्मय कर देता है कि उसके लिए कोई शब्द गढ़ पाना संभव नहीं है. बिलकुल शिवालय की घंटियों की तरह उनके सुर श्रोताओं के हृदय में उतर जाते थे. एक तो होता है कि हमने बहुत अच्छा रियाज किया और उसके सहारे बहुत अच्छा गा दिया. एक होता है कि उसके प्रति आपके भीतर भक्ति उत्पन्न हो जाए, तो बात अलग हो जाती है. ऐसे लोगों के लिए कलाकार शब्द छोटा होता है. मैं उन्हें दीवाना कहता हूं, मीरा की तरह.

    यह भारत के शास्त्रीय संगीत की अपूरणीय क्षति है. मुझे निकट भविष्य में इसकी भरपाई की उम्मीद नजर नहीं आती. किंतु इस तथ्य पर मेरी अटूट श्रद्धा है कि भीमसेन जोशी जैसा बनने के लिए ईश्वर की कृपा होना अनिवार्य है. जब तक परिवार में बड़े-बुजुर्ग जिंदा रहते हैं तब तक संतानें थोड़ी लापरवाह भी रहती हैं. जिम्मेदारियां सिर आने पर ही उनकी प्रतिभाएं निखरनी शुरू होती हैं. इस लिहाज से पंडितजी की रिक्तता वाला यह दौर शास्त्रीय गायन के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहेगा. पंडितजी के कई शागिर्द हैं, किराना घराने से भी कुछ लोग निकले हैं जिनसे उम्मीदें हैं.

    पंडितजी ने संगीत साधना के लिए कठोर अनुशासित जीवन जिया, लेकिन उनके जीवन के दूसरे हिस्से में थोड़ी उन्मुक्तता, थोड़ी आजादी के दर्शन होते थे. मेरी राय में अपने अंदर के कलाकार को एंटरटेन करना भी जीवन का उतना ही जरूरी हिस्सा है. वे अपनी गायन कला के साधक थे. उन्हें गाड़ियों का शौक बहुत ज्यादा था. मर्सिडीज जैसी गाड़ियां वे खूब चलाते थे. शास्त्रीय गायक होते हुए भी बंधनहीन खान-पान उनकी विशेषता थी. अपनी आत्मा में बसे कलाकार को तनावमुक्त करने के लिए कलाकार इस तरह के जरिये ईजाद कर लेता है. मेरे खयाल से यह पंडितजी का अपना तरीका था. कभी-कभी तो वे गाड़ी की भाषा में ही मुझे गाने सिखा देते थे. क्लच दबाया (सुर लगाया), एक्सिलेटर दिया तानों पर, और ब्रेक लगाया सम पर आकर धांय से… गाड़ी और गायकी से कुछ इस तरह जुड़े हुए थे पंडितजी.

    मेरी व्यक्तिगत इच्छा है कि पंडितजी की गाई हुई कुछ रचनाओं पर अपनी कला के तालमेल से कुछ कंपोज करके लोगों के सामने प्रस्तुत करूं, ताकि मैं और लोग पंडितजी को नये रूप में याद करें. संगीत और भाव का रिश्ता जीवन और सांस की तरह है. दोनों मिलकर ही पूर्णता की ओर गमन करती हैं. शोभा गुर्तू जी के साथ, गिरिजा जी के साथ मैंने मंच पर भाव दिए हैं. राजन-साजन के भी साथ अकसर करता रहा हूं, लेकिन पंडितजी के साथ मेरी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी. हमेशा हमारे कार्यक्रम आगे-पीछे ही हुए, साथ-साथ जुगलबंदी का संयोग बन नहीं पाया.

    पंडितजी को श्रद्धांजलि देने के लिए मेरे पास एक बार फिर से शब्दों की कमी है, लेकिन ताल और भाव की भाषा में मेरे नृत्य के शब्द हैं. ये संगीत के शब्दरूपी पुष्प हैं. नृत्य के भावों में मैं इनकी माला बनाकर पंडितजी को समर्पित करना चाहूंगा…

    ता दिग दिग थइ
    ता थइ ता थइ
    दिग नग दत थइ

    (अतुल चौरसिया से बातचीत पर आधारित)