सबरीमाला मंदिर में सवाल आस्था का

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (13 नवंबर) को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं (दस से पचास साल) के प्रवेश के अपने फैसले को दरकिनार किया। लेकिन इस पर रोक नहीं लगाई। इस पर पुनर्विचार की बात कही।

पांच सदस्यों की इस बेंच की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने की। सुप्रीम कोर्ट के ही 28 सितंबर के फैसले को फिलहाल रद्द किया गया है। लेकिन इस पर कोई रोक नहीं है। यानी यह अमल में रहेगा। सिर्फ फैसले पर पुनर्विचार होगा जिसके लिए उनचास अपीलें आई हैं।

मंदिर में समान स्त्री-पुरूष में भेद के खिलाफ आस्था और मान्यताओं के आधार पर एकरूपता बरतने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई थी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने हर पक्ष को सुना। लेकिन जब 28 सितंबर को फैसला दिया तो उसमें कहा कि दस से 50 साल तक की महिलाओं को भी समान तौर पर मंदिर में प्रवेश दिया जाए।

देव अयय्पा के श्रद्धालुओं ने उन महिलाओं श्रद्धालुओं को आस्था, परंपरा के नाम पर मंदिर में नहीं जाने दिया। पुलिस की तैनातगी के बावजूद महिलाओं को मंदिर की सीढिय़ों तक भी पहुुंचने नहीं दिया गया। पूरे केरल मे ंपक्ष और विपक्ष में खूब आंदोलन चले और पूरा आंदोलन संघ परिवार बनाम राज्य सरकार के रूप में बदल गया।

इसकी एक वजह यह भी थी कि केरल सरकार चाहती थी कि एपेक्स कोर्ट के फैसले पर अमल किया जाए। लेकिन राज्य सरकार का पुलिस प्रशासन इसमें कामयाब नहीं हुआ।

मुख्य पुजारी ने तो यह भी धमकी दे दी कि यदि महिलाएं (10 से 50 साल) मंदिर में आए, तो वे मंदिर के दरवाजे बंद कर देंगे। पांच दिन तक कुछ महिलाओं ने कोशिश की लेकिन उन्हें गाली-गलौच कर रहे भक्तों ने दर्शन पाने में कामयाब नहीं होने दिया।

बेंच ने कहा है कि समीक्षा की अपीलों का खुली अदालत में स्वागत है। समीक्षा की सभी आवेदनों पर 22 जनवरी को सुनवाई होगी। लेकिन हम यह साफ करना चाहेंगे कि इस अदालत के फैसले और आदेश जो 28 सितंबर 2018 को जारी हुआ उस पर कोई रोक नहीं है।