राम तेरी गंगा मैली हो गयी

उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर गंगा में बह रहीं लाशें, रेत मेंदफ़्नपड़े शव

आज जीवदायनी माँ गंगा के दामन मेंदफ़्नऔर तैरती सैंकड़ों लाशों की ख़ामोशी इन मरे हुए लोगों की असमय दर्दनाक मौत और अपनों मजबूरी वश द्वारा बिना संस्कारों के तिलांजलि देने की गवाही दे रही है। जैसे वे पूछना चाह रही हों कि क्या देश में चल रहा यह विध्वंसकारी कहर ही विकास है? आज उत्तर प्रदेश और बिहार के सभी गाँवों में 20 फ़ीसदी से अधिक घरों में कोरोना मरीज़ पडे हैं।

श्मशानों और क़ब्रिस्तानों में जगह नहीं है। बहुत-से सनातनी (हिन्दू) अपने मृतकों को या तो गंगा में फेंक रहे हैं या गंगा किनारे रेत में दबा रहे हैं। अलग-अलग रिपोट्र्स में आ रहे आँकड़ों को देखें, तो केवल उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जगहों पर 2000 से अधिक शवों के गंगा में और गंगा किनारे मिलने की ख़बर है। सरकारें लगातार स्थिति कंट्रोल करने के दावे और मौतों की कमी के जादुई आँकड़े बताकर लोगों को भरमाने की राजनीति कर रही हैं। जबकि अधिकतर गाँवों में कोरोना संक्रमण की जाँच नहीं हो रही है और जहाँ हो रही है, वहाँ बहुत धीमी गति से। सरकार के हर प्रयास के बावजूद गाँवों में शहरों के मुक़ाबले कोरोना की जाँच और चिकित्सा के पुख़्ता इंतज़ाम नहीं हो पा रहें हैं। इसलिए ग्रामीण इलाक़ों में खाँसी, बुख़ार और दूसरी बीमारियों से हो रही मौतों का कोई आँकड़ा भी उपलब्ध नहीं है। मेरे विचार से प्रदेश सरकार को तत्काल प्रदेश के सरकारी और $गैर-सरकारी दोनों प्रकार के अस्पतालों में कोरोना का इलाज मुफ़्त करना चाहिए। आज प्रदेश सरकार को आवश्यकता है कि वह तमाम सरकारी और निजी स्कूलों को अस्थायी अस्पतालों में तब्दील करके मेडिकल स्टाफ, डॉक्टर और नर्सेज को सरकार अपनी तरफ़ से नियुक्ति दे; भले ही ये नियुक्तियाँ अस्थायी हों। ज़ाहिर है कि स्कूलों और कॉलेजों में अलग-अलग क्लासरूम होने व वेंटिलेशन की बेहतर व्यवस्था होने से वहाँ बेहतर इलाज की व्यवस्था हो पाएगी और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा का इंफ्रास्ट्रक्चर तुरन्त तैयार हो जाएगा।

उत्तर प्रदेश की जनसंख्या क़रीब 23 करोड़ से अधिक है। प्रदेश में सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, कोरोना संक्रमण दर क़रीब छ: फ़ीसदी है। यानी दो करोड़ से भी कम लोग कोरोना संक्रमित हैं। कोरोना संक्रमण से मृत्यदर क़रीब 1.5 फीसदी के आसपास बतायी जा रही है। यानी 25 मई तक क़रीब ढाई लाख लोगों की कोरोना संक्रमण से मौत हो गयी। उत्तर प्रदेश के इस हाल से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि बाक़ी राज्यों में क्या हाल होगा? हालाँकि कुछ सूत्र दावा कर रहे हैं कि सरकार जो आँकड़े उपलब्ध करवा रही है, उससे क़रीब चार-पाँच गुना अधिक मौतें हुई हैं। प्रदेश सरकार के आँकड़ों में जहाँ मई तक 20,000 से भी कम लोगों की कोरोना से मौत बतायी गयी है, वहीं बिहार में सिर्फ़4,000 से कम मौतों का आँकड़ा दिया है। जबकि वास्तव में श्मशानों और क़ब्रिस्तानों में लाशेंफूँकने-दफ़नाने की जगह तक नहीं है। श्मशानों में अगर मिल भी गयी, तो दाह संस्कार के लिए लकडिय़ाँ तक नहीं हैं। शायद यही कारण है कि लोग पवित्र गंगा की शरण में पहुँच रहे हैं।

हाल यह है कि गंगा में बहती, किनारों पर रेत मेंदफ़्नकफन में लिपटी लाशों को कुत्ते और जंगली जानवर नोच रहे हैं। इससे ज़्यादा वीभत्स क्या हो सकता है? ज़ाहिर है कि ये शव उन शहरी या ग्रामीण इलाक़ों से ही नदी किनारे ऊपर-ऊपर दफनाये या पानी में बहाये गये होंगे, जो गंगा किनारे पड़ते हैं। हालाँकि शवों को इस तरह बहाने-दफ़नाने की घटनाएँ मीडिया में आने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इसका संज्ञान लेते हुए उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों सरकारों को नोटिस जारी किये। यह तो ठीक है, लेकिन शवों की गरिमा और मानव अधिकारों का जो मुद्दा उठाया, उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर बिहार के बक्सर में गंगा नदी में शवों के मिलने के मामले में पटना उच्च न्यायालय ने जवाब तलब किया है। न्यायालय ने मुख्य सचिव से पूछा कि 01 मार्च से अब तक कितनी लाशें गंगा में मिलीं? धार्मिक रीति-रिवाज़ के अनुसार कितने शवों का दाह संस्कार और कितने शवों को दफ़नाया गया?

गंगा में बहती इन लाशों से अब गंगा के जल में कोविड संक्रमण के फैलने का गम्भीर ख़तरा बढ़ गया है। वर्तमान में गंगा नदी में जलस्तर कम है। एक महीने बाद जून तक यह प्रवाह बढऩे के आसार होते हैं। ज़ाहिर है कि पहाड़ों पर जब बर्फ़पिघलेगी, तो गंगा का पानी भी बढ़ेगा। जुलाई-अगस्त में कई जगह बाढ़ भी आती है। ज़ाहिर है कि संक्रमित लाशें सड़ेंगी और उही पानी के सम्पर्क में लोग आएँगे। जीव-जन्तु इस पानी को भी पीते हैं। इससे भी कोरोना संक्रमण बढ़ सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो इस महामारी से पार पाना नामुमकिन हो जाएगा। इतना ही नहीं, सड़ती लाशें नये रोग भी पैदा करेंगी। सनातन धर्म के इन तीन आदि प्रतीकों, गंगा, काशी और महादेव का जो अनादर इस काल में हुआ है, वह बेहद दु:खद है। सरकार को चाहिए कि गंगा ही नहीं उन सभी नदियों के किनारे के शहरों के प्रशासन और पुलिस को सतर्क करना होगा कि वे गंगा में शवों के प्रवाह को रोकें। हालाँकि यह काम केवल प्रशासन और पुलिस के बलबूते सम्भव नहीं है। नदियों के किनारे बसे गाँवों और शहरों के नागरिकों को जागरूक होना पड़ेगा। क्योंकि नदी किनारे बसे इलाक़ों में यह महामारी और तेज़ी के साथ फैल सकती है। अगर नदी में तैर रहे शवों के मामले को गम्भीरता से नहीं लिया गया, तो समाज और प्रसाशन को एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। बहरहाल आज कोरोना के कहर में इस विक्षिप्त सकारात्मकता से अधिक और क्या हो सकता है? जीवदायनी माँ गंगा के दामन मेंदफ़्नऔर तैरती सैंकड़ों लाशों की चीख़ से अधिक सकारत्मक क्या हो सकता है? हिन्दुस्तान में हिन्दू राष्ट्र की कुंठा में श्मशानों में जलती हज़ारों चिताओं और क़ब्रितानों में इंसानियत का मर्सिया पढ़ती हुई कब्रों से अधिक सकारत्मक क्या होगा? इस महामारी के कहर के सामने एक-एक साँस के लिए तड़पते लोगों की मौत से अधिक सकारत्मक क्या होगा? इस संकट-काल के कहर में भी मुनाफ़े और दलाली के लिए लोकतान्त्रिक भारत की लाश बेचने से अधिक सकारत्मक क्या होगा? आज विकारग्रस्त जिस्मों के ज़रिये मनुष्यता का लहू पीने वालों की सोच के अट्टहास से सकारत्मक क्या हो सकता है? हरिद्वार में कुम्भ की बात हो या राज्यों के चुनावों में रैललियों की, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी; लेकिन किसी ने नहीं सुनी।

अब श्रद्धालु भी गंगा स्नान से परहेज़ कर रहे हैं और गंगा की सफ़ाई को लेकर सवाल उठा रहे हैं। गंगा के स्नान करने आये कुछ लोगों ने बताया कि लोग पुण्य के ख़याल से गंगा स्नान करने आते हैं। लेकिन जिस तरह से हाल के दिनों में कोरोना संक्रमित मुर्दों की लाशें गंगा में प्रवाहित कर दी गयीं और अधजले शवों को गंगा के किनारे छोड़ दिया गया, उससे गंगा की स्वच्छता और पवित्रता प्रभावित हुई है। ज़ाहिर है महामारी के डर से जब लोग अपनों को नहीं छू रहे, तो गंगा के दूषित हो रहे जल में कौन डुबकी लगाएगा? बताते हैं कि अफ्रीका में इबोला वायरस से मरने वालों के शवों को दफ़नाने की प्रक्रिया पर विदेशी समाचार चैनलों और समाचार पत्रों की रिपोर्टें प्रसारित हुई थीं। आज उसके मद्देनज़र जब सोचता हूँ कि अगर गंगा किनारेदफ़्नऔर उसके जल में बहती लाशों से संक्रमण को कई-कई गुणा बढ़ा, तो क्या होगा? इसे सोचकर ही मन काँप उठता है। क्योंकि यह दृश्य मन को कुंठित और व्यग्र करने वाला है। समाज में किसी जीवित ही नहीं, मरने वाले के अधिकारों व सम्मान का ख़याल रखना भी सरकारों का कर्तव्य है। लेकिन ऐसा लगता है कि हमारी सरकारें निष्ठुर और निर्लज्ज हो चुकी हैं। यूँ तो लाशें नहीं बोलतीं; लेकिन यहाँ तो माँ गंगा के दामन मेंदफ़्नऔर जल में बहती लाशों की चीख़ सुनायी दे रही है, जो बहुत ही डरावनी, वीभत्स और भयाक्रांत है।

(लेखक दैनिक भास्कर के राजनीतिक संपादक हैं।)